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इजरायल को 99% हथियार देने वाले पश्चिमी देशों को छोड़ भारत के खिलाफ प्रोपेगैंडा फैला रहा एमनेस्टी, समझिए गाजा की आड़ में किस खेल में जुटा Amnesty International

वैश्विक राजनीति में जब कोई देश 'आत्मनिर्भर' और मजबूत बनता है, तो उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव और नैरेटिव वॉर (Narrative War) के हमले बढ़ते हैं। ऐसे में एमनेस्टी की यह रिपोर्ट भी उसी भू-राजनीतिक (Geopolitics) खींचतान का एक हिस्सा नजर आती है।

दुनिया के नक्शे पर युद्ध और कूटनीति के समीकरण बेहद उलझे हुए हैं। इस बीच मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International) ने गुरुवार (30 जुलाई 2026) को एक रिपोर्ट जारी कर दावा किया कि भारत में बने रक्षा उपकरणों और सैन्य घटकों (Defense Components) का इस्तेमाल इजराइल द्वारा गाजा में जारी सैन्य कार्रवाइयों में किया जा रहा है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट की हेडलाइन है- MADE IN INDIA: THE SUPPLY OF WEAPONS AND AMMUNITION TO ISRAEL (मेड इन इंडिया: इजरायल को हथियारों और गोला-बारूद की आपूर्ति)।

इस रिपोर्ट में एमनेस्टी ने आरोप लगाया है कि 7 अक्टूबर 2023 को गाजा में संघर्ष शुरू होने के बाद से लेकर अब तक भारत की कई सरकारी और निजी कंपनियों ने इजरायल को बड़े पैमाने पर सैन्य सामग्री, गोला-बारूद, ड्रोन के पुर्जे और छोटे हथियारों के कलपुर्जे निर्यात किए हैं। एमनेस्टी का कहना है कि यह आपूर्ति अंतरराष्ट्रीय कानून और जेनोसाइड कन्वेंशन (Genocide Convention) का उल्लंघन कर सकती है।  

एमनेस्टी ने तर्क दिया है कि भारत द्वारा की जा रही यह आपूर्ति अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और 1948 के जेनोसाइड कन्वेंशन (नरसंहार रोकथाम समझौते) के तहत भारत के अंतरराष्ट्रीय कानूनी दायित्वों के विपरीत हो सकती है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की महासचिव एग्नेस कैलामार्ड ने कहा, “हमारी जाँच से पता चलता है कि गाजा में कथित जनसंहार को लेकर दुनिया भर में लगातार सामने आ रही तस्वीरों के बावजूद भारत ने इजरायली सेना और रक्षा क्षेत्र का समर्थन जारी रखा।”

कैलामार्ड ने कहा, “अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की ओर से जारी अंतरिम आदेशों में गजा में फिलिस्तीनियों के खिलाफ संभावित जनसंहार के जोखिम को स्वीकार किया गया है। ऐसे में भारतीय अधिकारी यकीन के साथ यह नहीं कह सकते कि उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि इजरायल को हथियारों के हस्तांतरण की अनुमति देना और उसे आसान बनाना अंतरराष्ट्रीय कानून के गंभीर उल्लंघनों में योगदान का बड़ा जोखिम पैदा करता है।”

अपने ट्वीट में अन्य जानकारियाँ देते हुए उन्होंने लिखा, “हम भारत सरकार से इजरायल को हथियारों, गोला-बारूद और पुर्जों के निर्यात को तुरंत रोकने का आह्वान करते हैं। इसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इसके अधिकार क्षेत्र में कार्यरत कंपनियाँ अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपराधों में योगदान न दें।”

हालाँकि जब इस पूरी रिपोर्ट का गहराई से अध्ययन किया जाता है, तो इसके पीछे मानवाधिकारों की वास्तविक चिंता से अधिक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ इकोसिस्टम का राजनीतिक एजेंडा और रणनीतिक पूर्वाग्रह दिखाई देता है।

भारत सरकार और स्वतंत्र सामरिक विश्लेषकों का हमेशा से यह स्पष्ट और व्यावहारिक दृष्टिकोण रहा है कि संप्रभु राष्ट्रों के बीच होने वाला रक्षा व्यापार अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों और राष्ट्रीय कानूनों के कड़े ढाँचे में संचालित होता है। किसी भी निर्यातक देश का नियंत्रण केवल सामग्री की सुपुर्दगी और अनुबंध की शर्तों तक ही सीमित रह सकता है, कोई भी विक्रेता देश यह तय नहीं कर सकता कि खरीदार देश अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक स्वायत्तता और आपातकालीन परिस्थितियों के अनुसार उन उपकरणों का प्रयोग कब, कहाँ और किस प्रकार करेगा।

इस रिपोर्ट में हम एमनेस्टी के दावों, भारत सरकार और भारतीय डिफेंस सेक्टर के व्यावहारिक पक्ष, भारत-इजरायल के गहरे और ऐतिहासिक संबंधों, भारत की बढ़ती ‘आत्मनिर्भरता’ से पश्चिमी देशों और एनजीओ की घबराहट, विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर द्वारा यूरोप में पश्चिमी मीडिया के सामने ही पश्चिमी देशों के डबल स्टैंडर्ड की पोल खोलने और अंतरराष्ट्रीय संस्था सिपरी (SIPRI) की हथियारों पर जारी होने वाली रिपोर्ट का भी विश्लेषण करेंगे।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट: क्यों इसके विश्लेषण की जरूरत?

एमनेस्टी इंटरनेशनल की इस रिपोर्ट में 7 अक्टूबर 2023 से 30 नवंबर 2025 के बीच भारत से इजरायल भेजे गए कुल 2,596 शिपमेंट्स (कंसाइनमेंट) के डेटा का विश्लेषण किया गया है। एमनेस्टी का दावा है कि भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की उपक्रमों (DPSUs) और निजी कंपनियों ने इजरायल की रक्षा कंपनियों (जैसे एलबिट सिस्टम्स, इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज और आईडब्ल्यूआई) को सैन्य पुर्जों की सप्लाई जारी रखी है।  

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट मुख्य रूप से भारत से इजरायल भेजे गए शिपमेंट्स के कस्टम डेटा और सीमा शुल्क दस्तावेजों के विश्लेषण पर आधारित होने का दावा करती है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट(फोटो साभार: amnesty. org)

एमनेस्टी के आँकड़ों के मुताबिक, भारत की निजी कंपनी ‘कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स’ (जो भारत फोर्ज की सहायक इकाई है) ने इजरायल मिलिट्री इंडस्ट्रीज को 155 मिलीमीटर आर्टिलरी शेल्स (तोप के गोलों) के लिए लगभग 9,600 बॉडी और केसिंग की आपूर्ति की है। इसके साथ ही, भारत सरकार के स्वामित्व वाली रक्षा उपक्रम ‘म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड’ (MIL) पर 1,000 पूरी तरह से तैयार 155MM के हाई-एक्सप्लोसिव तोप के गोलों को एलबिट सिस्टम्स के जरिए इजरायल भेजने का आरोप लगाया गया है।

छोटे हथियारों के क्षेत्र में रिपोर्ट यह आरोप लगाती है कि अडानी समूह और इजरायल वेपन इंडस्ट्रीज (IWI) के बीच ग्वालियर में स्थापित संयुक्त उद्यम ‘पीएलआर सिस्टम्स’ ने नेगेव लाइट मशीन गन और तवोर असॉल्ट राइफलों के लिए 33,000 से अधिक बोल्ट कैरियर्स और 10,000 से अधिक मैगजीन फीडिंग ट्रे निर्यात किए हैं। इसके अलावा बेंगलुरु स्थित निजी कंपनी ‘इंडो-एमआईएम’ पर इजरायली कंपनी आईडब्ल्यूआई को छोटे हथियारों के 59,000 से अधिक ऑटोमैटिक सीयर्स और ट्रिगर मैकेनिज्म घटकों की आपूर्ति का दावा किया गया है।  

एमनेस्टी का कहना है कि इसके अतिरिक्त हैदराबाद स्थित ‘अल्फा एल्सैक’ (जो एलबिट सिस्टम्स के साथ संयुक्त उद्यम है) ने ड्रोन के लिए मिसाइल वारहेड्स और ऑप्टिकल सेंसर्स की आपूर्ति की है, जबकि ‘प्रीमियर एक्सप्लोसिव्स’ ने रॉकेट मोटर्स और सॉलिड प्रोपेलेंट घटकों को निर्यात किया है। सरकारी कंपनी ‘इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड’ पर नाइट-विजन और सेमीकंडक्टर पार्ट्स भेजने का आरोप लगाया गया है।  

इस तरह से उसका कहना है कि भारतीय कंपनियों ने सैन्य-ग्रेड हथियारों के लिए 3,90,516 से अधिक कलपुर्जे (जैसे राइफल के बोल्ट कैरियर्स, ऑटोमैटिक सीयर्स, ट्रिगर मैकेनिज्म, मैगजीन फीडिंग ट्रे आदि) इजरायल की आईडब्ल्यूआई (IWI) कंपनी को भेजे।

साभार: Amnesty International Report

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस रिपोर्ट में इस बात पर फोकस किया है कि भारत से इजरायल भेजे गए सामान का इस्तेमाल गाजा में इजरायली सैन्य अभियानों में हो रहा है, इसलिए भारत अंतरराष्ट्रीय जेनेवा कन्वेंशन के कॉमन आर्टिकल 1 और जेनोसाइड कन्वेंशन के तहत अपनी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकता।  

एमनेस्टी के कानूनी और मानवाधिकार तर्क

जेनोसाइड कन्वेंशन (Genocide Convention): एमनेस्टी का कहना है कि 1948 के नरसंहार रोकथाम समझौते के तहत भारत का यह कानूनी कर्तव्य है कि वह किसी भी ऐसे देश को हथियार न दे जहाँ उनका इस्तेमाल संभावित नरसंहार में हो सकता हो। इसकी आड़ में वो भारत से इजरायल से सभी डिफेंस लिंक तोड़ने के लिए कहा है।

जेनेवा कन्वेंशन (Geneva Conventions): कॉमन आर्टिकल 1 के तहत राज्यों की जिम्मेदारी है कि वे अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का सम्मान करवाएँ।

आर्म्स ट्रेड ट्रीटी (ATT): एमनेस्टी ने इस बात पर जोर दिया कि भारत ने आर्म्स ट्रेड ट्रीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, इसलिए उसे तुरंत इसमें शामिल होना चाहिए। इस ट्रीटी पर दुनिया के 118 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं, 25 देशों ने हस्ताक्षर तो किए हैं, लेकिन अभी तक शामिल नहीं हुए हैं। इसमें अमेरिका, UAE, इजरायल, तुर्की, यूक्रेन जैसे देश हैं। वहीं भारत समेत 52 देशों ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। भारत के अलावा इस लिस्ट में पाकिस्तान, रूस, कुवैत, आर्मीनिया, अजरबैजान, ईरान, इराक जैसे देश हैं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल को भारत से इतनी परेशानी क्यों है?

एमनेस्टी इंटरनेशनल का भारत की सुरक्षा नीति या अंदरूनी मामलों पर सवाल उठाना कोई नई बात नहीं है। भारत सरकार और इस संगठन के बीच यह तनातनी सालों पुरानी है। इसकी मुख्य वजह भारत के कड़े कानून और विदेशी एनजीओ (NGOs) की भारत के मामलों में दखल देने की आदत है।

विदेशी पैसों के गोलमाल पर कानूनी शिकंजा: सितंबर 2020 में भारत के गृह मंत्रालय और ईडी (ED) ने एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के बैंक खाते बंद (सीज) कर दिए थे। जाँच में पता चला कि विदेशी फंडिंग से जुड़े नियमों (FCRA) से बचने के लिए एमनेस्टी ने गलत रास्ता अपनाया था। उन्होंने ब्रिटेन से ‘बिजनेस में निवेश’ (FDI) के नाम पर करोड़ों रुपए भारत मंगवाए। बाद में इस पैसे का इस्तेमाल एनजीओ के कामों और राजनीतिक अभियानों में किया गया।

जब सरकार ने इस धोखाधड़ी पर कानूनी कार्रवाई की, तो एमनेस्टी ने भारत में अपना काम बंद कर दिया और उल्टा खुद को ही पीड़ित बताने लगा। यही नहीं, वो अब भी कोशिश कर रहा है कि FRCA कानून के तहत NGO लॉबी को छूट मिले।

पश्चिमी देशों की सोच और भारत की आत्मनिर्भरता: पश्चिमी देशों के पैसों से चलने वाले ये अंतरराष्ट्रीय एनजीओ अक्सर भारत जैसे विकासशील देशों की तरक्की और सुरक्षा को गलत नजरिए से देखते हैं।

जब पश्चिमी देश (जैसे अमेरिका, ब्रिटेन या जर्मनी) इजरायल या अन्य युद्धग्रस्त क्षेत्रों को खरबों डॉलर के भारी हथियार, लड़ाकू विमान और बम भेजते हैं, तब एमनेस्टी की रिपोर्टों पर पश्चिमी सरकारें बहुत ध्यान नहीं देतीं।  लेकिन जैसे ही भारत जैसा विकासशील देश अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाता है और वैश्विक रक्षा बाजार में एक बड़े निर्यातक के रूप में उभरता है, ये संस्थाएँ भारत की संप्रभुता और व्यापार पर सवाल खड़ा करना शुरू कर देती हैं। हालाँकि भारत ने भी बाकी देशों जैसा ही रूख अपनाया है और एमनेस्टी की रिपोर्ट पर अपना साफ जवाब दे दिया है।

भारत के फैसलों का लगातार विरोध: एमनेस्टी इंटरनेशनल ने हमेशा भारत के अहम फैसलों पर एकतरफा रुख अपनाया है, चाहे वो जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाना हो, नागरिकता कानून (CAA) हो या नक्सलवाद के खिलाफ सरकार की कार्रवाई। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने हमेशा भारत विरोधी रुख अपनाया है।

इसलिए जब एमनेस्टी भारत के रक्षा निर्यात (हथियारो के व्यापार) पर सवाल उठाता है, तो यह सिर्फ किसी युद्ध की चिंता नहीं है। यह भारत को आर्थिक और सामरिक रूप से आगे बढ़ने से रोकने की एक सोची-समझी कोशिश लगती है।

एमनेस्टी की रिपोर्ट पर भारत ने क्या जवाब दिया, ये काफी अहम

इसराइल को हथियारों के एक्सपोर्ट पर  एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट को लेकर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल से नियमित प्रेस ब्रीफिंग में सवाल पूछा गया। उन्होंने भारत सरकार की तरफ से आधिकारिक प्रतिक्रिया दी। रणधीर जायसवाल ने कहा, “भारत के पास स्ट्रेटेजिक ट्रेड कंट्रोल पर एक मजबूत कानूनी और रेगुलेटरी फ्रेमवर्क है और वह अपने राष्ट्रीय क़ानूनों और अपनी अंतरराष्ट्रीय ज़िम्मेदारियों के मुताबिक़ अलग-अलग देशों को डुअल-यूज़ आइटम और टेक्नोलॉजी का एक्सपोर्ट करता है।”

इस पूरे मुद्दे पर भारत का आधिकारिक दृष्टिकोण और अंतरराष्ट्रीय रक्षा व्यापार के जमीनी नियम बिल्कुल स्पष्ट हैं।

सामान की खरीद और बिक्री की सीमाएँ: रक्षा व्यापार का सबसे बुनियादी और स्थापित अंतरराष्ट्रीय नियम यह है कि हथियार बेचने वाला देश (Seller) केवल समझौते के तहत माल की आपूर्ति करता है। वह खरीदार देश (Buyer) की अपनी सेना या युद्ध नीतियों पर दबाव नहीं बना सकता, अलबत्ता वो अमेरिका जैसा देश न हो और पाकिस्तान जैसा खरीददार न हो।

दरअसल, जब दो संप्रभु देश रक्षा सामग्री या कलपुर्जों का व्यापार करते हैं, तो उस सामग्री का अंतिम उपयोग (End Use) खरीदार देश अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा जरूरतों, रक्षा रणनीतियों और युद्ध परिस्थितियों के अनुसार तय करता है। भारत किसी देश के आंतरिक सैन्य अभियानों का माइक्रो मैनेजमेंट नहीं कर सकता यानि अगर दुनिया का कोई भी देश दूसरे देश से कोई रक्षा उपकरण खरीदता है, तो बेचने वाला देश उसके बाद यह तय नहीं कर सकता कि उस हथियार का ट्रिगर कहाँ दबेगा। व्यापार की सीमाएँ खरीद, गुणवत्ता और डिलीवरी तक ही सीमित होती हैं।  

भारत-इजरायल के संबंध: जहाँ तक भारत और इजरायल के संबंधों का प्रश्न है, दोनों देशों के बीच 1992 से पूर्ण राजनयिक संबंध हैं और दोनों के संबंध किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं बल्कि पारस्परिक सुरक्षा आवश्यकताओं पर आधारित हैं।

दुनिया को ये नहीं भूलना चाहिए कि जब साल 1999 के कारगिल युद्ध के कठिन समय में जब भारतीय सेना को द्रास और बटालिक की चोटियों पर छिपे घुसपैठियों को हटाने के लिए लेजर-गाइडेड बमों, सटीक मोर्टार और गोला-बारूद की सख्त जरूरत थी, तब कई पश्चिमी देशों ने भारत को आपूर्ति देने से मना कर दिया था। उस समय इजरायल ने भारत को तत्काल आवश्यक रक्षा सामग्री उपलब्ध कराई थी।  

आज भारत और इजरायल केवल खरीदार और विक्रेता नहीं हैं। दोनों देश बराक-8 वायु रक्षा मिसाइल प्रणाली, हर्मीस 900 मध्यम-ऊँचाई वाले ड्रोन और एडवांस्ड रडार प्रणालियों का सह-विकास और संयुक्त विनिर्माण करते हैं। इन संयुक्त उपक्रमों के तहत भारतीय कारखानों में बनने वाले कलपुर्जे इजरायली प्रणालियों में असेंबल होने के लिए जाते हैं, जो सालों पुराने वैध द्विपक्षीय समझौतों का परिणाम हैं। किसी चालू युद्ध के कारण भारत अपने लंबे समय से चले आ रहे रणनीतिक और औद्योगिक समझौतों को अचानक नहीं तोड़ सकता। ऐसा भारत ही नहीं, दुनिया का कोई भी देश नहीं कर सकता, जबकि वो अभी अपने पैरों पर खड़ा हो रहा हो।

‘आत्मनिर्भर भारत’ से पश्चिमी इकोसिस्टम और एनजीओ को चिंता क्यों?

भारत ने पिछले एक दशक में रक्षा क्षेत्र में जो बदलाव देखे हैं, वे अभूतपूर्व हैं। कभी दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक (Importer) रहने वाला भारत आज एक प्रमुख रक्षा निर्यातक (Exporter) बनने की राह पर है।

भारत का रक्षा निर्यात का रिकॉर्ड: वित्तीय वर्ष 2024-2025 में भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट ₹23,622 करोड़ (लगभग 2.84 बिलियन डॉलर) के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँचा तो वहीं 2025-2026 में भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट 62.66% बढ़कर ₹38,424 करोड़ तक पहुँच गया है।

इस एक साल में भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट ₹14,802 करोड़ तक बढ़ा, जबकि 2021-22 ये कुल आँकड़ा ही महज ₹12814 करोड़ ही था। यानी भारत ने एक साल में जितनी बढ़त हासिल की, 5 साल पहले उससे भी कम हथियार वो बेचता था। ये भारत सरकार की आत्मनिर्भरता बड़ी मिशाल है।

बीते एक दशक में भारत सरकार ने रक्षा क्षेत्र में ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ अभियानों के तहत व्यापक संरचनात्मक सुधार किए हैं। कभी दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश भारत आज अपनी जरूरतों को खुद पूरा करने के साथ-साथ डिफेंस सेक्टर में निर्यात कर रहा है।

भारत आज सिर्फ हथियारों के कलपुर्जे ही नहीं, बल्कि पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर, ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें, तेजस लड़ाकू विमान के पार्ट्स, 155 मिलीमीटर एडवांस्ड टौड आर्टिलरी गन (ATAGS), डोर्नियर विमान और आधुनिक गश्ती पोत निर्यात कर रहा है।

पश्चिमी एनजीओ और इकोसिस्टम को चिंता क्यों है?

पश्चिमी रक्षा उद्योग के एकाधिकार को चुनौती: वैश्विक रक्षा बाजार में हमेशा से अमेरिका, फ्रांस, रूस और यूरोपीय देशों का दबदबा रहा है। भारत का एक बड़े रक्षा विनिर्माता के रूप में उभरना पश्चिमी रक्षा लॉबी और उनकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए आर्थिक खतरा है।

ग्लोबल साउथ (Global South) के लिए नया विकल्प: अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और लैटिन अमेरिका के देश अब महँगे पश्चिमी हथियारों के बजाय भारत से सस्ते, टिकाऊ और उच्च गुणवत्ता वाले हथियार खरीद रहे हैं।

रणनीतिक ब्लैकमेलिंग का अंत: जब भारत पूरी तरह आयात पर निर्भर था, तब पश्चिमी देश मानवाधिकारों या नीतियों का हवाला देकर भारत को हथियार देने या पुर्जे भेजने से रोक देते थे। अब जब ‘आत्मनिर्भर भारत’ के अपने कारखाने घरेलू और वैश्विक माँग को पूरा करने में सक्षम हो गए हैं, तो पश्चिमी शक्तियों का वह पुराना दबावकारी तंत्र बेकार साबित हो रहा है यानी भारत ने इस रणनीतिक ब्लैकमेलिंग को खत्म कर दिया है।

इसीलिए एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाएँ भारत की इस बढ़ती ‘आत्मनिर्भरता’ को एक ‘चिंताजनक स्थिति’ या ‘अंतरराष्ट्रीय अपराधों में संलिप्तता’ के रूप में दिखाना चाहती हैं, ताकि भारतीय रक्षा कंपनियों पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का दबाव बनाया जा सके।

एस. जयशंकर खोल चुके हैं पश्चिमी देशों के दोहरे रवैये की पोल

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जब भी पश्चिमी देशों या उनके इकोसिस्टम ने भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और रक्षा-ऊर्जा प्राथमिकताओं पर उंगली उठाई है, भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने उसका करारा जवाब दिया।

यूरोप दौरे के दौरान जब पश्चिमी मीडिया और राजनेताओं ने रूस से तेल और हथियार खरीदने पर भारत को घेरने की कोशिश की, तो जयशंकर ने पश्चिमी दोहरे मापदंडों (Double Standards) को बेनकाब करते हुए ऐतिहासिक बयान दिया, “यूरोप की यह मानसिकता रही है कि यूरोप की समस्याएँ दुनिया की समस्याएँ हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएँ यूरोप की समस्याएँ नहीं हैं। यूरोप खुद रूस से भारी मात्रा में ऊर्जा, गैस और उर्वरक खरीद रहा है, लेकिन जब भारत अपनी 1.4 अरब आबादी की ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस से रियायती दर पर तेल खरीदता है, तो हमें उपदेश दिए जाते हैं। यूरोप को अपने यह दोहरे मापदंड तुरंत बंद करने चाहिए।”

विदेश मंत्री का यह बयान रक्षा व्यापार के क्षेत्र में भी उतना ही सटीक बैठता है। जो यूरोपीय देश और पश्चिमी मानवाधिकार संगठन भारत पर इजरायल को कलपुर्जे बेचने के लिए सवाल उठा रहे हैं, वे इस बात को पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं कि खुद पश्चिमी देश इजरायल के सैन्य तंत्र की रीढ़ बने हुए हैं। इसके बावजूद वो भारत जैसे विकासशील देशों से यह अपेक्षा करते हैं कि वे अपने राष्ट्रीय हितों और वैध द्विपक्षीय समझौतों को उनके निर्देशों पर कुर्बान कर दें।

डॉ. जयशंकर के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत का हर कदम ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) और अपने राष्ट्रीय हितों से संचालित होगा, न कि किसी पश्चिमी देश या एनजीओ की दी गई सीख से।

हालाँकि एमनेस्टी ने गाजा युद्ध और इजरायल से जुड़ी ऐसी ही रिपोर्ट्स अमेरिका (अप्रैल 2024), स्लोवेनिया (अगस्त 2025), जर्मनी (नवंबर 2025) और फ्रांस (अक्टूबर 2025) पर भी जारी की थी।

इजरायल को हथियार देने वाले प्रमुख देशों में भारत बहुत पीछे

एमनेस्टी की रिपोर्ट भारत पर ध्यान केंद्रित करती है, लेकिन असली आँकड़ों को देखने पर सच्चाई कुछ और ही निकलकर सामने आती है। इजरायल के कुल हथियार आयात में भारत का हिस्सा 1% से भी कम है। इजरायल को रक्षा सामग्री और भारी हथियारों की आपूर्ति करने वाले असली और बड़े खिलाड़ियों के बारे में तो पूरी दुनिया को पता है।

संयुक्त राज्य अमेरिका (USA): इजरायल के कुल प्रमुख हथियार आयात का लगभग 69% हिस्सा अकेले अमेरिका से आता है। अमेरिका इजरायल को F-35 लाइटनिंग II स्टेल्थ लड़ाकू विमान, F-15I और F-16I स्ट्राइक फाइटर जेट्स, गाइडेड मिसाइलें, MK-84 2,000-पाउंड भारी विनाशकारी बम, और जेडीएएम (JDAM) प्रिसिजन किट्स की आपूर्ति करता है। इसके अलावा, अमेरिका हर साल इजरायल को लगभग 3.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर की सीधी विदेशी सैन्य सहायता (FMF) प्रदान करता है।

जर्मनी (Germany): इजरायल के प्रमुख हथियारों के कुल आयात में जर्मनी की हिस्सेदारी लगभग 30% है। जर्मनी इजरायल की नौसेना को अत्याधुनिक ‘डॉल्फ़िन’ श्रेणी की डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां (जो परमाणु मिसाइलें ले जाने में सक्षम हैं), Saar 6-श्रेणी के कोरवेट युद्धपोत, और इजरायल के मुख्य युद्धक टैंक ‘मरकावा’ के लिए शक्तिशाली डीजल इंजन और ट्रांसमिशन सिस्टम की आपूर्ति करता है।

इटली, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देश: इजरायल के शेष 1% हथियार आयात में इटली (जो नौसैनिक तोपों और प्रशिक्षण विमानों के पुर्जे देता है), ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। ब्रिटेन F-35 लड़ाकू विमानों के कलपुर्जों, रडार और एवियोनिक्स सिस्टम के निर्माण में सीधे शामिल है।

सिपरी के डाटा पर आधारित (फोटो साभार : AI ChatGPT)

इन आँकड़ों को देखने के बाद ये साफ हो जाता है कि जो पश्चिमी देश 99% भारी और विनाशकारी हथियार इजरायल को भेज रहे हैं, उनके ही एनजीओ भारत द्वारा भेजे जा रहे कुछ हजार बोल्ट कैरियर्स, केसिंग और अन्य कलपुर्जों को बड़ा मुद्दा बनाकर वैश्विक मंच पर भारत की घेराबंदी करने की कोशिश कर रहे हैं।

सिपरी (SIPRI) की रिपोर्ट पर भी ध्यान देना जरूरी

स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में स्थित ‘स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (SIPRI) दुनिया भर में हथियारों के हस्तांतरण, सैन्य खर्च और निरस्त्रीकरण का सबसे विश्वसनीय और वैज्ञानिक डेटा एकत्र करने वाली संस्था मानी जाती है।  सिपरी की लेटेस्ट सालाना रिपोर्ट ‘ट्रेंड्स इन इंटरनेशनल आर्म्स ट्रांसफर्स‘ का गहरा विश्लेषण कर वैश्विक रक्षा व्यापार के असली आँकड़ों और भारत की स्थिति को निष्पक्ष रहकर समझा जा सकता है-

ट्रेंड्स इन इंटरनेशनल आर्म्स ट्रांसफर्स के आँकड़े: सिपरी के आँकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर में होने वाले कुल हथियार निर्यात का 75% से अधिक हिस्सा केवल 5 प्रमुख देशों के नियंत्रण में है। अमेरिका 42% वैश्विक शेयर के साथ शीर्ष पर है, जिसके बाद फ्रांस (11%), रूस (11%), चीन (5.8%) और जर्मनी (5.6%) का स्थान है।

सिपरी के डाटा पर आधारित (फोटो साभार : AI ChatGPT)

इजरायल के हथियारों की खरीद पर सिपरी का डेटा: सिपरी के डेटाबेस के अनुसार, इजरायल द्वारा खरीदे जाने वाले ‘प्रमुख पारंपरिक हथियारों’ (Major Conventional Weapons) जैसे लड़ाकू विमान, नौसैनिक जहाज, टैंक, वायु रक्षा प्रणालियाँ और भारी तोपखाने में भारत की हिस्सेदारी नगण्य यानी शून्य दर्ज की गई है। सिपरी स्पष्ट रूप से दर्ज करता है कि इजरायल के 99% बड़े हथियार अमेरिका (69%) और जर्मनी (30%) से आते हैं। इसका ग्राफ ऊपर दिया जा चुका है।

इसके अलावा भारत द्वारा किए जाने वाले रक्षा निर्यात को सिपरी की परिभाषा के तहत मुख्य हथियारों की श्रेणी में नहीं रखा जाता, क्योंकि भारत प्राथमिक रूप से कंपोनेंट, सब-असेंबली, और कच्ची सामग्री (Raw Material Casings) की आपूर्ति करता है, जो द्विपक्षीय औद्योगिक समझौतों का हिस्सा हैं।

सिपरी रिपोर्ट से क्या पता चलता है?: सिपरी के आँकड़े साबित करते हैं कि वैश्विक हथियार व्यापार कुछ चुनिंदा शक्तिशाली देशों के हाथों में केंद्रित है। युद्ध और संघर्ष के क्षेत्रों में सबसे ज्यादा हथियार पश्चिमी देशों से आते हैं। भारत अभी इस बाजार में एक नया और तेजी से उभरता हुआ खिलाड़ी है, जिसकी प्राथमिकता अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करना और मित्र देशों को सुरक्षा उपकरण मुहैया कराना है।

रक्षा विशेषक्ष मे.ज.(रि) दुष्यंत सिंह ने एमनेस्टी की रिपोर्ट को किया खारिज, बताया पूर्वाग्रह से ग्रसित

सेंटर फॉर लैंड वारफेयर स्टडीज (CLAWS) के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) दुष्यंत सिंह (PVSM, AVSM) ने एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट को सिरे से खारिज करते हुए इसे संगठन के पुराने पूर्वाग्रह का हिस्सा करार दिया है। ऑपइंडिया के एसोसिएट एडिटर श्रवण शुक्ला से विशेष बातचीत में उन्होंने स्पष्ट किया कि एमनेस्टी हमेशा से भारत-विरोधी रुख अपनाता रहा है। चाहे जम्मू-कश्मीर की स्थिति हो या पूर्वोत्तर का क्षेत्र, संगठन सुरक्षा बलों पर होने वाले हमलों और उनके सामने मौजूद चुनौतियों को नजरअंदाज कर केवल एकतरफा रिपोर्टिंग करता आया है।

लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) दुष्यंत सिंह (पीवीएसएम, एवीएसएम)

इजरायल के साथ भारत के रक्षा संबंधों पर बात करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल सिंह ने कहा कि साल 1992 में पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सहयोग लगातार मजबूत हुआ है। भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक जरूरतों के लिए रक्षा उपकरण प्राप्त करता है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय नियमों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि रक्षा व्यापार पूर्णतः वैध समझौतों के तहत होता है। किसी भी उपकरण या पार्ट का ‘एंड यूज़’ (अंतिम उपयोग) क्या और कैसे होगा, इसकी जिम्मेदारी खरीदने वाले देश की होती है, न कि निर्यात करने वाले देश की। भारत में निर्मित या निर्यात होने वाले कलपुर्जे और डुअल-यूज़ (दोहरे उपयोग वाली) तकनीक अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में ही स्थानांतरित होती है।

गाजा युद्ध के संदर्भ में भारत पर उठ रहे सवालों को खारिज करते हुए उन्होंने अमेरिका और पश्चिमी देशों के आँकड़ों का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि इजरायल को सैन्य सहायता देने में मुख्य भूमिका अमेरिका की है। अमेरिका अभी के समय में इजरायल को $6.6 अरब डॉलर का सैन्य पैकेज दे रहा है, जिसमें $3.8 अरब डॉलर के 30 अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर, F-15 लड़ाकू विमान, असॉल्ट वाहन और अन्य आधुनिक हथियार शामिल हैं। इसके अलावा अरबों डॉलर की विदेशी सैन्य बिक्री (FMS) और सैन्य सहायता ग्रान्ट अमेरिका द्वारा दी जाती है।

इसके विपरीत इजरायल को होने वाली कुल रक्षा आपूर्ति में भारत की हिस्सेदारी एक प्रतिशत से भी कम है और वह मुख्य रूप से कंपोनेंट तथा डुअल-यूज इलेक्ट्रॉनिक्स तक सीमित है।

लेफ्टिनेंट जनरल (रि) दुष्यंत सिंह ने कहा कि भारत की विदेश नीति पूरी तरह स्वतंत्र और रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित है। भारत के संबंध इजरायल, फिलिस्तीन, अमेरिका, रूस और ईरान सभी के साथ स्वतंत्र औरअपने राष्ट्रीय हितों के अनुकूल हैं। भारत हमेशा से वैश्विक शांति और संवाद के जरिए विवादों के समाधान का समर्थक रहा है। ऐसे में एमनेस्टी की रिपोर्ट वस्तुनिष्ठ विश्लेषण न होकर महज एक पूर्वनिर्धारित नैरेटिव गढ़ने का प्रयास है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट सिर्फ नरेटिव वॉर का हिस्सा

की रिपोर्ट को अगर तटस्थ नजरिए से देखें, तो मानवाधिकारों की चिंता करना किसी भी अंतरराष्ट्रीय संस्था का काम हो सकता है। लेकिन जब यह चिंता चुनिंदा (selective) हो जाती है, तो उस संगठन की साख पर सवाल उठना लाजमी है।

चूँकि भारत एक संप्रभु राष्ट्र है और अपने रणनीतिक हितों के आधार पर किसी भी देश के साथ रक्षा व्यापार करने के लिए स्वतंत्र है, जब तक कि वह संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक प्रतिबंधों का उल्लंघन न कर रहा हो (और इजराइल पर यूएन का कोई हथियार प्रतिबंध नहीं है)।

ऐसे में पक्षपात भरे निगेटिव नैरेटिव से सिर्फ भारत के छोटे से एक्सपोर्ट हिस्से को लेकर बड़ा विवाद खड़ा करना और उन देशों पर नरमी बरतना जो इजराइल को 95% से ज्यादा आक्रामक हथियार दे रहे हैं, एमनेस्टी के पूर्वाग्रह को दर्शाता है।

बहरहाल, भारत की स्पष्ट नीति रही है कि भारत ने न तो कभी युद्ध का समर्थन किया है और न ही वह किसी मानवीय त्रासदी का पक्षधर है। भारत अपनी रक्षा कूटनीति, राष्ट्रीय हित और मानवाधिकार सहायता के बीच संतुलन बनाना अच्छी तरह जानता है।

यहाँ ये भी बताना अहम है कि वैश्विक राजनीति में जब कोई देश ‘आत्मनिर्भर’ और मजबूत बनता है, तो उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव और नैरेटिव वॉर (Narrative War) के हमले बढ़ते हैं। ऐसे में एमनेस्टी की यह रिपोर्ट भी उसी भू-राजनीतिक (Geopolitics) खींचतान का एक हिस्सा नजर आती है।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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