पाकिस्तान में 27वें संशोधन से फौज को मुकदमों से छूट, UN ने कहा- न्यायपालिका कमजोर, संवैधानिक तख्तापलट की कोशिश: वोल्कर टर्क बोले- खतरे में लोकतंत्र

पाकिस्तान में 13 नवंबर 2025 को पारित 27वें संवैधानिक संशोधन को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विरोध  हो रहा हैं। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने शुक्रवार (28 नवंबर 2025) को जारी बयान में कहा कि यह संशोधन न्यायपालिका की स्वतंत्रता, फौजी जवाबदेही और कानून के शासन की बुनियाद को कमजोर कर सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह के बदलाव पाकिस्तान के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए दूरगामी प्रभाव पैदा कर सकते हैं।

इस संशोधन के तहत पाकिस्तान ने एक नई संघीय संवैधानिक कोर्ट (FCC) का गठन किया है, जिसे संवैधानिक मामलों की सुनवाई का अधिकार सौंपा गया है। यह अधिकार अब सुप्रीम कोर्ट के पास नहीं रहेगा। सुप्रीम कोर्ट केवल सिविल और आपराधिक मामलों तक सीमित रह जाएगा। यह बदलाव पाकिस्तान की न्यायिक संरचना में बड़ा परिवर्तन है।

आजीवन आपराधिक मुकदमों से मुक्ति

सबसे विवादित प्रावधानों में से एक वह है जिसमें राष्ट्रपति, फील्ड मार्शल, एयर फोर्स मार्शल और नौसेना के एडमिरल को आजीवन आपराधिक मुकदमों और गिरफ्तारी से छूट दी गई है। यह प्रावधान फौज और राजकीय नेतृत्व को अभूतपूर्व सुरक्षा देता है।

मानवाधिकार समूहों का कहना है कि यह कदम फौज के प्रभाव को बढ़ावा देगा और जवाबदेही जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करेगा। आलोचकों का दावा है कि इससे मौजूदा आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर की शक्तियाँ असंतुलित रूप से बढ़ जाएँगी।

वोल्कर टर्क ने कहा कि यह संशोधन बिना किसी सार्वजनिक चर्चा, कानूनी विशेषज्ञों की सलाह या नागरिक समाज की भागीदारी के लागू किया गया, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बिल्कुल विपरीत है। उन्होंने यह भी कहा कि जजो की नियुक्ति, पदोन्नति और स्थानांतरण से जुड़े नए प्रावधान कोर्ट को राजनीतिक हस्तक्षेप के दायरे में ला सकते हैं।

संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रिया  

संयुक्त राष्ट्र ने पाकिस्तान से इन संशोधनों पर पुनर्विचार करने और नागरिक समाज की राय शामिल करने की अपील की है। मानवाधिकार संगठनों ने इसे ‘संवैधानिक तख्तापलट’ का उदाहरण देते हुए कहा कि यह कदम न्यायपालिका को कमजोर कर फौज के वर्चस्व को और मजबूत कर सकता है। टर्क ने यह भी कहा कि “पाकिस्तान की जनता लोकतंत्र और कानून के शासन को महत्व देती है और इन सिद्धांतों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है।”