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आज से आरंभ हुआ चातुर्मास: 120 दिनों तक योगनिद्रा में रहेंगे भगवान विष्णु, शिव संभालेंगे सृष्टि का संचालन; जानें- इन महीनों में कैसा हो आपका आचरण और भोजन

देवशयनी एकादशी से शुरू हुआ चातुर्मास सनातन परंपरा का सबसे पवित्र काल माना जाता है। इस दौरान भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं और संपूर्ण सृष्टि के संचालन और संरक्षण का भारी दायित्व देवाधिदेव महादेव अर्थात् भगवान शिव के कंधों पर आ जाता है।

सनातन परंपरा में चातुर्मास का समय केवल महीनों का बदलना मात्र नहीं है, बल्कि यह आत्म-साधना, संयम और आत्म-निरीक्षण का एक पावन और विस्तृत पर्व है। पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से इसका आरंभ होता है और कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी तक यह चलता है।

देवशयनी एकादशी को हरिशयनी या पद्मा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस वर्ष यह पवित्र अवधि 25 जुलाई 2026 से शुरू होकर 21 नवंबर तक, यानी कुल 120 दिनों तक चलेगी। इन चार महीनों के लंबे अंतराल को एक विशेष धर्म-काल माना गया है, जिसके दौरान सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर योगनिद्रा में लीन रहते हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में वे पाताल लोक में राजा बलि के यहाँ निवास करते हैं। भगवान विष्णु के योगनिद्रा में रहने के कारण पृथ्वी पर विवाह, सगाई, मुंडन, नामकरण और गृह प्रवेश जैसे सभी मांगलिक कार्यों पर पूरी तरह से विराम लग जाता है।

ढोल और शहनाइयों की गूँज खामोश हो जाती है, लेकिन उनकी जगह मंदिरों और घरों में भक्ति गीतों, भजनों और सत्संग का मधुर स्वर गूँजने लगता है। भले ही सांसारिक उत्सवों पर रोक लग जाती है, लेकिन यह समय जप, तप, ध्यान, व्रत और आत्मिक उन्नति के लिए साल का सबसे सर्वोत्तम समय माना गया है।

आइए विस्तार से समझते हैं कि चातुर्मास का हमारे जीवन में क्या महत्व है और इस दौरान किन-किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

जब योगनिद्रा में लीन होते हैं हरि: जानिए कौन सँभालेगा सृष्टि का संचालन?

धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, जब भगवान श्रीहरि विष्णु चार माह के लिए अपनी योगनिद्रा में चले जाते हैं, तब संपूर्ण सृष्टि के संचालन और संरक्षण का भारी दायित्व देवाधिदेव महादेव अर्थात् भगवान शिव के कंधों पर आ जाता है।

इस पूरे कालखंड में भगवान शिव ही पालनकर्ता और संहारक, दोनों भूमिकाओं में रहकर सृष्टि की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाते हैं। चातुर्मास की कथा अत्यंत रोचक है।

श्रीमद्भागवत पुराण और पद्म पुराण के प्रसंगों के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि दान में माँगी थी, तब बलि की अटूट भक्ति और दानशीलता से वे अत्यंत प्रसन्न हुए थे। प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने राजा बलि को वरदान दिया था कि वे हर साल चार महीने उनके पाताल लोक स्थित महल में निवास करेंगे।

इसी पौराणिक घटना के कारण देवशयनी एकादशी से चातुर्मास की शुरुआत मानी जाती है और देवउठनी एकादशी पर जब विष्णु जी पुनः जागृत होते हैं, तब वे अपने लोक लौटते हैं।

यद्यपि पंचांगीय गणना के अनुसार, चातुर्मास में आषाढ़, सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक, ये पाँच महीने स्पर्श होते हैं, परंतु तिथियों के आधार पर देवशयनी से देवउठनी एकादशी तक की कुल अवधि चार महीने की ही बैठती है। सनातन धर्म के साथ-साथ जैन परंपरा में भी चातुर्मास का बहुत गहरा महत्व है।

जैन समाज का चातुर्मास भी इसी समय के आसपास, 29 जुलाई से शुरू होगा, जहाँ साधु-संत यात्राएँ रोककर एक ही स्थान पर ठहरते हैं और समाज को ध्यान तथा धर्मोपदेश देते हैं।

शुभ कार्यों पर विराम, फिर भी भक्ति का महाकुंभ: चातुर्मास के 120 दिनों का उत्सव

यद्यपि चातुर्मास में विवाह या नए घर में प्रवेश जैसे शुभ संस्कार वर्जित होते हैं, परंतु यह काल पूजा-पाठ, उपवास और बड़े-बड़े उत्सवों से पूरी तरह से भरा होता है। इस दौरान आपकी नियमित पूजा या किसी व्रत-त्योहार को मनाने पर कोई पाबंदी नहीं होती है, बल्कि इनका फल और भी कई गुना बढ़ जाता है।

इन 120 दिनों की अवधि में देश भर में पंद्रह से भी अधिक बड़े धार्मिक पर्व मनाए जाते हैं, जो जीवन में नई ऊर्जा भरते हैं। इस धर्म-काल की शुरुआत सावन के महीने से होती है, जो पूरी तरह से भगवान शिव की आराधना और उनकी कृपा पाने के लिए समर्पित है। इस महीने में भक्त बड़ी श्रद्धा के साथ शिवजी का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और कांवड़ यात्रा करते हैं।

सावन के बाद भाद्रपद का महीना आता है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी और प्रथम पूज्य विघ्नहर्ता श्री गणेश की स्थापना यानी गणेश चतुर्थी के उल्लास के लिए जाना जाता है। इसके बाद आश्विन महीने की शुरुआत में पितरों की शांति और उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए पंद्रह दिनों का पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष आता है।

इसके तुरंत बाद शक्ति की देवी माँ दुर्गा की उपासना का सबसे बड़ा पर्व शारदीय नवरात्रि आता है, जिसका समापन बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक दशहरे के साथ होता है।

अंत में कार्तिक का महीना आता है, जो दीपों और उल्लास का महीना है। इस दौरान करवा चौथ, धनतेरस, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज और सूर्य उपासना का महापर्व छठ पूजा बड़े ही धूमधाम से मनाए जाते हैं। अंततः कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवउठनी एकादशी के साथ चातुर्मास का समापन होता है और सभी रुके हुए मांगलिक कार्य फिर से शुरू हो जाते हैं।

भक्ति में छुपा सेहत का राज: आयुर्वेद और शास्त्र अनुसार क्या खाएँ, क्या त्यागें?

चातुर्मास का समय केवल आध्यात्मिक उन्नति तक सीमित नहीं है, बल्कि आयुर्वेद और स्वास्थ्य विज्ञान के दृष्टिकोण से भी यह अवधि हमारे शरीर के लिए बहुत संवेदनशील मानी गई है। मानसून या वर्षा ऋतु के समय मनुष्य के शरीर की जठराग्नि यानी पाचन शक्ति काफी मंद पड़ जाती है।

इसके साथ ही नमी के कारण वातावरण में बैक्टीरिया, कीड़े-मकोड़े और संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसलिए हमारे शास्त्रों में इन चार महीनों के दौरान खान-पान के कुछ बहुत ही कड़े और विशेष नियम बताए गए हैं, ताकि शरीर बीमारियों से बचा रहे। सबसे पहला नियम यह है कि इस पूरी अवधि में तामसिक भोजन का पूरी तरह से त्याग कर देना चाहिए।

किसी भी व्यक्ति को प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा और बासी भोजन का सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए। इसके अलावा महीनों के अनुसार भी कुछ खास चीजों का परहेज बताया गया है। जैसे सावन के महीने में हरी पत्तेदार सब्जियाँ, पालक या साग आदि खाने से बचना चाहिए, क्योंकि बारिश में इन पत्तों में सूक्ष्म जीव अत्यधिक पनपते हैं जो बीमारियों का कारण बनते हैं।

इसी तरह भाद्रपद के महीने में दही और दही से बने पदार्थों का सेवन वर्जित माना गया है, क्योंकि आयुर्वेद के अनुसार, इस मौसम में शरीर में वात दोष बढ़ता है और दही इसे और बिगाड़ सकता है। आश्विन के महीने में दूध का सेवन करने से बचने की सलाह दी जाती है, जबकि कार्तिक के महीने में मूली, बैंगन, उड़द और चने की दाल खाने से परहेज रखना चाहिए।

एक नियम यह भी है कि चातुर्मास के दौरान बिना किसी विशेष और अनिवार्य कारण के दूसरों के घर का अन्न ग्रहण करने से बचना चाहिए। सात्विक और सुपाच्य भोजन करने से हमारा स्वास्थ्य तो बेहतर होता ही है, साथ ही ध्यान और पूजा में भी मन लगता है।

मन, वाणी और शरीर का शोधन: चातुर्मास में कैसा हो आपका आचरण?

चातुर्मास मुख्य रूप से अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखने, संयम बरतने और आत्मचिंतन करने का समय है। इस दौरान जो साधक और व्रती नियम-धर्म का पालन करते हैं, उनके लिए आचरण संबंधी कई विशेष दिशा-निर्देश बनाए गए हैं। इन नियमों का पालन करने से अपार मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।

जो लोग चातुर्मास में विशेष व्रत, उपवास और साधना करते हैं, उन्हें शय्या त्याग का नियम अपनाना चाहिए। इसका अर्थ है कि उन्हें आरामदायक पलंग या गद्दे पर सोने के बजाय जमीन पर चटाई बिछाकर सोना चाहिए। इससे शरीर में अनुशासन आता है और अहंकार का नाश होता है।

इन चार महीनों तक ब्रह्मचर्य का पालन करना भी अत्यंत शुभ और जीवनदायी माना गया है। इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इंसान को अपनी वाणी और अपने विचारों पर पूरा नियंत्रण रखना चाहिए। इस पवित्र समय में किसी पर भी अकारण गुस्सा करना, झूठ बोलना, किसी की बुराई करना या किसी का अपमान करना महापाप की श्रेणी में रखा गया है।

प्राचीन काल में वर्षा ऋतु में रास्ते खराब होने और नदियों के उफान पर होने के कारण साधु-संतों का भ्रमण करना संभव नहीं हो पाता था। इसलिए वे एक ही स्थान पर ठहरकर अपनी साधना करते थे और आम जनता को धर्मोपदेश देते थे।

आज भी उसी प्राचीन परंपरा का निर्वहन करते हुए लोगों को घरों और मंदिरों में रामायण, श्रीमद्भागवत कथा, भगवद्गीता का नियमित अध्ययन और सत्संग करना चाहिए, ताकि मन बुरे विचारों से दूर रहे।

अक्षय पुण्य की चाबी: छोटे-छोटे उपायों से बदलें अपना भाग्य

चातुर्मास का समय केवल परहेज करने या खाली बैठने का नहीं है, बल्कि यह अपने जीवन को एक नई और सकारात्मक दिशा देने का बेहतरीन अवसर है। इस दौरान किए गए छोटे-छोटे धार्मिक और परोपकारी कार्य भी मनुष्य को अक्षय पुण्य प्रदान करते हैं, जिनका फल जन्म-जन्मांतर तक मिलता है।

आपको इस अवधि में नियमित रूप से अपने इष्टदेव की आराधना करनी चाहिए और भगवान विष्णु तथा भगवान शिव के चमत्कारी मंत्रों का जाप करना चाहिए। इस समय आने वाले एकादशी, प्रदोष, शिवरात्रि, गणेश चतुर्थी और तीज आदि के व्रत पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ रखने चाहिए।

भगवान की पूजा के साथ-साथ सेवा और दान-पुण्य का इस अवधि में विशेष महत्व बताया गया है। आपको अपनी क्षमता के अनुसार भूखे को अन्न, प्यासे को जल, जरूरतमंदों को वस्त्र और मौसम के अनुसार ताज़े फलों का दान करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, इस समय किए गए दान से जीवन के सभी पापों का नाश होता है और घर में सुख-समृद्धि आती है।

इसके अलावा अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने के लिए आपको नियमित रूप से योग, प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास करना चाहिए।

जब आप एक सात्विक और अनुशासित जीवन शैली अपनाकर दूसरों की सेवा करते हैं और ईश्वर का ध्यान करते हैं, तो आपके भीतर एक नई आध्यात्मिक चेतना का विकास होता है। इसी चेतना और निस्वार्थ सेवा भाव के कारण मनुष्य सच्चे अर्थों में ईश्वरीय कृपा का पात्र बनता है।

चातुर्मास का यह लंबा समय ईश्वर की भक्ति, शरीर की शुद्धि और मन के संयम का एक बहुत ही दुर्लभ और अद्भुत संगम है, जिसे पूरी पवित्रता के साथ जीना चाहिए।

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सौम्या सिंह
सौम्या सिंह
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