उत्तर प्रदेश के बदायूँ में बेटे के इलाज का दावा कर एक परिवार का भरोसा जीतने वाले मौलाना शाकिर हुसैन को अदालत ने एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी को अगवा कर तीन महीने तक बंधक बनाकर रखने, महिला से बार-बार दुष्कर्म करने और दोनों पर जबरन धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने के मामले में दोषी ठहराया है। विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट (महिलाओं के विरुद्ध अपराध) की न्यायाधीश नेहा गर्ग ने दोषी को विभिन्न धाराओं में 10 वर्ष की सजा सुनाई है। यह बदायूँ में उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत सजा का पहला मामला है।
अदालत ने 20 जुलाई 2026 को सुनाए गए अपने फैसले में शाकिर हुसैन को धर्मांतरण कानून के तहत 5 वर्ष के कठोर कारावास और ₹50,000 जुर्माने की सजा दी। इसके अलावा अपहरण, अवैध बंधक बनाकर रखने, दुष्कर्म और अन्य अपराधों में भी उसे दोषी ठहराया गया। दुष्कर्म के मामले में उसे 10 वर्ष के कठोर कारावास और ₹50,000 जुर्माने की सजा सुनाई गई। अदालत ने निर्देश दिया कि सभी सजाएँ साथ-साथ चलेंगी। जुर्माना अदा न करने पर अतिरिक्त कारावास भी भुगतना होगा।
क्या है पूरा मामला?
मामले के अनुसार, पीड़िता 21 मार्च 2025 की सुबह करीब 9 बजे अपनी 10 वर्षीय बेटी के साथ घर से निकली थीं। इसके बाद दोनों वापस नहीं लौटीं। परिवार ने कई दिनों तक दोनों की तलाश की लेकिन उनका कोई पता नहीं चला। इसके बाद 27 मार्च 2025 को पीड़िता के पति ने बिल्सी थाने में पत्नी और बेटी की गुमशुदगी दर्ज कराई। इसके बाद भी वह खुद दोनों की तलाश करते रहे।
तलाश के दौरान उन्हें शक हुआ कि गाँव गढ़ी रिसौली का रहने वाला शाकिर हुसैन मौलाना उनकी पत्नी और बेटी को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया है। इसी आधार पर उन्होंने पुलिस को तहरीर दी। इसके बाद 27 मई 2025 को शाकिर हुसैन के खिलाफ केस दर्ज किया गया।
पीड़िता और उनकी बेटी के अनुसार, परिवार का सबसे बड़ा बेटा राजकुमार मंदबुद्धि थ और उसके इलाज के लिए उन्होंने कई डॉक्टरों को दिखाया था लेकिन कोई खास फायदा नहीं हुआ।
इसी दौरान उन्हें जानकारी मिली कि रिसौली में शाकिर हुसैन नाम का एक मौलवी इलाज करता है। इसके बाद महिला अपने बेटे को लेकर उसके पास गईं। इलाज के बहाने शाकिर हुसैन का उनके घर आना-जाना शुरू हो गया और इसी दौरान उसने परिवार का विश्वास जीत लिया।
21 मार्च 2025 को जब पीड़िता अपनी बेटी के साथ मायके जाने के लिए निकलीं तब रास्ते में बिसौली मोड़ पर शाकिर हुसैन मिला। आरोप है कि उसने दोनों को बहला-फुसलाकर अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाया और सीधे कासगंज जिले के सिढ़पुरा ले गया।
अभियोजन और पीड़िता के बयान के अनुसार, सिढ़पुरा पहुँचने के बाद शाकिर हुसैन ने माँ-बेटी को एक घर में बंद कर दिया। इसके बाद उसने पीड़िता पर मुस्लिम धर्म अपनाने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। पीड़िता ने अदालत को बताया कि शाकिर ने कई बार उसके साथ रेप किया। जब उसने विरोध किया तो शाकिर ने उसकी बेटी को जान से मारने की धमकी दी।
पीड़िता के अनुसार, करीब तीन महीने तक दोनों को उसी घर में बंद रखा गया। इस दौरान उन्हें जबरन नमाज पढ़ाई जाती थी। बेटी को शाकिर को ‘अब्बू’ और माँ को ‘अम्मी’ कहने के लिए मजबूर किया जाता था। विरोध करने पर उनके साथ मारपीट तक की जाती थी।
पीड़िता ने यह भी बताया कि उसके हाथ पर उसका और उसके भाई का नाम गुदा हुआ था। शाकिर ने उस टैटू को मिटाने के लिए उस पर जहरीली दवा लगा दी और इससे हाथ की खाल उधड़ गई और वहाँ घाव हो गया। आरोपित लगातार उस पर निकाह करने का दबाव भी बनाता रहा। पीड़िता ने बताया कि जब भी शाकिर हुसैन घर से बाहर जाता था तो वह बाहर से ताला लगाकर जाता था ताकि माँ-बेटी वहाँ से भाग न सकें।
आखिरकार एक दिन वह माँ-बेटी को बस में बैठाकर कहीं और ले जा रहा था। इसी दौरान पुलिस दिखाई दी तो वह दोनों को छोड़कर मौके से भाग गया। इसके बाद पुलिस माँ-बेटी को अपने साथ थाने ले आई।
पुलिस जाँच में क्या सामने आया?
मामले की जाँच उपनिरीक्षक रामेहर सिंह ने की। उन्होंने वादी, पीड़िता और अन्य लोगों के बयान दर्ज किए। घटनास्थल का निरीक्षण किया गया और मेडिकल रिपोर्ट सहित अन्य साक्ष्य जुटाए गए। पीड़िता और उसकी बेटी के बयान धारा 164 सीआरपीसी के तहत दर्ज किए गए।
जांच के दौरान मामले में धारा 351(3), 127(4), 64(2)(m) बीएनएस और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/5(3) भी जोड़ी गई। 27 जून 2025 को माँ-बेटी को बरामद कर उनका मेडिकल परीक्षण कराया गया। इसके अगले दिन यानी 28 जून 2025 को शाकिर हुसैन को गिरफ्तार कर लिया गया।
विवेचना पूरी होने के बाद चार्जशीट अदालत में दाखिल की गई। बाद में 2 सितंबर 2025 को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय संख्या-2, बदायूँ ने मामले का संज्ञान लिया और इसे सत्र न्यायालय भेज दिया। 18 नवंबर 2025 को आरोपित के खिलाफ आरोप तय किए गए लेकिन उसने खुद को निर्दोष बताते हुए मुकदमे का सामना करने की बात कही।
मेडिकल जाँच में क्या मिला?
पीड़िता का मेडिकल करने वाली डॉक्टर ने अदालत को बताया कि पीड़िता के दाहिने हाथ पर कोहनी और कलाई के बीच लगभग 6×4 सेंटीमीटर का घाव था। मेडिकल जाँच में हाइमन अनुपस्थित मिला और योनि मार्ग से सफेद स्राव भी पाया गया।
DNA जाँच के लिए सैंपल लिए गए और गर्भावस्था की जाँच कराने की सलाह दी गई। बाद में यूपीटी (यूरिन प्रेगनेंसी टेस्ट) रिपोर्ट पॉजिटिव आई।
इसके बाद डॉ. इंद्रकांत वर्मा ने अल्ट्रासाउंड किया जिसमें पता चला कि पीड़िता करीब छह सप्ताह 5 दिन की गर्भवती थी। रिपोर्ट में यह भी दर्ज था कि भ्रूण में अभी धड़कन शुरू नहीं हुई थी। वहीं, नाबालिग बेटी के मेडिकल परीक्षण में हाइमन सुरक्षित मिला और उसके शरीर पर किसी तरह की चोट नहीं पाई गई।
अदालत ने क्या कहा?
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सभी गवाहों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने कहा कि पीड़िता, उसकी बेटी और वादी के बयानों में पूरी तरह समानता है। जिरह के दौरान भी ऐसा कोई विरोधाभास सामने नहीं आया जिससे उनकी बातों पर संदेह किया जा सके।
अदालत ने कहा कि यदि दुष्कर्म पीड़िता का बयान भरोसेमंद है तो केवल उसी के आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है और हर मामले में अतिरिक्त पुष्टि जरूरी नहीं होती। अदालत ने यह भी माना कि पीड़िता की गर्भावस्था की अवधि उसी समय से मेल खाती है, जब वह आरोपित की अवैध हिरासत में थी।
20 जुलाई 2026 को सजा के बिंदु पर सुनवाई हुई। अदालत ने शाकिर हुसैन को विभिन्न धाराओं में दोषी ठहराते हुए यह सजा सुनाई है। धारा 137(2) बीएनएस के तहत 5 वर्ष, धारा 87 बीएनएस के तहत 7 वर्ष, धारा 351(3) बीएनएस के तहत 5 वर्ष, धारा 127(4) बीएनएस के तहत 3 वर्ष, धारा 64(2)(m) बीएनएस (रेप) के तहत 10 वर्ष और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/5(1) के तहत 5 वर्ष की सजा सुनाई गई है।
अदालत ने यह भी आदेश दिया कि यदि दोषी जुर्माना जमा नहीं करता है तो उसे अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा। साथ ही, सभी सजाएँ एक साथ चलेंगी और जेल में पहले से बिताई गई अवधि को सजा में समायोजित किया जाएगा। अदालत ने दोषी को बदायूँ जेल भेजने के निर्देश दे दिए हैं।


