उत्तराखंड में मदरसों के संचालन और मान्यता को लेकर राज्य सरकार ने नियमों को सख्त कर दिया है। अल्पसंख्यक प्राधिकरण ने स्पष्ट कर दिया है कि तय मानकों को पूरा किए बिना अब किसी भी मदरसे को मजहबी शिक्षा देने की अनुमति नहीं दी जाएगी। सरकार ने 11 नए नियम बनाए हैं जिसमें सभी संस्थानों को शिक्षा विभाग से दोबारा मान्यता लेना भी अनिवार्य कर दिया गया है।
अधिकारियों की सख्ती, रिपोर्ट तलब
नए नियमों को लेकर शनिवार (28 मार्च 2026) को अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की ओर से एक अहम बैठक आयोजित की गई, जिसमें मदरसा संचालकों को सभी मानकों का पालन करने के निर्देश दिए गए। अधिकारियों ने चेतावनी दी कि नियमों की अनदेखी करने वाले संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
राज्य में इस समय सैकड़ों मान्यता प्राप्त मदरसे संचालित हैं, जिनमें बड़ी संख्या में छात्र तालीम प्राप्त कर रहे हैं। इसी को देखते हुए संबंधित अधिकारियों ने विभिन्न जिलों से विस्तृत रिपोर्ट माँगी है, ताकि यह आँकलन किया जा सके कि कितने संस्थान नए मानकों पर खरे उतरते हैं।
सरकार का कहना है कि यह कदम शिक्षा व्यवस्था को अधिक जवाबदेह बनाने और किसी भी प्रकार की अनियमितता पर रोक लगाने के उद्देश्य से उठाया गया है।
सख्त मानकों के साथ नई मान्यता प्रक्रिया लागू
अब मदरसों को कई अनिवार्य शर्तों को पूरा करना होगा। संस्थान का संचालन अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा होना चाहिए और उसका विधिवत पंजीकरण सोसायटी रजिस्ट्रार के पास दर्ज होना जरूरी है। जमीन का स्वामित्व भी संबंधित सोसायटी के नाम पर होना चाहिए और संस्थान का किसी मान्यता प्राप्त शिक्षा परिषद से संबद्ध होना अनिवार्य किया गया है।
सरकार ने वित्तीय पारदर्शिता पर भी जोर दिया है, जिसके तहत सभी लेनदेन संस्थान के आधिकारिक बैंक खाते के माध्यम से ही किए जाएँगे। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाएगा कि मौलवियों की नियुक्ति केवल योग्य और डिग्रीधारी व्यक्तियों में से ही हो। अधिकारियों ने साफ किया है कि शैक्षणिक, प्रशासनिक और वित्तीय मामलों में तय दिशा-निर्देशों का पालन करना हर संस्था के लिए जरूरी होगा।

