पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर एक चिंताजनक मामला सामने आया है। यहाँ दो न्यायिक अधिकारियों, जिनमें एक महिला जज भी शामिल हैं, को कथित रूप से धमकी भरे पत्र भेजे गए हैं। ये पत्र तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के जिला अध्यक्ष के आधिकारिक लेटरहेड पर भेजे गए बताए जा रहे हैं, जिससे पूरे मामले ने गंभीर रूप ले लिया है। इस घटनाक्रम के बाद कलकत्ता हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए तुरंत हस्तक्षेप किया है और अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
चुनावी सूची संशोधन से जुड़ा विवाद
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ये पत्र चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया से जुड़े हैं, जिसके तहत 2026 के बंगाल विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची का सत्यापन किया जा रहा है। आरोप है कि न्यायिक अधिकारी इस प्रक्रिया के तहत पूरक सूची (supplementary list) में नामों को हटाने का काम कर रहे थे, जिससे कुछ राजनीतिक हलकों में असंतोष पैदा हुआ।
बताया जा रहा है कि अविजित डे भौमिक की ओर से भेजे गए इन पत्रों में इस कार्रवाई पर नाराजगी जताई गई और ‘देख लेंगे’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया, जिसे बंगाली भाषा में एक तरह की अप्रत्यक्ष धमकी माना जाता है। दोनों न्यायिक अधिकारियों ने इन पत्रों को जिला जज को सौंपते हुए मामले की जाँच की माँग की।
हाई कोर्ट सख्त, सुरक्षा बढ़ाने के निर्देश
मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायिक अधिकारियों ने जस्टिस सुजॉय पाल को भी पत्र लिखकर अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई। इसके बाद हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक (DGP) को तत्काल कार्रवाई करने और संबंधित न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षा प्रदान करने के निर्देश दिए हैं।
हालाँकि अविजीत डे भौमिक ने मीडिया से बातचीत में किसी भी तरह की धमकी देने से इनकार किया है। उनका कहना है कि यह सिर्फ मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को लेकर एक ‘अनुरोध’ था। उन्होंने यह भी कहा कि यदि उनके पत्र की भाषा से किसी को ठेस पहुँची है तो वे इसके लिए खेद प्रकट करते हैं।
इसके बावजूद कोर्ट और चुनाव आयोग ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और संकेत दिए हैं कि पूरे प्रकरण की जाँच कर उचित कार्रवाई की जाएगी।

