बांग्लादेश ने अपने दूसरे सबसे बड़े समुद्री बंदरगाह मोंगला पोर्ट के विकास और आधुनिकीकरण के लिए चीन के साथ समझौता कर लिया है। कोलकाता से सिर्फ 188 किलोमीटर दूर यह वही पोर्ट है जिसे भारत रणनीतिक सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानता रहा है।
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की चीन यात्रा के दौरान राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई बैठक के बाद दोनों देशों ने मोंगला पोर्ट, आर्थिक क्षेत्र और तीस्ता नदी परियोजना में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है। इस कदम को भारत और चीन के बीच क्षेत्रीय रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के नजरिए से भी देखा जा रहा है।
मोंगला पोर्ट और आर्थिक क्षेत्र में चीन की बढ़ी भूमिका
चीन और बांग्लादेश ने मोंगला पोर्ट के आधुनिकीकरण और विस्तार परियोजना को मिलकर आगे बढ़ाने का फैसला किया है। इसके साथ ही मोंगला पोर्ट के पास 110 एकड़ जमीन पर चीनी कंपनी आर्थिक और औद्योगिक क्षेत्र विकसित करेगी। यहाँ विनिर्माण इकाइयाँ, गोदाम और स्टोरेज सुविधाएँ बनाई जाएँगी।
यह जमीन पहले भारत के लिए प्रस्तावित आर्थिक क्षेत्र के लिए तय की गई थी। हालाँकि 2025 में अंतरिम सरकार ने भारत की परियोजना को सूची से हटा दिया और अब उसी स्थान पर चीन को विकास की जिम्मेदारी दी गई है। इसके अलावा दोनों देशों ने चटगाँव में भी चीनी आर्थिक और औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने पर जोर दिया है।
तीस्ता नदी और बेल्ट एंड रोड परियोजना पर भी बनी सहमति
दोनों देशों ने चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) के तहत सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति जताई है। संयुक्त बयान में जल संसाधन प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण, नदी की ड्रेजिंग और आधुनिक तकनीक साझा करने की बात कही गई है।
चीन ने तीस्ता नदी के व्यापक प्रबंधन और पुनर्स्थापना परियोजना में अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग देने का भरोसा दिया है। दोनों देशों के विशेषज्ञ इस परियोजना की व्यवहार्यता रिपोर्ट और अन्य तकनीकी कार्यों को तेजी से आगे बढ़ाएँगे। साथ ही समुद्री मामलों में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति बनी है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है मोंगला पोर्ट
मोंगला पोर्ट भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। यह कोलकाता के काफी करीब स्थित है और इसके जरिए असम, त्रिपुरा, मेघालय समेत पूर्वोत्तर राज्यों तक सामान पहुँचाने का समुद्री रास्ता छोटा और सस्ता हो सकता है।
भारत इस पोर्ट को सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकेन नेक) के विकल्प के रूप में भी देखता रहा है। यह संकरा भूभाग पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। ऐसे में मोंगला पोर्ट भारत की कनेक्टिविटी और सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा माना जाता रहा है।
भारत और बांग्लादेश ने 2015 में मोंगला और मीरसराय में आर्थिक क्षेत्र विकसित करने के लिए समझौता किया था। 2018 में भारत ने मोंगला पोर्ट के उपयोग को लेकर भी समझौता किया, जिसके तहत पूर्वोत्तर राज्यों तक सामान पहुँचाने के लिए इस बंदरगाह का इस्तेमाल किया जाना था।
भारत ने इसके लिए ट्रायल रन भी किए थे और हिरेनंदानी समूह को आर्थिक क्षेत्र विकसित करने की जिम्मेदारी दी गई थी। लेकिन 2024 में शेख हसीना सरकार के सत्ता से हटने और उसके बाद बदले राजनीतिक हालात के कारण यह परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।
भारत-चीन के बीच बढ़ सकती है रणनीतिक प्रतिस्पर्धा
विशेषज्ञों का मानना है कि मोंगला पोर्ट में चीन की बढ़ती मौजूदगी भारत के लिए नई रणनीतिक चुनौती बन सकती है। चीन पहले से ही हिंद महासागर क्षेत्र में कई बंदरगाह परियोजनाओं में निवेश कर चुका है और अपनी समुद्री पहुँच लगातार बढ़ा रहा है।
हालाँकि बंदरगाह में निवेश का मतलब सीधे सैन्य उपयोग नहीं होता, लेकिन चीन पर पहले भी विदेशी बंदरगाहों का इस्तेमाल निगरानी और रणनीतिक गतिविधियों के लिए करने के आरोप लगते रहे हैं। वहीं तीस्ता नदी परियोजना में चीन की भागीदारी भी भारत की चिंता बढ़ा सकती है, क्योंकि यह इलाका सिलीगुड़ी कॉरिडोर के बेहद करीब है।
फिलहाल बांग्लादेश का कहना है कि वह चीन के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ाना चाहता है लेकिन साथ ही भारत के साथ अपने पुराने संबंध भी बनाए रखना चाहता है।

