भारत ने सिंधु जल संधि (IWT) के तहत तथाकथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (CoA) द्वारा दिए गए ताजा फैसले को सिरे से खारिज कर दिया है। भारत ने इस ट्रिब्यूनल को ‘अवैध तरीके से गठित’ बताया और इसके सभी फैसलों को ‘निरस्त और अमान्य’ कहा है।
विदेश मंत्रालय (MEA) ने मीडिया के सवालों के जवाब में कहा कि 15 मई 2026 को सिंधु जल संधि की सामान्य व्याख्या से जुड़े मुद्दों पर दिए गए फैसले के पूरक के रूप में अधिकतम जल भंडारण क्षमता (मैक्सिमम पॉन्डेज) से संबंधित फैसला जारी किया गया, जिसे अवैध तरीके से गठित तथाकथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने दिया है।
विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने अपने बयान में कहा, “अवैध तरीके से गठित तथाकथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (CoA) ने 15 मई 2026 को वह फैसला जारी किया है, जिसे उसने सिंधु जल संधि की सामान्य व्याख्या से जुड़े मुद्दों पर दिए गए फैसले के पूरक के रूप में अधिकतम पॉन्डेज से संबंधित अवॉर्ड बताया है। भारत इस तथाकथित फैसले को पूरी तरह खारिज करता है, जैसे उसने इससे पहले CoA के सभी फैसलों को दृढ़ता से खारिज किया था।”
उन्होंने आगे कहा, “भारत ने कभी भी इस तथाकथित CoA की स्थापना को मान्यता नहीं दी है। इसके द्वारा जारी की गई कोई भी कार्यवाही, फैसला या आदेश पूरी तरह निरस्त और अमान्य है। सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का भारत का फैसला अभी भी लागू है।”
मध्यस्थता का फैसला
15 मई को जारी यह फैसला ‘मैक्सिमम पॉन्डेज’ यानी सीमित अस्थायी जल भंडारण की तकनीकी व्यवस्था से जुड़ा पूरक फैसला था। सिंधु जल संधि के तहत भारत को सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों पर रन-ऑफ-द-रिवर हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजनाएँ बनाने की अनुमति है।
यह फैसला अगस्त 2025 में CoA द्वारा दिए गए ‘सामान्य व्याख्या’ वाले फैसले के बाद आया, जिसमें भारत की परियोजनाओं में स्थापित क्षमता, अनुमानित लोड और पॉन्डेज सीमा की गणना के तरीके पर आगे की सुनवाई की गई थी।
यह विवाद पाकिस्तान की ओर से भारत की किशनगंगा (झेलम नदी पर) और रातले (चिनाब नदी पर) जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन पर उठाई गई आपत्तियों से शुरू हुआ था।
विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई सिंधु जल संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों के इस्तेमाल को भारत और पाकिस्तान के बीच बाँटा गया है। पाकिस्तान ने हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन में मामला दायर कर भारतीय परियोजनाओं के डिजाइन मानकों पर फैसला देने की माँग की थी।
भारत लगातार कहता रहा है कि ऐसे तकनीकी मतभेदों का समाधान संधि के तहत तय न्यूट्रल एक्सपर्ट व्यवस्था से होना चाहिए, न कि कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन से, क्योंकि भारत इसे अधिकार क्षेत्र से बाहर मानता है। भारत ने CoA की कार्यवाही में हिस्सा लेने से इनकार किया है और पाकिस्तान प्रायोजित सीमा पार आतंकवाद के विरोध में पूरी सिंधु जल संधि को ही स्थगित कर रखा है।
यह पहली बार नहीं है जब भारत ने CoA के किसी फैसले को खारिज किया हो। नई दिल्ली इससे पहले भी ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र और संधि की सामान्य व्याख्या से जुड़े सभी फैसलों को इसी आधार पर अस्वीकार करती रही है।

