जनगणना 2027 के जनसंख्या गणना चरण के साथ ही कराई जाने वाली जाति जनगणना में प्रविष्टियों को दर्ज करने के लिए ‘ओपन कॉलम’ का इस्तेमाल किया जाएगा। रिपोर्टों के अनुसार, यह प्रारूप भारत के महा रजिस्ट्रार (RGI) द्वारा लिए गए निर्णय के अनुपालन में अंतिम रूप दिया गया है।
यह ‘ओपन कॉलम फॉर्मेट’ उस ‘ड्रॉप-डाउन मेनू फॉर्मेट’ से अलग है जिसमें लोगों को चुनने के लिए विकल्प दिए जाते हैं। ओपन-कॉलम प्रारूप में, जब जाति जनगणना के दौरान लोगों से उनकी जाति पूछी जाएगी, तो उन्हें चुनने के लिए कोई विकल्प या श्रेणियाँ नहीं दी जाएँगी। इसके बजाय, उन्हें इस खुले कॉलम में खुद अपनी जातिगत पहचान दर्ज करनी होगी। लोगों के जवाबों को बिना किसी जाति, उप-जाति या अन्य संबंधित श्रेणियों में बाँटे, ठीक वैसा ही दर्ज किया जाएगा जैसा वे बताएँगे।
द इंडियन एक्सप्रेस ने गृह मंत्रालय (MHA) के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से कहा, “आखिरकार यह तय किया गया है कि जाति गणना के लिए किसी भी ड्रॉपडाउन मेनू या अन्य साधन का उपयोग नहीं किया जाएगा। लोगों को बस अपनी जाति बतानी होगी और उसे ठीक वैसे ही दर्ज कर लिया जाएगा। प्रगणकों (Enumerators) से यह अपेक्षा नहीं की जाती है कि वे किसी उपनाम या उप-जाति को किसी विशेष जाति श्रेणी में वर्गीकृत करें। सभी उत्तरों को हुबहू दर्ज किया जाएगा।”
हालाँकि यह निर्णय चुनौतीपूर्ण है। इसी तरह जातिगत डेटा दर्ज करने का तरीका 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) के दौरान भी अपनाया गया था। वह प्रयास एक तरह से विफल साबित हुआ था, क्योंकि तब एकत्र किए गए जाति डेटा में लगभग 46.7 लाख अलग-अलग जातियों के नाम निकलकर सामने आ गए थे।
यह संख्या 1931 की अंतिम व्यापक जाति जनगणना में दर्ज 4147 जातियों की तुलना में काफी ज्यादा थे। चूँकि उत्तरदाताओं ने स्वयं जातियों के नाम दर्ज कराए थे, इसलिए एकत्र किया गया जातिगत डेटा किसी जाति रजिस्ट्री में फिट नहीं बैठ सका। नतीजतन केंद्र सरकार को इस जातिगत डेटा को सार्वजनिक करने से रोकना पड़ा था।
एक केंद्रीय मंत्री ने इस पर कथित तौर पर कहा, “हाँ, यह सच है कि इस तरह के सवाल से 2011 जैसे परिणाम मिलने की पूरी संभावना है। लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं? हमने हमेशा यह माना है कि इसमें शामिल जटिलताओं के कारण जाति जनगणना से खराब डेटा सामने आने की पूरी गुंजाइश रहती है। लेकिन विपक्ष राजनीतिक कारणों से इसकी माँग करता रहा है। हमने इसे स्वीकार कर लिया है। अब वे ही इसके अंतिम डेटा से निपटें।”
2011 के SECC के दौरान यही व्यवस्था विफल होने के बावजूद, सरकार का मानना है कि राज्यों (सरकार) को जातिगत पहचान का निर्णायक बने बिना जाति डेटा दर्ज करने के लिए यह ‘ओपन कॉलम’ तरीका ही सबसे उपयुक्त है।
गृह मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार, जनगणना के दौरान एकत्र किया गया जातिगत डेटा वैसे भी बहुत भरोसेमंद नहीं होता है, क्योंकि गणना करने वालों के पास उत्तरदाताओं द्वारा दी गई जानकारी को सत्यापित करने का कोई साधन नहीं होता।
इसलिए इस ओपन कॉलम प्रारूप के पीछे का मूल तर्क डेटा संग्रह प्रक्रिया में सरकार के हस्तक्षेप को पूरी तरह से समाप्त करना है। हालाँकि ये डेटा खुद ही पूरा सटीक नहीं माना जा सकता।

