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बिहार चुनाव में महागठबंधन का घोषणा पत्र निकाल देगा राज्य की आर्थिकी का तेल, क्या वादे सिर्फ इसलिए कि सत्ता में आना ही नहीं है तो बड़ी बातों से क्यों हटे पीछे?

बिहार चुनाव में महागठबंधन ने तेजस्वी प्रण के नाम से साझा घोषणा पत्र जारी किया। इसमें बेरोजगारों के लिए सरकारी नौकरी से लेकर किसानों, महिलाओं समेत भी से वादे किए गए हैं। लेकिन इन वादों को पूरा करने पर जो खर्च आएगा, उसे वहन करना बिहार जैसे राज्य के लिए संभव ही नहीं है।

आखिर हम ऐसा क्यों कह रहे हैं, आइये समझते हैं। महागठबंधन के मेनिफेस्टो में सबसे बड़ा वादा हर परिवार के एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी देने का है और वह भी सत्ता में आते ही, सिर्फ 20 महीनों में।

सरकारी नौकरी पर खर्च सालाना 5.5 लाख करोड़ रुपए

2023 की जातिगत सर्वे के मुताबिक, बिहार की जनसंख्या 13,07,25,310 है और यहाँ 2.7 करोड़ परिवार रहते हैं। यानी हर परिवार को नौकरी दी गई तो ये संख्या होगा 2.7 करोड़। फिलहाल बिहार में अभी 20 लाख लोग सरकारी नौकरी कर रहे हैं। इन लोगों को अगर घटा दिया जाए तो भी 2.5 करोड़ लोगों को सरकारी नौकरी देनी होगी।

अगर इतने लोगों को चतुर्थ वर्ग का कर्मचारी भी बनाया जाए तो उन्हें कम से कम 18000 रुपए देने होंगे। यानी हर महीने राज्य को 45 हजार करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च करने होंगे। सालाना खर्च की बात की जाए तो ये होगा करीब 5.5 लाख करोड़ रुपए।

बेरोजगारी भत्ता पर खर्च करीब 10 हजार करोड़ रुपए

बिहार के ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट कर चुके बेरोजगारों को हर महीने क्रमश: 2000 रुपए और 3000 रुपए बेरोजगारी भत्ता देने की बात कही गई है।

अगर मान लें कि आधे ग्रेजुएट और आधे पोस्ट ग्रेजुएट को सरकारी नौकरी मिल जाती है, तो बच जाते हैं आधे। 2023 की जातिगत जनगणना के मुताबिक, राज्य में 7989528 लोग ग्रेजुएट हैं। जबकि राज्य में स्नातकोत्तरों की कुल संख्या 1076700 है, जो कुल जनसंख्या का 0.82 प्रतिशत है।

इनमें से आधे लोग नौकरी में चले भी गए तो करीब 45 लाख लोगों को बेरोजगारी भत्ता देना होगा। ये खर्च आएगा कम से कम 10 हजार करोड़ रुपए।

स्वास्थ्य बीमा पर खर्च आएगा कम से कम 5 हजार करोड़ रुपए

महागठबंधन के वादों में एक वादा स्वास्थ्य को लेकर भी किया गया है। यानी महागठबंधन हर गरीब और लोअर मिडिल क्लास के परिवार को 25 लाख का बीमा कराएगा। एक अनुमान के मुताबिक बिहार में 94 लाख परिवार गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यतीत करते हैं। यानी राज्य में कम से कम 94 लाख परिवारों को स्वास्थ्य बीमा दिया जाएगा।

आयुष्मान के आधार पर इसपर होने वाले खर्च का भी अनुमान लगाया जा सकता है। आयुष्मान धारकों में हर साल करीब 47 फीसदी लोग क्लेम करते हैं। उस हिसाब से अगर बिहार में 44 लाख परिवार औसतन क्लेम करते हैं। ये खर्च अगर 12 हजार रुपए प्रति परिवार भी हैं, तो खर्च आएगा करीब 5 हजार करोड़ रुपए।

200 यूनिट फ्री बिजली पर खर्च 16 हजार करोड़ रुपए सालाना

बिहार में बिजली रेट है कम से कम 7.42 रुपए यानी 200 यूनिट महीने का खर्च आएगा करीब 1500 रुपए प्रति परिवार। अगर बिहार में सिर्फ गरीब परिवारों को ही फ्री बिजली दिया गया तो 94 लाख परिवारों पर हर महीने खर्च आएगा करीब ₹1400 करोड़। यानी सालाना 16 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा।

इसके अलावा भी कई वादे किए गए हैं, जिसका असर राज्य की कमाई पर पड़ेगा। इनको जोड़ दिया जाए तो कम से कम ये खर्च आएगा 5 लाख 80 हजार करोड़ रुपए। सरकारी सब्सिडी के वादे को जोड़ा जाए तो ये बजट और ऊपर जाएगा, क्योंकि इसमें भी जनता की गाढ़ी कमाई ही इस्तेमाल होती है।

अब सवाल ये है कि इतना खर्च आएगा कहाँ से? राज्य का 2023-24 का बजट देखा जाए तो ये है करीब 3 लाख 16 हजार करोड़ रुपए का। यानी महागठबंधन ने राज्य की जनता से जो वादे किए हैं, उस पर बिहार के बजट का दोगुने से ज्यादा खर्च आएगा।

महागठबंधन ये पैसे कहाँ से ला पाएगा, इस पर न तो कॉन्ग्रेस कुछ कहती है और न ही आरजेडी। महागठबंधन के इस वादे से तो बड़े बड़े उनके समर्थक भी हिल गए हैं। अजीम अंजुम ने खर्च का हिसाब बताया है 9 लाख करोड़ रुपए।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जब सत्ता में आना ही नहीं है तो वादा करने से गुरेज क्यों? जनता से जितना चाहे वादे कर डालो, पूरा करना तो है नहीं।

कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश सरकार का बुरा हाल

कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश जैसे कॉन्ग्रेस शासित राज्यों का बुरा हाल है। कैग की 2023-24 की रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार की पाँच “गारंटी” योजनाओं ने खर्च में 36,538 करोड़ रुपए की वृद्धि की, जो कुल खर्च का लगभग 15% है, जबकि राजस्व में बमुश्किल 2% की वृद्धि हुई।

कर्नाटक का राजकोषीय घाटा बढ़कर 65,522 करोड़ रुपए हो गया, जिससे सरकार को बाजार से 63,000 करोड़ रुपये उधार लेने पड़े। हिमाचल प्रदेश भी वित्तीय संकट को देखते हुए वेतन में कटौती और मुफ्त सुविधाओं को वापस ले रहा है।

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रुपम
रुपम
रुपम के पास 20 साल से ज्यादा का पत्रकारिता का अनुभव है। जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा। जी न्यूज से टेलीविज़न न्यूज चैनल में कामकाज की शुरुआत। सहारा न्यूज नेटवर्क के प्रादेशिक और नेशनल चैनल में टेलीविज़न की बारीकियाँ सीखीं। सहारा प्रोग्रामिंग टीम का हिस्सा बनकर सोशल मुद्दों पर कई पुरस्कार प्राप्त डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया। एडिटरजी डिजिटल हिन्दी चैनल में न्यूज एडिटर के तौर पर काम किया।

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