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हिंदी मीडियम से पढ़ाई, रेत पर रिसर्च और मशहूर वैज्ञानिक संग काम: अब भारतीय प्रोफेसर दीपक धर को मिला वो डिराक मेडल, जिससे सम्मानित हुए थे स्टीफन हॉकिंग

भारत के जाने-माने सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर दीपक धर को 2026 का प्रतिष्ठित डिराक पदक देने का आधिकारिक ऐलान किया गया है। यह घोषणा इंटरनेशनल सेंटर फॉर थियोरेटिकल फिजिक्स यानी ICTP ने की है। दीपक धर को यह सम्मान स्टैटिस्टिकल मैकेनिक्स यानी सांख्यिकीय भौतिकी में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया गया है।

भारत के जाने-माने सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर दीपक धर को 2026 का प्रतिष्ठित डिराक पदक देने का आधिकारिक ऐलान किया गया है। यह घोषणा इंटरनेशनल सेंटर फॉर थियोरेटिकल फिजिक्स यानी ICTP ने की है। दीपक धर को यह सम्मान स्टैटिस्टिकल मैकेनिक्स यानी सांख्यिकीय भौतिकी में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया गया है।

2026 में दीपक धर के साथ तीन और बड़े वैज्ञानिकों को भी इस सम्मान के लिए चुना गया है। इनमें बर्नार्ड डेरिडा, मार्क मेजार्ड और हाइम सोमपोलिंस्की शामिल हैं। चारों वैज्ञानिकों ने स्टैटिस्टिकल मैकेनिक्स और सैद्धांतिक भौतिकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किया है।

आपको बता दें कि डिराक पदक सैद्धांतिक भौतिकी का एक बेहद प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सम्मान है। इसकी शुरुआत 1985 में हुई थी। यह महान भौतिक विज्ञानी पॉल डिराक की याद में शुरू किया गया था। यह पदक हर साल उन वैज्ञानिकों को दिया जाता है, जिन्होंने सैद्धांतिक भौतिकी में महत्वपूर्ण योगदान दिया हो।

डिराक पदक पाने वाले वैज्ञानिकों में दुनिया के कई बड़े नाम शामिल रहे हैं। इनमें महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग भी शामिल हैं। इस सम्मान की प्रतिष्ठा का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसके कई विजेता बाद में नोबेल पुरस्कार जीत चुके हैं। ICTP के अनुसार, डिराक पदक सैद्धांतिक भौतिकी के क्षेत्र में दुनिया के प्रमुख सम्मानों में से एक है।

स्टैटिस्टिकल मैकेनिक्स का विज्ञान और प्रोफेसर दीपक धर का योगदान

प्रोफेसर दीपक धर को साल 2026 का डिराक पदक ‘स्टैटिस्टिकल मैकेनिक्स‘ के क्षेत्र में उनके काम के लिए मिला है। यह भौतिकी यानी फिजिक्स की एक बहुत ही खास और महत्वपूर्ण शाखा है। आसान शब्दों में कहें तो इसके जरिए बहुत सारे कणों या पार्टिकल्स के मिलने-जुले व्यवहार की पढ़ाई की जाती है। इसमें किसी एक अकेले कण को देखने के बजाय यह देखा जाता है कि जब करोड़ों कण आपस में मिलते हैं, तो पूरा सिस्टम मिलकर कैसे काम करता है।

यह विज्ञान केवल किताबों या थ्योरी तक ही सीमित नहीं है। आज के समय में इसके नियम इंटरनेट नेटवर्क, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI और शेयर बाजार जैसी जटिल चीजों को समझने में भी बहुत काम आ रहे हैं। प्रोफेसर दीपक धर ने ऐसी ही उलझी हुई और जटिल भौतिक प्रणालियों को सुलझाने में बहुत बड़ा काम किया है। उनके रिसर्च में यह देखा गया है कि कैसे छोटी-छोटी और सामान्य घटनाओं से अचानक बहुत बड़ी और जटिल चीजें पैदा हो जाती हैं। उनके शोध का एक बड़ा हिस्सा ‘सेल्फ-ऑर्गेनाइज्ड क्रिटिकलिटी’ और उससे जुड़े गणित के मॉडल्स पर रहा है, जो उन्हें दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिकों की कतार में खड़ा करता है।

रेत के ढेर से दुनिया की बड़ी घटनाओं को समझने का अचूक तरीका

प्रोफेसर दीपक धर के सबसे बड़े वैज्ञानिक कामों में सैंडपाइल मॉडल और धर का बर्निंग एल्गोरिदम शामिल हैं। इसे बहुत ही आसान भाषा में रेत के ढेर के उदाहरण से समझा जा सकता है। जब आप किसी जगह पर रेत के ढेर पर लगातार एक-एक करके रेत के कण गिराते हैं, तो शुरुआत में कुछ खास नहीं बदलता है। कभी-कभार थोड़ा सा हिस्सा नीचे खिसक जाता है, लेकिन एक समय ऐसा आता है जब सिर्फ एक छोटा सा कण पूरे ढेर को हिला देता है और अचानक रेत का एक बहुत बड़ा हिस्सा ढह जाता है।

यही नियम प्रकृति और दुनिया की बड़ी जटिल व्यवस्थाओं में भी काम करता है। कई बार एक बहुत छोटा सा बदलाव पूरे सिस्टम में भारी उथल-पुथल या बहुत बड़ा बदलाव ला देता है। विज्ञान की भाषा में इस खास व्यवहार को सेल्फ-ऑर्गनाइज्ड क्रिटिकलिटी कहा जाता है। प्रोफेसर दीपक धर के सैंडपाइल मॉडल और उनके बर्निंग एल्गोरिदम ने ऐसी जटिल व्यवस्थाओं को गणित के जरिए समझना बहुत आसान बना दिया है। उनके इस शानदार मॉडल से हमें असल जिंदगी की कई घटनाओं को समझने में बहुत मदद मिलती है, जैसे अचानक आने वाले भूकंप, सड़कों पर लगने वाले भारी ट्रैफिक जाम और शेयर बाजार में होने वाले अचानक बड़े उतार-चढ़ाव।

बोल्ट्जमान मेडल जीतने वाले देश के पहले भारतीय वैज्ञानिक

साल 2026 का डिराक पदक प्रोफेसर दीपक धर के करियर का पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मान नहीं है। इससे पहले साल 2022 में उन्हें भौतिकी के एक और बहुत बड़े पुरस्कार ‘बोल्ट्जमान मेडल’ से नवाजा गया था। इस बड़ी उपलब्धि के साथ वह यह सम्मान पाने वाले इतिहास के पहले भारतीय वैज्ञानिक बने थे। सांख्यिकीय भौतिकी यानी स्टैटिस्टिकल फिजिक्स की दुनिया में बोल्ट्जमान मेडल को सबसे बड़ा और सर्वोच्च सम्मान माना जाता है।

जब उन्हें यह ऐतिहासिक सम्मान मिला था, तब प्रोफेसर दीपक धर ने बहुत ही विनम्र भाव से एक बात कही थी। उन्होंने कहा था कि वह भले ही इस मेडल को पाने वाले पहले भारतीय हैं, पर इसका मतलब यह नहीं है कि वे इस क्षेत्र में अच्छा काम करने वाले देश के पहले वैज्ञानिक हैं। उनके इस बयान से साफ झलकता था कि वे अपनी इस सफलता को भारत में विज्ञान और रिसर्च की पुरानी परंपरा का हिस्सा मानते थे, न कि केवल अपनी अकेली की उपलब्धि।

साल 2023 में मिला देश का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’

बोल्ट्जमान मेडल मिलने के ठीक अगले साल यानी 2023 में भारत सरकार ने प्रोफेसर दीपक धर को देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया। यह सम्मान उनकी महान वैज्ञानिक सेवाओं के लिए दिया गया था।

2023 में मिला था पद्म भूषण फोटो साभार:IITK

प्रोफेसर धर को इससे पहले भी कई बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। उन्हें साल 1983 में इंडियन नेशनल साइंस अकादमी का यंग साइंटिस्ट मेडल और साल 1991 में विज्ञान के क्षेत्र का मशहूर शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार मिला था। इसके बाद उन्हें साल 1993 में आईसीटीपी का जे रॉबर्ट श्रिफर प्राइज, साल 2001 में सत्येंद्रनाथ बोस मेडल और साल 2002 में थर्ड वर्ल्ड अकादमी ऑफ साइंसेज प्राइज भी मिल चुका है।

उनकी इन शानदार उपलब्धियों का सिलसिला यहीं नहीं थमा। उन्हें देश की कई प्रमुख वैज्ञानिक अकादमियों जैसे इंडियन अकादमी ऑफ साइंसेज, नेशनल अकादमी ऑफ साइंसेज और ट्वास (TWAS) का फेलो भी बनाया गया था। इसके अलावा उनके विज्ञान के क्षेत्र में बेहतरीन काम को देखते हुए उन्हें साल 2007 में प्रतिष्ठित जे सी बोस नेशनल फेलोशिप से भी नवाजा गया था।

उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर से शुरू हुआ था जीवन का सफर

प्रोफेसर दीपक धर की पूरी जीवन यात्रा बहुत प्रेरणा देने वाली है। उनके सफर की शुरुआत उत्तर प्रदेश के एक साधारण शहर और हिंदी-माध्यम के माहौल से हुई थी। उनका जन्म साल 1951 में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में हुआ था। उस समय उनकी माँ चाहती थीं कि वह बड़े होकर एक IAS अधिकारी बनें, लेकिन उनके पिता ने हमेशा उनकी वैज्ञानिक सोच और सीखने की ललक को आगे बढ़ाया और सही रास्ता दिखाया।

प्रोफेसर धर के पिता उत्तर प्रदेश की न्यायिक सेवा में अधिकारी थे। सरकारी नौकरी में बार-बार तबादले होने के कारण उनके परिवार को हर कुछ साल में एक शहर से दूसरे शहर जाना पड़ता था। इसी वजह से उनका बचपन प्रतापगढ़ के अलावा आगरा, मुरादाबाद, मेरठ, गोंडा, बिजनौर, पीलीभीत और मुजफ्फरनगर जैसे कई शहरों में बीता। बाद में उनके पिता का तबादला वाराणसी हुआ और उनकी आगे की पढ़ाई का रास्ता इलाहाबाद विश्वविद्यालय तक पहुँच गया। उन्होंने IIT कानपुर को दिए एक इंटरव्यू में बताया था कि बार-बार शहर बदलने की वजह से उनका किसी एक जगह से बहुत गहरा भावनात्मक लगाव नहीं बन पाया था।

उनके पिता घर में विज्ञान से जुड़ी मैगजीन लेकर आते थे, जिनका उनके मन पर बहुत गहरा असर पड़ा। इनमें ‘अंडर्स्टैंडिंग साइंस’ नाम की मैगजीन ने उन पर एक खास छाप छोड़ी थी। धीरे-धीरे किताबों और पत्रिकाओं की वजह से फिजिक्स में उनकी रुचि लगातार बढ़ती चली गई। स्कूल के दिनों में महान वैज्ञानिक आइजक न्यूटन उन्हें बहुत जादुई और असरदार लगते थे। जब वे दसवीं कक्षा के आसपास पहुँचे, तब उन्होंने गैलीलियो, मैरी क्यूरी, अल्बर्ट आइंस्टीन और बर्ट्रेंड रसेल जैसे महान वैज्ञानिकों की कई लोकप्रिय किताबें पढ़ ली थीं।

विज्ञान में हमेशा अच्छे नंबर आने की वजह से उनका पढ़ाई का रिकॉर्ड बहुत शानदार रहा, जिससे उन्हें आईआईटी कानपुर और अमेरिका के कैलटेक में एडमिशन मिलने का रास्ता आसान हो गया। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शुरुआती उच्च शिक्षा पूरी की और साल 1972 में आईआईटी कानपुर से फिजिक्स में एमएससी की डिग्री हासिल कर ली।

अमेरिका के कैलटेक में महान वैज्ञानिक रिचर्ड फेनमैन के साथ किया काम

आईआईटी कानपुर से मास्टर्स की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रोफेसर दीपक धर आगे की पढ़ाई और रिसर्च के लिए अमेरिका चले गए। वे कैलिफोर्निया इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी यानी कैलटेक पहुँचे। उस महान संस्थान में पहुँचने पर उन्हें प्रतिष्ठित रिचर्ड फेनमैन फेलोशिप से सम्मानित किया गया। रिचर्ड फेनमैन का नाम दुनिया के सबसे बड़े और दिग्गज भौतिक वैज्ञानिकों में गिना जाता है।

दीपक धर ने कैलटेक में उन महान वैज्ञानिक रिचर्ड फेनमैन के साथ बहुत करीब रहकर काम किया। उन्होंने फेनमैन के टीचिंग असिस्टेंट के रूप में भी अपनी जिम्मेदारी निभाई थी। उसी दौरान उन्होंने अपनी PHd की पढ़ाई पूरी की और साल 1978 में अपनी डॉक्टोरल डिग्री हासिल कर ली। उनके वैज्ञानिक करियर के लिए यह समय बहुत बड़ा और अहम मोड़ था। उस दौर में उनके पास अमेरिका में ही रुककर एक शानदार करियर बनाने के कई आसान मौके मौजूद थे।

अमेरिका में रुकने के बजाय देश लौटे और TIFR से जुड़े

कैलटेक से अपनी PHd पूरी करने के बाद ज्यादातर युवा वैज्ञानिक अमेरिका में ही रुक जाते हैं। लेकिन प्रोफेसर दीपक धर ने वहाँ रहने के बजाय अपने देश भारत लौटने का बड़ा और हिम्मत भरा फैसला किया। साल 1978 में ही वे वापस भारत आ गए और मुंबई के मशहूर संस्थान टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च यानी टीआईएफआर से एक रिसर्च फेलो के तौर पर जुड़ गए।

आगे चलकर वे इसी संस्थान में प्रोफेसर के पद पर भी काम करने लगे। टीआईएफआर के शुरुआती दिनों को याद करते हुए उन्होंने बताया था कि तब उनके पास कोई औपचारिक मेंटर या मार्गदर्शक नहीं था। फिर भी वहाँ मौजूद भौतिक वैज्ञानिकों की मजबूत और मददगार कम्युनिटी से उन्हें हर कदम पर पूरा सहयोग मिला। इसके बाद उन्होंने लगभग चालीस सालों तक स्टैटिस्टिकल फिजिक्स और जटिल भौतिक प्रणालियों से जुड़े पेचीदा सवालों पर लगातार रिसर्च की।

प्रोफेसर दीपक धर का यह शानदार सफर सिर्फ टीआईएफआर तक ही सीमित नहीं रहा। वे देश के दूसरे बड़े संस्थान आईआईएसईआर पुणे से भी लंबे समय तक जुड़े रहे। वहाँ उन्होंने साल 2016 से 2024 तक डिस्टिंग्विश्ड विजिटिंग फैकल्टी के रूप में अपनी सेवाएँ दीं और सैकड़ों छात्रों को पढ़ाया। इसके अलावा वे बेंगलुरु के इंटरनेशनल सेंटर फॉर थियोरेटिकल साइंसेज यानी आईसीटीएस-टीआईएफआर से भी लंबे समय से जुड़े हैं और वर्तमान में वहाँ डिस्टिंग्विश्ड प्रोफेसर के रूप में जाने जाते हैं।

फिजिक्स के प्रति अटूट प्यार और महान वैज्ञानिकों की लिस्ट में नाम

प्रोफेसर दीपक धर ने अपनी उच्च स्तरीय रिसर्च के साथ-साथ देश में फिजिक्स की शिक्षा को बढ़ाने में भी बहुत बड़ा योगदान दिया है। उन्होंने कई युवा छात्रों और रिसर्चर्स को थियोरेटिकल फिजिक्स के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए हमेशा प्रेरित किया है। थियोरेटिकल फिजिक्स के प्रति उनका प्यार इतना गहरा था कि उन्होंने कभी भी किसी प्राइवेट कंपनी या कॉर्पोरेट सेक्टर में नौकरी करने के बारे में नहीं सोचा। हालाँकि, अपनी पीएचडी पूरी करने के तुरंत बाद उन्होंने एक बार बेल लैब्स में एक जॉब सेमिनार जरूर दिया था, लेकिन तब उनका चयन वहाँ नहीं हो पाया था।

उनके अनुसार थियोरेटिकल फिजिक्स की खासियत ही ऐसी होती है कि इसके हर शोध या खोज का तुरंत कोई बिजनेस या प्रैक्टिकल इस्तेमाल सामने नहीं आता है। इसके बावजूद यह विषय उन्हें और दुनिया भर के वैज्ञानिकों को अपनी ओर गहराई से खींचता रहता है। डिराक पदक का नाम महान भौतिक विज्ञानी पॉल डिराक के नाम पर रखा गया है और इसकी शुरुआत साल 1985 में हुई थी। यह पुरस्कार हमेशा से थ्योरिटिकल फिजिक्स और गणित के क्षेत्र में किए गए असाधारण कामों के लिए ही दिया जाता रहा है।

पिछले कई दशकों में यह सम्मान दुनिया के चुनिंदा और सबसे बड़े वैज्ञानिकों को ही मिला है, जिनमें महान विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग का नाम भी शामिल रहा है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि प्रोफेसर दीपक धर और स्टीफन हॉकिंग ने एक ही विषय पर काम किया हो या एक जैसी खोज की हो। यहाँ स्टीफन हॉकिंग का नाम केवल इसलिए जुड़ा है क्योंकि वे भी पुराने समय में इस डिराक पदक को पा चुके हैं। अब प्रोफेसर दीपक धर भी दुनिया के उन्हीं चुनिंदा और दिग्गज वैज्ञानिकों की खास सूची में शामिल हो गए हैं।

छोटे शहर के साधारण छात्र से लेकर दुनिया के महान वैज्ञानिक बनने तक का सफर

प्रोफेसर दीपक धर की पूरी जीवन यात्रा देश के हर युवा के लिए एक बहुत बड़ी प्रेरणा है। उनके सफर की शुरुआत उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर और हिंदी माध्यम के स्कूल से हुई थी। घर में आने वाली विज्ञान की मैगजीन को पढ़कर वह विज्ञान की दुनिया के दीवाने हो गए थे। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी और IIT कानपुर से पढ़ाई की। फिर वह अमेरिका की मशहूर कैलटेक यूनिवर्सिटी पहुंचे और वहाँ महान वैज्ञानिक रिचर्ड फेनमैन के साथ मिलकर काम किया। साल 1978 में अपनी पीएचडी पूरी करने के बाद उनके पास अमेरिका में ही रहकर एक बहुत आरामदायक जिंदगी बिताने का पूरा मौका था। लेकिन उन्होंने विदेश में रहने के बजाय अपने देश भारत वापस लौटने का फैसला किया।

भारत आकर उन्होंने टीआईएफआर (TIFR) जैसे बड़े संस्थान में दशकों तक थ्योरिटिकल फिजिक्स पर कड़ी मेहनत की। बाद में उन्होंने आईआईएसईआर पुणे और आईसीटीएस बेंगलुरु जैसे संस्थानों के जरिए देश में विज्ञान की नींव को और मजबूत बनाया। उनकी यह पूरी वैज्ञानिक यात्रा केवल उनकी अपनी सफलता की कहानी नहीं है। इस सफर ने भारत में फिजिक्स की पढ़ाई और रिसर्च को दुनिया भर में एक नई पहचान दी है।

साल 2026 का यह प्रतिष्ठित डिराक पदक उनकी इसी लंबी और गौरवशाली यात्रा में एक और नया सोने का पन्ना जोड़ता है। उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर से निकलकर साइंस मैगजीन से विज्ञान सीखने वाला वह छात्र, कैलटेक में रिचर्ड फेनमैन का साथी बनने वाला रिसर्चर, अमेरिका की सुख-सुविधा छोड़कर देश लौटने वाला विज्ञानी और सांख्यिकीय भौतिकी में भारत का नाम पूरी दुनिया में रोशन करने वाला यह महान भौतिक विज्ञानी आज हर देशवासी के लिए गर्व बन चुका है।

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विवेकानंद मिश्र
विवेकानंद मिश्र
एक पत्रकार और कंटेंट क्रिएटर। राजनीति, संस्कृति, समाज से जुड़ी अनसुनी कहानियाँ सामने लाने के लिए प्रतिबद्ध।

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