विधानसभा चुनाव से पहले UP में भिड़ी सपा-कॉन्ग्रेस: इमरान मसूद बोले- गठबंधन की जरूरत सपा को, सपा नेता बोले- आलाकमान सांसद जी को समझाएँ

यूपी में 2027 के विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, मगर सपा और कॉन्ग्रेस के बीच रस्साकशी अभी से शुरू हो गई है। ऊपर से भले दोनों पार्टियाँ भाजपा के खिलाफ एकजुटता दिखाती रहें, अंदरखाने माहौल कुछ और ही कहानी बयाँ कर रहा है। अब मामला सिर्फ सीटों के बँटवारे या नेतृत्व तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह साफ तौर पर वर्चस्व की जंग का रूप लेता जा रहा है। और इस बार विवाद की जड़ में हैं कांग्रेस कॉन्ग्रेस इमरान मसूद, जिनके बयानों ने गठबंधन के भीतर हलचल मचा दी है।

कॉन्ग्रेस सांसद इमरान मसूद बोले- गठबंधन की जरूरत सपा को है

सहारनपुर से कॉन्ग्रेस सांसद मसूद ने हाल ही में सपा पर सीधा वार करते हुए कहा कि गठबंधन की असली जरूरत कॉन्ग्रेस को नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी को है। यह कोई नई बात नहीं है, इससे पहले भी वे यह कहते रहे हैं कि कॉन्ग्रेस भीख माँगने वाली पार्टी नहीं है और अगर गठबंधन बनेगा भी तो बराबरी की शर्तों पर, कोई एहसान लेकर नहीं।

अपनी बात को पुख्ता करने के लिए उन्होंने 2024 के लोकसभा नतीजों का हवाला दिया, जहाँ सपा को 37 सीटें मिलीं और उनके मुताबिक इसमें गठबंधन का बड़ा योगदान रहा।

मसूद यहीं नहीं थमे। उन्होंने सपा पर एक और गंभीर आरोप लगाया कि पार्टी दमदार मुस्लिम चेहरों को बर्दाश्त नहीं कर पाती। अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी और आजम खान का जिक्र करते हुए उन्होंने अखिलेश यादव पर निशाना साधा और कहा कि मुखर मुस्लिम नेताओं के साथ सपा का व्यवहार हमेशा सवालों के घेरे में रहा है।

सपा बोली- इमरान का बयान गठबंधन धर्म के खिलाफ

हालाँकि इतने तीखे बयान पर सपा खामोश नहीं बैठी। पार्टी प्रवक्ता सुनील सिंह साजन ने पलटवार करते हुए कहा कि जब कॉन्ग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर सपा की सहयोगी है, तो यूपी में भी यह रिश्ता उतना ही मायने रखता है। उन्होंने मसूद के बयान को गठबंधन धर्म के खिलाफ बताया और कॉन्ग्रेस आलाकमान से माँग की कि वे अपने सांसद को समझाएँ।

साजन का तंज साफ था कि अगर पार्टी का कोई नेता बार-बार गठबंधन के खिलाफ बोल रहा है और ऊपर से कोई रोकटोक नहीं हो रही, तो इसका मतलब शीर्ष नेतृत्व में ही खामी है।

असल में यह तनातनी अचानक नहीं उपजी, सीट बँटवारे को लेकर पहले से ही खींचतान चल रही है। कॉन्ग्रेस ने पहले ही ऐलान कर दिया था कि वह प्रदेश की 403 सीटों पर अपना संगठन मजबूत करने में जुटी है। दूसरी ओर मसूद लगातार बराबरी की हिस्सेदारी की माँग उठाते रहे हैं।

जून में भी उन्होंने कहा था कि कॉन्ग्रेस सीटों के लिए सपा के आगे हाथ नहीं फैलाएगी, फैसला बातचीत की मेज पर, बराबरी से होना चाहिए।

फिर भी, कॉन्ग्रेस का शीर्ष नेतृत्व अब तक इस रस्साकशी के बावजूद गठबंधन बनाए रखने की बात कहता आया है। जुलाई में प्रदेश अध्यक्ष अजय राय और प्रभारी राजेंद्र गौतम ने भी दोहराया था कि इंडी गठबंधन यूपी में मजबूती से टिका है और 2027 में दोनों दल मिलकर भाजपा को टक्कर देंगे।

सवाल बस इतना है कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएगा, यह ‘साथ’ कितना टिक पाएगा? अखिलेश यादव की सपा खुद को यूपी में विपक्ष की सबसे मजबूत ताकत मानती है, तो दूसरी ओर 2024 के बाद कॉन्ग्रेस भी राज्य में अपनी खोई जमीन वापस पाने की जुगत में है।

2027 का चुनावी खेल अभी शुरू भी नहीं हुआ, मगर सपा-कॉन्ग्रेस के बीच उठ रही ये आवाजें एक बात तो साफ बता रही हैं कि भाजपा के खिलाफ बनने वाला यह मोर्चा अंदर से कितना मजबूत या कमजोर साबित होगा, यह अभी वक्त ही तय करेगा।