पूर्व नक्सली नेता गाँधी टेटे ने साथियों से की सरेंडर करने की अपील, भटक चुका है आंदोलन: सरकारी नीतियों के आगे नहीं टिकेगा लाल आतंक

छत्तीसगढ़ में नक्सली लगातार सरेंडर कर रहे हैं। इस बीच, पूर्व नक्सली नेता गाँधी टेटे उर्फ कमलेश उर्फ अरब ने अभी भी आंदोलन में बचे लोगों से हथियार डालने की अपील की है। टेटे ने हाल ही में नारायणपुर में अधिकारियों के सामने सरेंडर किया, उन्होंने कहा कि दशकों की लड़ाई के बाद भी संगठन अपने लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया।

टेटे ने ANI से कहा, “मैं चाहता हूँ कि बाकी सभी नक्सली सरेंडर कर दें क्योंकि हम अपने लक्ष्य से कहीं पास भी नहीं हैं और सरकार की सख्त नीतियों की वजह से हम इसे हासिल भी नहीं कर पाएँगे।” उन्होंने बताया कि वे माओवादी आंदोलन से करीब दो दशक तक जुड़े रहे लेकिन इस दौरान कोई असली प्रगति नहीं दिखी।

उन्होंने आगे कहा, “पार्टी के विचार सिर्फ कागज पर हैं। अलग-अलग इलाकों में संगठन मजबूत करने की बातें होती थीं, लेकिन हकीकत में कुछ भी नहीं बदला। हम जंगलों तक सीमित रहे और जो करना चाहते थे, वो कभी नहीं कर पाए।”

टेटे ने संगठन में लगी पाबंदियों के बारे में भी बताया, कहा कि बच्चों को स्कूल जाने नहीं दिया जाता था और मोबाइल फोन इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं थी। उन्होंने कहा, “हमें बेसिक सुविधाओं और जरूरतों से दूर रखा जाता था। जिंदगी बहुत मुश्किल थी।” ये अंदरूनी पाबंदियाँ समय के साथ उनके अपने सदस्यों को भी दूर कर रही थीं।

एक और सरेंडर किए नक्सली सुकलाल जुर्री उर्फ डॉ. सुकलाल ने भी ऐसी ही कहानी सुनाई। उन्होंने 2006 में नक्सली संगठन जॉइन किया और मार्ह डिवीजन में मेडिकल प्रैक्टिशनर और डिविजनल कमिटी (DVC) मेंबर के तौर पर काम किया, फिर इस साल सरेंडर कर दिया।

सुकलाल ने कहा, “मैंने 20 अगस्त 2025 को नारायणपुर SP के सामने सरेंडर किया। मुझे जंगलों में नक्सली लीडर्स ने मेडिकल प्रैक्टिस की ट्रेनिंग दी। मुझे हमेशा से मेडिसिन में दिलचस्पी थी, इसलिए मैंने जल्दी सीख लिया।” अपनी भूमिका बताते हुए उन्होंने कहा, “डॉक्टर की तरह मैं ग्रुप में मेडिकल काम करता था, जिसमें 10-15 लोगों की इच्छा से नसबंदी तक की।”

अधिकारियों के मुताबिक, पिछले दो महीनों में 110 नक्सली सरेंडर कर चुके हैं, जिनमें 52 महिलाएँ और 58 पुरुष हैं, उम्र 18 से 50 साल के बीच। सभी को अब अलग-अलग वोकेशनल ट्रेनिंग प्रोग्राम में डाला गया है ताकि वे नई जिंदगी शुरू कर सकें और समाज में दोबारा घुल-मिल सकें। अधिकारियों ने कहा कि ये पुनर्वास योजनाएँ एक बड़ी रणनीति का हिस्सा हैं जिसका मकसद नक्सलियों को हिंसा छोड़कर नई जिंदगी शुरू करने के लिए प्रोत्साहित करना है।