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‘प्राइवेसी सिर्फ जेंडर-सेक्सुअल ही नहीं, आध्यात्मिक भी’: जानिए क्या है ‘अंगप्रदक्षिणम’ प्रथा जिसपर लगी रोक हाईकोर्ट ने हटाई, कहा- प्रशासन नहीं रोक सकता

मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने कहा, "किसी व्यक्ति पर यह निर्भर करता है कि वह इस रुझान को उस तरीके से व्यक्त कर सके जैसा वह उचित समझे। हाँ, इससे दूसरों के अधिकारों और स्वतंत्रता पर असर नहीं पड़ना चाहिए। जब तक इस सीमा को पार नहीं किया जाता, तब तक राज्य या अदालतों के लिए कार्रवाई में करना संभव नहीं है।"

मद्रास हाई कोर्ट ने कहा है कि किसी व्यक्ति के निजता के अधिकार में जैसे लिंग और यौन रुझान शामिल होते हैं, वैसे ही आध्यात्मिक रुझान भी शामिल होते हैं। मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने कहा कि किसी को अपने धर्म का पालन किसी भी तरीके से करने का अधिकार है। यह मामला अंगप्रदक्षिण से संबंधित है, जिसमें ब्राह्मण केले के पत्ते खाना खाते हैं और भक्त उस झूठे पत्तल पर लोटते हैं।

मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने कहा, “किसी व्यक्ति पर यह निर्भर करता है कि वह इस रुझान को उस तरीके से व्यक्त कर सके जैसा वह उचित समझे। हाँ, इससे दूसरों के अधिकारों और स्वतंत्रता पर असर नहीं पड़ना चाहिए। जब तक इस सीमा को पार नहीं किया जाता, तब तक राज्य या अदालतों के लिए कार्रवाई में करना संभव नहीं है।”

अदालत ने कहा कि निजता का अधिकार परिस्थितियों पर लागू होता है। किसी व्यक्ति की निजता का अधिकार उनकी जीवनशैली के बारे में उनके द्वारा चुने गए विकल्पों में अंतर्निहित है और यह अधिकार केवल इसलिए समाप्त या परिवर्तित नहीं होता है, क्योंकि वे सार्वजनिक स्थान पर होते थे। अदालत ने आगे कहा कि अंगप्रदक्षिणम संविधान के अनुच्छेद 19(1)(डी) द्वारा परिभाषित पूरे देश में यात्रा करने की स्वतंत्रता का हिस्सा है।

जस्टिस स्वामीनाथन ने कहा है कि याचिकाकर्ता को अंगप्रदक्षिणम करने की अनुमति दी गई थी और अधिकारी इसे रोक नहीं सकते थे। अदालत ने आगे कहा, “पुलिस का कर्तव्य है कि याचिकाकर्ता को उसके मौलिक अधिकारों का प्रयोग करने में समर्थन दिया जाए और उसके रास्ते में आने वाली किसी भी बाधा को हटाया जाए।”

अदालत ने कहा, “आध्यात्मिक रीति-रिवाजों के संबंध में याचिकाकर्ता की आस्था एवं विश्वास को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। मेहमानों (ब्राह्मणों) के खाने के बाद केले के पत्तों पर अंगप्रदक्षिणम करना श्री सदाशिव ब्रह्मेंद्रल के भक्तों द्वारा उच्च धार्मिक पूजा का कार्य है। यह अधिकार संविधान के भाग III [अनुच्छेद 14, 19(1)(ए), 19(1)(डी), 21 और अनुच्छेद 25(1)] द्वारा संरक्षित है।”

दरअसल, साल 2015 में मद्रास उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने एक आदेश जारी कर किसी को भी अंगप्रदक्षिणम आयोजित करने से रोक दिया था। उच्च न्यायालय के एकल पीठ ने कहा था कि अदालत का काम किसी के धर्म में हस्तक्षेप करना नहीं है, लेकिन धर्म के नाम पर किसी भी प्रथा या रीति-रिवाज का पालन करके किसी भी इंसान को अमानवीय बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

इसके बाद करूर जिले के मनमंगलम तालुक के नेरूर गाँव में स्थित श्री सदाशिव ब्रह्मेंद्रल नाम के संत के जीवन समाधि दिवस पर होने वाली 120 साल पुरानी इस रस्म को साल 2015 में बंद करना पड़ा था।वर्तमान उदाहरण में याचिकाकर्ता अंगप्रदक्षिणम करने की अनुमति माँगने के लिए अदालत के समक्ष आया था। उन्होंने दावा किया कि उन्हें अपने धर्म का पालन करने का अधिकार होना चाहिए।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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