इलाज का ख़र्च उठाने में असमर्थ दंपति ने 1 साल की बेटी की ‘इच्छा मृत्यु’ के लिए माँगी कोर्ट से अनुमति

"मैं एक दिहाड़ी मज़दूर हूँ और मुझे एक दिन के काम के लिए 300 रुपए मिलते हैं। ज़्यादातर, मुझे यह काम साल में केवल चार महीने के लिए मिलता है। मेरी स्थिति ऐसी है कि मेरे पास कोई अन्य विकल्प नहीं है।"

आंध्र प्रदेश में एक दंपति ने अदालत में अर्ज़ी दाखिल कर अपनी एक साल की बेटी की इच्छा मृत्यु की अनुमति माँगी क्योंकि वो उसके इलाज का ख़र्च उठाने में असमर्थ है। दरअसल, बावजान और शबाना ने अपनी बेटी सुहाना के लिए इच्छा मृत्यु की अनुमति माँगते हुए गुरुवार (10 अक्टूबर) को चित्तूर ज़िले के मदनापल्ले शहर की एक पारिवारिक अदालत में याचिका दायर की।

दंपति ने अपनी दया याचिका में कहा कि उनकी बेटी सुहाना जन्म के बाद से ही हाइपोग्लाइसीमिया से पीड़ित है। अब तक विभिन्न अस्पतालों में हुए उसके इलाज में 12 लाख रुपए तक ख़र्च हो चुके हैं, लेकिन उसकी हालत में कोई सुधार नहीं है।

एक स्थानीय मीडिया आउटलेट से बात करते हुए, बावजान ने कहा,

“मैं एक दिहाड़ी मज़दूर हूँ और मुझे एक दिन के काम के लिए 300 रुपए मिलते हैं। ज़्यादातर, मुझे यह काम साल में केवल चार महीने के लिए मिलता है। मेरी स्थिति ऐसी है कि मेरे पास कोई अन्य विकल्प नहीं है।”

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उन्होंने बताया कि अपनी बेटी के इलाज के लिए उन्होंने अपनी संपत्ति और गहने तक बेच दिए, लेकिन अब उनके पास इलाज के लिए पैसा नहीं है, इसलिए हमने दया की भीख़ के माँगते हुए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। 2016 में, आंध्र के पाँच वर्षीय महेश, जो जन्म से हड्डी के कैंसर से पीड़ित था, बेंगलुरु के इंदिरा अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मृत्यु हो गई थी।

उसकी मृत्यु से ठीक एक सप्ताह पहले, लड़के के पिता बुट्टैया ने आंध्र के चित्तूर में एक स्थानीय अदालत में एक याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने अपने बेटे के लिए इच्छामृत्यु की माँग की थी।

मार्च 2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि गरिमा के साथ मृत्यु एक मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को क़ानूनन वैध ठहराया था। एक विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करते हुए कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि जब तक सरकार इस संबंध में क़ानून नहीं बना देती तब तक ये दिशा-निर्देश लागू रहेंगे। 

निष्क्रिय इच्छा मृत्यु (Passive euthanasia) एक ऐसी स्थिति है जिसमें रोगी कभी ठीक ना हो पाने वाली बीमारी से पीड़ित हों और घोर पीड़ा के दंश को झेल रहे हों। उन्हें सम्मान के साथ अपना जीवन ख़त्म करने की अनुमति है। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली पाँच जजों की संवैधानिक बेंच ने ‘निष्क्रिय इच्छा मृत्यु’ और ‘लिविंग विल’ को कुछ शर्तों के साथ अनुमति दी थी।

‘लिविंग विल’ एक तरह का लिखित दस्तावेज़ होता है जिसमें कोई रोगी पहले से यह निर्देश देता है कि मरणासन्न स्थिति में पहुँचने या रज़ामंदी नहीं दे पाने की स्थिति में पहुँचने पर उसे किस तरह का इलाज दिया जाए। वहीं, निष्क्रिय ‘इच्छा मृत्यु’ की स्थिति एक ऐसी स्थिति होती है जब किसी मरणासन्न व्यक्ति के जीवनरक्षक सपोर्ट को रोक दिया जाए या बंद कर दिया जाए।

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