अब्दुल अली, सिराज मलिक और शैफ नवाज को उम्रकैद: देशभर में ‘जिहाद’ फैलाने की रच रहे थे साजिश, राजकोट की अदालत ने सुनाई सजा

गुजरात में राजकोट की अतरिक्त सत्र न्यायालय ने मंगलवार (30 सितंबर 2025) को पश्चिम बंगाल के तीन मुस्लिम युवक अब्दुल शुकर अली, अमन सिराज मलिक और शैफ अबुशाहिद को देश में जिहाद के जरिए शरीयत कानून लागू करने की साजिश रचने का दोषी ठहराया। इन सभी मुस्लिम युवकों पर बाकी मुस्लिम युवकों को ब्रेनवॉश कर उन्हें राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल करने के आरोप थे। अदालत ने सभी दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है।

अदालत ने फैसला सुनाते हुए आरोपित मुस्लिम युवकों को IPC 121(C) (सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने) और आर्म्स एक्ट की धारा 25(1-B)A और 27 के तहत दोषी माना और उम्रकैद की सजा सुनाई। इसके साथ हर दोषी पर ₹12 हजार का जुर्माना भी लगाया। कोर्ट के फैसले की कॉपी ऑपइंडिया के पास भी है।

दोषियों को ATS ने साल 2023 में किया था गिरफ्तार

गुजरात ने ATS ने जुलाई 2023 में स्पेशल ऑपरेशन के तहत इन तीनों आतंकियों को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तार किए गए तीनों युवक मूलरूप से पश्चिम बंगाल के रहने वाले हैं और राजकोट के सोनी बाजार इलाके में रहते थे। ATS को जानकारी मिली थी कि इनका आतंकवादी संगठन अल-कायदा से कनेक्शन है।

ATS की जाँच में सामने आया कि ये बाकी मुस्लिम युवाओं को भी आतंकवादी गतिविधियों में शामिल करने की साजिश रच रहे हैं। छापेमारी में इनके पास से एक पिस्तौल भी बरामद हुई थी। ये तीनों सोशल मीडिया के जरिए आपस में मिले थे और एक-दूसरे को जिहादी कन्टेंट और भड़काऊ वीडियो भी भेजते थे।

यह भी सामने आया कि अपने हैंडलर के कहने पर इन्होंने सरकार और अन्य संस्थाओं पर हमला करने की साजिश भी रची थी। इसके लिए इन्होंने हथियार भी खरीद रखे थे। इतना ही नहीं अब्दुल शुकर अली, अमन सिराज मलिक और शैफ नवाज अबुशाहिद राजकोट में रहकर आसपास के मुस्लिम युवाओं को ब्रेनवॉश करने और उन्हें अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे थे।

जाँच के दौरान ATS को इनके मोबाइल फोन से कुछ ऐसे वीडियो मिले, जिनमें बेहद भड़काऊ बाते कही गई थीं। इनमें मुसलमानों के लिए जिहाद करना अभी जरूरी है, जिहाद ही सभी समस्याओं का हल है, जिन्हें परेशान किया जा रहा है उनके लिए जिहाद करना फर्ज है, जैसे भड़काऊ संदेश मिले। इसके अलावा इनके फोन से आपत्तिजनक साहित्य भी बरामद हुआ था।

नमाज के बाद मस्जिद के जिहादियों को कर रहे थे ब्रेनवॉश

दोषी पाए गए युवक स्थानीय मस्जिद में जाकर नमाज के बाद अन्य जिहादियों का ब्रेनवॉश करते थे। वे मस्जिद में उकसाने वाली किताबें पढ़ते और यह प्रचार करते थे कि भारत सरकार कश्मीर में मुस्लिमों को परेशान कर रही है और उनके घर तोड़ रही है। वे यह भी कहते थे कि कुरान में भी जिहाद करने की बात कही गई है।

‘बांग्लादेशी प्रोपेगेंडा’ और ‘कश्मीर में मुस्लिमों पर अत्याचार’ की कहानी गढ़ते

नमाज के बाद होने वाली बैठकों में ये लोग बांग्लादेश से जुड़ा झूठा प्रोपेगेंडा भी फैलाते थे। उनका कहना था कि बांग्लादेशी मुसलमानों का पानी छीना जा रहा है, उनकी खेती बर्बाद की जा रही है और उनकी फैक्ट्रियाँ और कारोबारों पर कब्जा किया जा रहा है। इस तरह से यह लोग युवाओं को गुमराह करने की कोशिश करते थे।

दोषी मुस्लिम युवाओं को उकसाते थे और कहते थे कि हमें भारत की पुलिस, सेना और खुफिया एजेंसियों को निशाना बनाकर उन्हें मारना है और देश में शरीयत कानून लागू करना है। वे इन युवाओं का ब्रेनवॉश करने के लिए भड़काऊ किताबें, वीडियो और अन्य सामग्री भी साझा करते थे। उनका कहना था कि जिहाद करना हर मुसलमान के लिए जरूरी है और जिहाद करने वालों को अल्लाह ‘जन्नत’ देता है।

‘जिहाद’ की गलत व्याख्या पर आधारित था बचाव पक्ष का तर्क

आरोपित मुस्लिम युवकों की ओर से एडवोकेट एएस वोरा ने कोर्ट में दलील दी कि मुस्लिम आरोपितों का किसी भी राष्ट्र विरोधी गतिविधि से कोई संबंध नहीं है और पूरा मामला सिर्फ ‘जिहाद‘ शब्द पर आधारित है। उन्होंने गूगल ट्रांसलेट का हवाला देते हुए कहा कि जिहाद का मतलब संघर्ष करना है, अपराध करना नहीं।

वोरा ने यह बी कहा कि आरोपित सिर्फ लोगों से संपर्क कर रहे थे. अपने मजहबी नियम बता रहे थे और नमाज पढ़ने के तरीके सिखा रहे थे, जिसे अपराध नहीं कहा जा सकता है। वहीं किताब को लेकर यह दलील दी कि उस बांग्ला भाषा की किताब पर कोई प्रतिबंध नहीं और कोई भी उसे ऑनलाइन डाउनलोड कर सकता है। वोरा ने कहा कि सिर्फ किताब पढ़ लेने से केस नहीं बनता है।

बचाव पक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि ATS ने कार्रवाई से पहले स्थानीय पुलिस को सूचित नहीं किया लेकिन अदालत ने इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि आरोपितों ने मुस्लिम युवाओं को गुमराह कर सरकार और सुरक्षाबलों के खिलाफ जिहाद छेड़ने के लिए भड़काया था।

साथ ही कश्मीर जाकर ट्रेनिंग भी ली और हथियार भी खरीदे। जहाँ तक स्थानीय पुलिस को सूचित न करने का सवाल है, अदालत ने कहा कि कुछ संवेदनशील मामलों में ऐसा संभव है और ATS का अधिकार क्षेत्र पूरे राज्य में होता है। सभी दलील सुनने के बाद अदालत ने तीनों को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।