गुजरात की एंटी-टेरर स्क्वॉड (एटीएस) ने खतरनाक बायो-टेरर प्लॉट का पर्दाफाश किया था। इस साजिश का मुख्य आरोपित डॉ. अहमद मोहिउद्दीन सैयद घातक जहर रिसिन बेचकर अपनी जिंदगी रौशन करने का प्लान बना रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक, डॉ. मोहिउद्दीन ने अपने दो साथियों के साथ मिलकर ये प्लान रचा था। तीनों को 8 नवंबर 2025 को गुजरात के बनासकांठा जिले से गिरफ्तार किया गया।
डॉ. मोहिउद्दीन के भाई फारूकी ने पुलिस को बताया कि जब वो फ्लैट पर आने वाले पार्सल्स के बारे में पूछते थे, तो मोहिउद्दीन कहता था, “मैं ऐसी दवा बना रहा हूँ, जिससे हमारा पूरा परिवार अमीर हो जाएगा।” डॉ. मोहिउद्दीन एक जनरल फिजिशियन था और हैदराबाद के राजेंद्रनगर इलाके में फोर्ट व्यू कॉलोनी के असद मंजिल अपार्टमेंट में रहता था।

आतंकी मोहिउद्दीन पाँच मंजिला बिल्डिंग के फ्लैट में अकेला रहता था। उसने चीन से एमबीबीएस की डिग्री ली थी और मरीजों को फ्री ऑनलाइन कंसल्टेशन देता था। गुजरात एटीएस के डीआईजी सुनील जोशी ने कन्फर्म किया कि मोहिउद्दीन का पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से कनेक्शन था।
मोहिनुद्दीन के 2 साथियों में पहला आजाद सुलेमान शेख (20 साल का दर्जी) यूपी के शामली का रहने वाला है और दूसरा मोहम्मद सुहेल मोहम्मद सलीम खान (23 साल का स्टूडेंट ) लखीमपुर खीरी का रहने वाला है। एटीएस ने सुहेल के घर से आईएसआईएस की किताबें और झंडे बरामद किए। तीनों पर आर्म्स एक्ट, भारतीय न्याय संहिता और गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून (यूएपीए) के तहत केस दर्ज किया गया है।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, गिरफ्तारी के बाद एटीएस को पता चला कि ये आतंकी एक बड़े केमिकल अटैक की तैयारी कर रहे थे, जिसमें रिसिन का इस्तेमाल होता। डॉ. मोहिउद्दीन को उसके फॉरेन हैंडलर अबू खदीजा से इंस्ट्रक्शन मिल रहे थे। ये हैंडलर अफगानिस्तान में रहता है और इस्लामिक स्टेट खोरासान प्रोविंस (आईएसकेजीपी) से जुड़ा है। एटीएस ने कहा, “मोहिउद्दीन और उसके हैंडलर के बीच सोशल मीडिया चैट्स के सबूत मिले। इसके साथ ही चैटजीपीटी पर खतरनाक केमिकल्स बनाने के तरीकों की सर्च भी मिली।”
जाँच में ये भी सामने आया कि आजाद सुलेमान और मोहम्मद सुहेल ने पाकिस्तान बेस्ड हैंडलर के कहने पर डॉ. मोहिउद्दीन को हथियारों का बैग सौंपा था। आजाद एक बार जम्मू-कश्मीर के बारामूला गया था, ताकि वहाँ टेरर अटैक कर सके। लेकिन टारगेट न मिलने पर वो दिल्ली लौट आया। दिल्ली आने के बाद वो हरिद्वार गया और वहाँ बड़े मंदिरों की रेकी की। पूछताछ में तीनों ने कबूला कि वो कैस्टर के बीजों से रिसिन निकालने की प्लानिंग कर रहे थे, लेकिन इसे इस्तेमाल करने का तरीका अभी तय नहीं किया था।
रिसिन की सिर्फ 2000MG मात्रा भी ले सकती है जान
रिपोर्ट में बताया गया कि 1978 से 2025 तक दुनिया भर में रिसिन से जुड़े 40 बड़े साजिशों का मामला दर्ज है। लेकिन भारत में अभी तक इसका इस्तेमाल होने का कोई केस नहीं मिला। आईएसआईएस से जुड़े टेरर ग्रुप्स ने रिसिन का खूब इस्तेमाल किया है। इसलिए जाँच एजेंसियाँ आईएसकेजीपी और इस्लामिक स्टेट-हिंद प्रोविंस (आईएसएचपी) जैसे आईएसआईएस कनेक्टेड मॉड्यूल्स की भी पड़ताल कर रही हैं।
लखनऊ के केमिकल एक्सपर्ट आनंद अस्थाना ने दैनिक भास्कर से कहा, “रिसिन बेहद खतरनाक जहर है। ये छोटे-छोटे कैस्टर के बीजों को रिफाइन करके बनाया जाता है। ये सफेद पाउडर के रूप में होता है और जितना बारीक पाउडर, उतना ज्यादा घातक। अगर धूल भरे इलाके में इसे बिखेर दिया जाए, तो बड़ी आबादी प्रभावित हो सकती है। इसके असर को दिखने में दो-तीन दिन लग सकते हैं, लेकिन ये मौत का कारण बन जाता है। सबसे डरावनी बात ये है कि इसके खिलाफ कोई इलाज या एंटीडोट नहीं है। एक बार जहर शरीर में घुस गया, तो मौत पक्की।”
अस्थाना ने आगे बताया, “रिसिन पानी में घुल जाता है। इसे सिरिंज से किसी के शरीर में इंजेक्ट भी किया जा सकता है। अगर पानी से पिया जाए, तो घंटों में असर दिखता है। सिरिंज से डालने पर ये तुरंत खून में मिल जाता है।”
द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मन फौज ने जमकर किया था रिसिन का इस्तेमाल
ये जहर रिसिन 1888 में जर्मन वैज्ञानिक पीटर हर्मन स्टिलमार्क ने खोजा था। सायनाइड से भी ज्यादा घातक ये केमिकल वर्ल्ड वॉर-II में जर्मन आर्मी ने इस्तेमाल किया था। मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस की रिपोर्ट के मुताबिक, यूएस सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने रिसिन को कैटेगरी बी बायोटेररिज्म एजेंट घोषित किया है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के रेजोल्यूशन (यूएनएससीआर) ने इसे बैन कर रखा है। भारत का 2005 का वेपन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन एक्ट भी ऐसे बायोटॉक्सिन्स के प्रोडक्शन या स्टोरेज पर रोक लगाता है।
एटीएस की ये कार्रवाई टेरर मॉड्यूल्स के खिलाफ देशव्यापी अलर्ट का हिस्सा है। जाँच जारी है, ऐसे में और खुलासों की उम्मीद है।

