सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के धर्मांतरण विरोधी कानून की कुछ धाराओं पर गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि यह कानून ‘धर्म बदलने की स्वतंत्रता और निजता के अधिकार’ पर ‘बेहद सख्त और असंवैधानिक’ पाबंदियाँ लगाता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की ‘आस्था या धर्म परिवर्तन का फैसला सरकार की अनुमति का मोहताज नहीं होना चाहिए’।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
जानकारी के अनुसार, जस्टिस जेबी पारदीवाला और मनोज मिश्रा की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी। कोर्ट ने कहा कि कानून में दी गई प्रक्रिया ‘बहुत बोझिल’ है। कानून के मुताबिक, जो भी व्यक्ति स्वेच्छा से धर्म बदलना चाहता है, उसे ’60 दिन पहले ज़िलाधिकारी को सूचना देनी होती है’। धर्म परिवर्तन कराने वाले व्यक्ति को भी ’30 दिन पहले नोटिस देना होता है’। ऐसा न करने पर ‘तीन साल की जेल और जुर्माने’ का प्रावधान है।
कोर्ट ने कहा कि यह व्यवस्था ‘व्यक्ति की स्वतंत्रता और आस्था की आजादी’ के मूल अधिकार का उल्लंघन करती है। इससे राज्य व्यक्ति की निजी मान्यताओं पर ‘निगरानी करने वाला’ बन जाता है, जो संविधान के अनुच्छेद 25 के खिलाफ है।
निजता और डर का मुद्दा
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि धर्म बदलने के बाद व्यक्ति से ‘व्यक्तिगत जानकारी, पता और तारीख’ सार्वजनिक रूप से दर्ज कराना निजता का उल्लंघन है। कोर्ट ने के एस पुट्टस्वामी बनाम भारत सरकार (2017) के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया और कहा, “धर्म परिवर्तन की सार्वजनिक घोषणा व्यक्ति को सामाजिक बहिष्कार और हमले के खतरे में डाल सकती है।”
जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि भारत का धर्मनिरपेक्ष ढाँचा ‘आस्था की समानता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता’ पर टिका है। सरकार को धर्म के मामलों में ‘तटस्थ रहना चाहिए’, न कि नागरिकों से उनकी आस्था साबित करवानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि ‘धर्म चुनने का अधिकार, निजता और गरिमा का हिस्सा है’। किसी को भी अपनी मान्यता के लिए राज्य से अनुमति लेने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
इस टिप्पणी के बाद धर्मांतरण कानूनों पर देशव्यापी बहस तेज हो गई है। सोशल मीडिया पर एक यूजर ने लिखा, “ऐसा लगता है कि हमारी ज्यूडिशियरी इतनी गिर गई है कि उसे एग्जीक्यूटिव के खिलाफ कुछ भी नजर नहीं आता।” किसी यूजर्स ने लिखा कि कोर्ट क्या धर्मांतरण कानून का सपोर्ट कर रही है।

इसके अलावा, एक यूजर ने हास्यास्पद टोन में लिखा, “यह वही जज है जिसने संविधान जाने बिना भारत के राष्ट्रपति को आदेश जारी किया था।”

कोर्ट के आदेश के बाद लोगों के ये ही सवाल है कि जब देश के कई हिस्सों में जबरन धर्मांतरण के मामले सामने आते हैं, तब सुप्रीम कोर्ट की ओर से ऐसी सख्त टिप्पणियाँ क्यों नहीं सुनाई देतीं? और जब राज्य सरकारें इसके लिए एक्शन लेती हैं तो उसमें हस्तक्षेप क्यों जरूरी होता है।

