तकनीक की दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर मची होड़ के बीच दिग्गज टेक कंपनी गूगल को एक बड़ा झटका लगा है। गूगल ने अपने बेहद लोकप्रिय प्लेटफॉर्म गूगल अर्थ पर लॉन्च किए गए एक ‘क्रांतिकारी’ AI इमेज-जेनरेटर फीचर को महज 24 घंटे के भीतर ही पूरी तरह से रोलबैक यानी बंद कर दिया है।
कंपनी को यह कदम तब उठाना पड़ा जब इस टूल का इस्तेमाल कर लोगों ने ऐसी फर्जी और भ्रामक तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर करनी शुरू कर दीं, जो गूगल की नीतियों का खुला उल्लंघन कर रही थीं।
शोधकर्ताओं और पत्रकारों ने चेतावनी दी कि इस टूल के जरिए दुनिया के किसी भी कोने की हूबहू नकली सैटेलाइट तस्वीरें बनाई जा सकती हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी भ्रम और गलत जानकारी फैलने का खतरा पैदा हो गया है।
क्या था यह नया AI फीचर और कैसे काम करता था?
गूगल ने गुरुवार (30 जुलाई 2026) को गूगल अर्थ के वेब वर्जन पर एक नया फीचर पेश किया था, जिसका नाम था- ‘क्रिएट इमेज’। इस टूल को गूगल के सबसे एडवांस इमेज-जेनरेशन मॉडल ‘नैनो बनाना 2’ की ताकत दी गई थी।
यह टूल यूजर को यह सुविधा देता था कि वे गूगल अर्थ पर दुनिया की किसी भी जगह या ऐतिहासिक इमारत पर जूम-इन करें और एक साधारण टेक्स्ट प्रॉम्ट टाइप करें। यह AI मॉडल गूगल अर्थ के असली सैटेलाइट,एरियल और 3D मैपिंग डेटा का इस्तेमाल करके पलक झपकते ही बिल्कुल असली दिखने वाली काल्पनिक तस्वीरें उसके ऊपर फिट कर देता था।
गूगल के प्रोडक्ट मैनेजर ब्रायन होरोविट्ज ने इसे लॉन्च करते समय कहा था, “यह फीचर लोगों की कल्पनाओं को सच करने के लिए बनाया गया है बस गूगल अर्थ पर किसी जगह पर जाएँ, क्रिएट इमेज पर टैप करें और जो देखना चाहते हैं उसे टाइप करें।”
लॉन्च के तुरंत बाद क्यों खड़ा हुआ विवाद?
जैसे ही यह टूल आम जनता के हाथ लगा, वैसे ही ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) एक्सपर्ट्स, शोधकर्ताओं और खोजी पत्रकारों ने इसकी कमियों और खतरनाक पहलुओं को खोजना शुरू कर दिया। इस टूल की सबसे बड़ी आलोचना यह थी कि इससे ऐतिहासिक इमारतों और संवेदनशील जगहों को लेकर बिल्कुल असली जैसे नकली दृश्य बनाए जा सकते थे।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि सैटेलाइट इमेजरी को अब तक दुनिया में सबसे भरोसेमंद डेटा माना जाता रहा है, क्योंकि इसे सैकड़ों मील ऊपर अंतरिक्ष में मौजूद कैमरों से लिया जाता है और इसे बदलना या फेक बनाना आसान नहीं होता लेकिन गूगल के इस टूल ने एक क्लिक में फर्जी सैटेलाइट तस्वीरें बनाना इतना आसान कर दिया कि कोई भी आम इंसान धोखा खा जाए।
एक्सपर्ट्स ने क्या-क्या फर्जी तस्वीरें बनाकर दिखाईं?
BBC वेरीफाई और प्रमुख ओपन-सोर्स रिसर्चर हेंक वैन एस्स ने इस टूल की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलने के लिए कई टेस्ट किए। उन्होंने ऐसे प्रॉम्ट्स डाले जो बेहद संवेदनशील और खतरनाक थे लेकिन गूगल के AI ने उन्हें बिना किसी रोक-टोक के बना दिया।
अगर हेंक वैन एस्स के टेस्ट की बात करें तो उन्होंने ईरान में एक काल्पनिक न्यूक्लियर प्लांट, अमेरिका-मेक्सिको सीमा पर शरणार्थियों का जमावड़ा, एम्स्टर्डम में एक बड़ा हादसा और गाजा में एक अस्पताल के ठीक बगल में बम गिरने से बना गड्ढा जैसी तस्वीरें आसानी से बना लीं।
वहीं, BBC वेरीफाई की टीम ने अपनी टेस्टिंग में फ्रांस के एफिल टॉवर को ढहते हुए, मिस्र के गीजा पिरामिड को एक बड़े गड्ढे में समाते हुए और यूक्रेन की राजधानी कीव की सड़कों पर रूसी टैंकों को घूमते हुए दिखा दिया।
इसके अलावा अन्य मीडिया टेस्ट के दौरान कुछ पत्रकारों ने ईरान के खार्ग द्वीप पर भीषण आग लगने और अमेरिकी संसद में भयानक बाढ़ आने जैसी तस्वीरें भी जनरेट कर लीं, जो अगर सच होतीं तो दुनिया भर की मीडिया के लिए बहुत बड़ी और संवेदनशील खबर बन जातीं।
एक्सपर्ट हेंक वैन एस्स ने चिंता जताते हुए कहा, “इस टूल में सबसे खतरनाक बात यह थी कि एक मनगढ़ंत और फर्जी तस्वीर को बिल्कुल असली कोऑर्डिनेट्स और असली मैप के ऊपर जोड़ दिया जाता था। जालसाजी को खुद में बहुत ज्यादा असली दिखने की जरूरत नहीं थी क्योंकि उसे उस नक्शे से विश्वसनीयता मिल जा रही थी जिस पर उसे बनाया गया था।”
गूगल ने अपने बचाव में क्या दलील दी और पॉलिसी क्या थी?
विवाद बढ़ने के बाद गूगल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स और मीडिया आउटलेट्स को दिए बयानों में अपनी सफाई पेश की। गूगल ने कहा कि वह मिसइन्फॉर्मेशन को लेकर बेहद गंभीर है।
कंपनी ने बताया कि इस टूल से बनने वाली हर तस्वीर में ‘सिंथआईडी’ डिजिटल वॉटरमार्क लगाया गया था। यह एक अदृश्य मार्कर होता है जो AI द्वारा बनाई गई तस्वीरों में छिप जाता है। अगर किसी यूजर को किसी तस्वीर पर शक हो, तो वह गूगल के जेमिनी चैटबॉट से पूछ सकता है या गूगल लेंस का इस्तेमाल करके यह पता लगा सकता है कि इमेज असली है या AI से बनी है।
साथ ही गूगल ने दावा किया कि उनकी पॉलिसी के तहत हानिकारक विषयों पर इमेज बनाने की मनाही है और वे अपनी सुरक्षा प्रणालियों को लगातार अपडेट कर रहे हैं। इसके अलावा यह तस्वीरें मुख्य गूगल अर्थ एक्सपीरियंस में आम जनता को सीधे नहीं दिखती थीं बल्कि केवल वही यूजर इन्हें देख और डाउनलोड कर सकता था जो इन्हें बना रहा था।
सुरक्षा कवच में चूक, कैसे फेल हो गए गूगल के दावे?
गूगल ने जो सुरक्षा दावे किए थे, जमीनी हकीकत में वे पूरी तरह नाकाम साबित हुए। BBC वेरीफाई की पड़ताल में सामने आया कि गूगल के सुरक्षा नियमों को बहुत आसानी से चकमा दिया जा सकता था।
यूजर द्वारा प्रॉम्ट बदलकर सेफ्टी फीचर्स को बाईपास करना काफी आसान था, जैसे जब टूल से ब्रिटेन की संसद के पास देशद्रोहियों को फांसी देने के लिए मंच बनाने को कहा गया, तो सिस्टम ने इसे रिजेक्ट कर दिया था लेकिन जैसे ही थोड़े घुमावदार और कम स्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल किया गया, AI ने तुरंत वैसी ही तस्वीर बनाकर दे दी।
इसी तरह व्हाइट हाउस के लॉन पर ट्रंप लिखने से मना करने वाले टूल ने उसी जगह पर एक कम्युनिटी गार्डन बनाने की इजाजत दे दी। इसके साथ ही वॉटरमार्क और डिटेक्शन की नाकामी भी देखने को मिली।
हालाँकि, गूगल के टूल्स शुरुआती तौर पर वॉटरमार्क पहचान पा रहे थे लेकिन BBC ने पाया कि कुछ तरीकों से इन चेक्स को भी बाईपास किया जा सकता था और जेमिनी को यह झूठ बोलने के लिए मजबूर किया जा सकता था कि ये फर्जी तस्वीरें असली हैं। इसके अलावा बाजार में मौजूद अन्य बाहरी AI डिटेक्टर टूल्स भी इन तस्वीरों को पहचानने में पूरी तरह फेल हो गए।
सैटेलाइट इमेजरी के भरोसे पर क्या असर पड़ेगा?
इस मामले ने पूरी दुनिया के पत्रकारों, फैक्ट-चेकर्स और जियोपॉलिटिकल विश्लेषकों को डरा दिया है। अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के सैटेलाइट इमेजरी विश्लेषक ब्रैडी एफ्रिक ने बताया कि इस अपडेट ने बहुत ही ठोस दिखने वाली फर्जी सैटेलाइट तस्वीरें बनाना बच्चों का खेल बना दिया, जिससे ये तस्वीरें इंटरनेट पर आग की तरह फैल सकती हैं और जनता को आसानी से गुमराह कर सकती हैं।
बैलिंगकैट के सीनियर रिसर्चर जेक गोडिन ने कहा कि पहले भी युद्ध के दौरान ऐसी फर्जी तस्वीरें सामने आई हैं, जैसे इजरायल-इरान तनाव के समय बहरीन में एक अमेरिकी बेस के तबाह होने की फर्जी तस्वीर ईरानी मीडिया में चलाई गई थी। लेकिन गूगल जैसे बड़े प्लेटफॉर्म द्वारा यह टूल सीधे यूजर्स को दे देने से फर्जी इमेजरी बनाने की प्रक्रिया बहुत तेज हो गई।
इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होगा कि आने वाले समय में जब वास्तविक युद्ध क्षेत्रों या मानवाधिकार उल्लंघनों की असली सैटेलाइट तस्वीरें सामने आएँगी, तो दोषी सरकारें और प्रॉपगैंडा चलाने वाले लोग बड़ी आसानी से यह कहकर पल्ला झाड़ लेंगे कि “यह तो AI से बनी नकली तस्वीर है।” इससे भविष्य में सच और झूठ की पहचान करना और भी मुश्किल हो जाएगा।
टेक इंडस्ट्री में मची हड़बड़ी का एक और उदाहरण
गूगल अर्थ का यह मामला कोई अकेला उदाहरण नहीं है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को अपने प्रोडक्ट्स में शामिल करने की अंधी दौड़ में बड़ी-बड़ी टेक कंपनियां लगातार गलतियाँ कर रही हैं और फिर आलोचना होने पर फीचर्स को बंद कर रही हैं।
हाल ही में मेटा कंपनी ने भी अपने एक AI फीचर ‘म्यूज इमेज’ को बंद कर दिया था। इस फीचर के जरिए लोग इंस्टाग्राम के पब्लिक अकाउंट्स की तस्वीरों का इस्तेमाल करके नई AI तस्वीरें बना पा रहे थे, जिसका हॉलीवुड यूनियनों और प्राइवेसी एक्टिविस्ट्स ने कड़ा विरोध किया था।
गूगल ने आखिरकार अपनी गलती मानते हुए एक्स पर लिखा हम जानते हैं कि लोग दुनिया के एक विश्वसनीय नजारे के लिए गूगल अर्थ पर अनोखा भरोसा करते हैं।
हमने देखा कि जियोस्पेशियल प्रोफेशनल्स ने इस फीचर का कई अच्छे कामों के लिए इस्तेमाल किया लेकिन कुछ लोगों ने ऐसी तस्वीरें भी शेयर कीं जो हमारी नीतियों के खिलाफ हैं। इसलिए हम गूगल अर्थ से इस फीचर को फिलहाल हटा रहे हैं। जब तक कि हम इस पर और मजबूत सुरक्षा घेरा लागू नहीं कर देते।


