विषय: धर्म

छठ- बिहार की पहचान, बिहारियों की सांस्कृतिक गर्भनाल

छठ पर्व के चार दिन: क्यों होता है छठ, कैसे होती है पूजा, क्या हैं इसके मायने; सब विस्तार से

सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं। छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है। प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण (ऊषा) और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अर्घ्य देकर दोनों का नमन किया जाता है।
ग्वालियर जेल, गीता

हत्या के गुनहगार अकील पठान ने गीता पढ़ने की जताई इच्छा, ग्वालियर के केंद्रीय कारागार में है कैद

"जो देश के संविधान के ख़िलाफ़ जाता है, वो जेल में जाता है। इसी तरह जो आध्यात्म के संविधान का उल्लंघन करता है, वो जीवन चक्र में फँस जाता है। गीता को मानव जीवन के संविधान के रूप में स्वीकार करना चाहिए।"
माँ दुर्गा

शक्ति का प्रत्युत्तर शक्ति से ही देना होगा, तभी म्लेच्छ शक्तियों की पराजय निश्चित होगी

हाँ, हमें मौलिक आराधना करनी होगी, शक्ति का प्रत्युत्तर शक्ति से ही देना होगा, शिव और शक्ति को एक साथ साधना ही होगा, तभी इन म्लेच्छ शक्तियों की पराजय निश्चित होगी। जब तक सिद्धि न हो, समर को टाल कर सिद्धि करनी होगी…
रावण, रम्भा, रामायण

जब रावण ने पत्थर पर लिटा कर अपनी बहू का ही बलात्कार किया… वो श्राप जो हमेशा उसके साथ रहा

जानिए वाल्मीकि रामायण की उस कहानी के बारे में, जो 'रावण ने सीता को छुआ तक नहीं' वाले नैरेटिव को ध्वस्त करती है। रावण विद्वान था, संगीत का ज्ञानी था और शिवभक्त था। लेकिन, उसने स्त्रियों को कभी सम्मान नहीं दिया और उन्हें उपभोग की वस्तु समझा।
सबरीमाला

साल भर बाद भी सबरीमाला के सवाल बरकरार, आस्था को भौतिकतावादी समाजशास्त्र से बचाने की ज़रूरत

आस्था नितांत निजी विषय है। सार्वजनिक जीवन और समाज जिस तर्क और भौतिक नियम से चालित होते हैं, उनसे आस्था समेत निजी विषयों के नियम-कानून नहीं बन सकते। नियम सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए होते हैं जो समाज और सार्वजनिक क्षेत्र में लागू होते हैं।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह

‘स्त्री की मर्यादा कैसे रखी जाती है, रामायण में वर्णन हैं, स्त्री की मर्यादा के लिए युद्ध उचित है तो होना चाहिए’

"रामायण में कई ऐसे काव्य हैं जो ज्ञान-विज्ञान, सुशासन सबका वर्णन करते हैं। स्त्री की मर्यादा कैसे रखी जाती है उसका रामायण में वर्णन है। स्त्री की मर्यादा के लिए युद्ध उचित है तो होना चाहिए।"
गीता प्रेस

जिसने घर-घर तक गीता पहुँचाया, धर्म की सेवा ‘घाटे का सौदा’ नहीं की सीख दी, उनकी जयंती पर नमन🙏

बंगाली बड़ी तेज़ी से हिन्दू से ईसाई बनते जा रहे थे। कारण था - कलकत्ता ईसाई मिशनरी। यहाँ बाइबिल के अलावा ईसाईयों की अन्य किताबें (जिनमें हिन्दू धार्मिक परम्पराओं के अनादर से लेकर झूठ तक भरा होता था, ) सहज उपलब्ध थीं। तभी युवा हनुमान प्रसाद पोद्दार ने...
देवदत्त पटनायक

‘कहाँ है वेदों में शिव?’ देवदत्त ‘नालायक’ ने जब यह पूछा तो वेद का उदाहरण दे लोगों ने रगड़ दिया

पटनायक दावा करते हैं कि वेदों में कहीं भी भगवान शिव का ज़िक्र ही नहीं है। इसके बाद भारतीय इतिहास के बारे में ट्वीट करने वाला मशहूर ट्विटर हैंडल 'true Indology' ने उन्हें पलट कर जवाब में वह वैदिक ऋचा बता दिया, जिसमें भगवान शिव को उनके अन्य नामों शम्भु, शंकर, पशुपति के अलावा "शिव" नाम से भी नमस्कार किया गया है।
साभार: PGurus

देवी की साड़ियों पर अर्चक का अधिकार, फिर भी पुलिस ने किया झूठे आरोप में गिरफ्तार

रंगराजन ने अर्चक पर झूठे आरोप को दुर्भाग्यपूर्ण और पुलिस के अधिकार-क्षेत्र के बाहर बताते हुए पुलिस पर उन्हें प्रताड़ित करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने राज्य के Endowments विभाग से दो सवाल भी पूछे......
संत रविदास (रैदास)

‘मुस्लिमो, दलितों के इस विरोध-प्रदर्शन से सीखो’ – रामभक्त रविदास के नाम पर हिंसा फैलाने वालो, उन्हें पढ़ो तो सही

संत रविदास मंदिर पर राजनीति कर रहा चंद्रशेखर वही व्यक्ति है, जिसने अयोध्या में राम मंदिर की जगह बुद्ध मंदिर की माँग की थी। "अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी" लिखने वाले संत रविदास अगर आज ज़िंदा होते तो उनके नाम पर राजनीति करने वाले और दलितों को 'राम अमंदिर आंदोलन' से दूर रहने की सलाह देने वाले चंद्रशेखर को अपना भक्त तो नहीं ही मानते।
श्रीविल्लीपुतुर जीयार स्वामी (साभार: स्वराज्य)

तमिलनाडु में मठ के स्वामी को समन, कहा था अब मूर्तियों पर इस्लामी हमले नहीं होते

इस अनोखे मंदिर में लोगों की अपार श्रद्धा है। यही वजह है कि भगवान अति वरदार भले ही 40 वर्ष तक जल समाधि में रहते हों, लेकिन पूरे साल इस मंदिर में भक्तों की भीड़ जुटती है। इससे पहले वर्ष 1979 में भगवान अति वरदान ने मंदिर के पवित्र तालाब से बाहर आकर भक्तों को दर्शन दिए थे।
भारतीय कर्म-काण्ड और आस्था (प्रतीकात्मक चित्र, DNA Inda से साभार)

भारत, धर्म और कानून: ‘आधुनिक’ भारतीय मानस की औपनिवेशिक दासता

हर भारतीय उद्गम का संस्थान कटघरे में खड़ा हो जीवित रहने, अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए गुहार करता, तर्क-वितर्क करने पर मजबूर दिखता है।

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