मणिपुर के कुकी क्रिश्चियन संगठन ने भारत के मामले में की विदेशी दखल की अपील, US-UN को लिखा पत्र: रोड प्रोजेक्ट रोकने की कर रहा डिमांड

मणिपुर में सक्रिय एक कुकी-जो संगठन ‘कुकी अलायंस फॉर नांपी अवेकनिंग मूवमेंट’ (कानाम) नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) को निशाना बनाने के लिए लगातार विदेशी संस्थाओं को पत्र लिख रहा है। इस कुकी क्रिश्चियन ग्रुप ने नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क, यूएन एनवायरनमेंट प्रोग्राम (यूनेप) और यूएन परमानेंट फोरम ऑन इंडिजिनस इश्यूज को पत्र भेजे हैं। अमेरिकी दूतावास को पत्र लिखकर कानाम ने भारत के आंतरिक मामलों में अमेरिका से हस्तक्षेप की माँग की है।

NGT के आदेश को ‘उत्पीड़न’ बताकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शिकायत

कानाम ने 30 दिसंबर 2025 के पत्र में एनजीटी पर ‘संस्थागत हिंसा’, ‘नौकरशाही हत्या’, ‘सामूहिक सजा’ और ‘घातक उदासीनता’ जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। यह हमला तब आया है जब एनजीटी ने 23 दिसंबर को एक अंतरिम आदेश जारी कर अवैध ‘रिंग रोड’ के निर्माण को रोक दिया। इस अनधिकृत सड़क को स्थानीय लोग ‘जर्मन रोड’ और कुछ हिस्सों में ‘टाइगर रोड’ कहते हैं। बताया जाता है कि यह सड़क कुकी उग्रवादियों के नाम पर रखी गई है।

पत्र में कानाम के सचिव हमिंगथांगकिमा सैलो ने लिखा है, “कानाम यह औपचारिक रूप से दर्ज करना चाहता है कि 23 दिसंबर 2025 के एनजीटी के पूर्ण निर्माण प्रतिबंध के बाद मणिपुर में कुकी-जो क्रिश्चियन आदिवासी आबादी को गंभीर और तत्काल खतरा पैदा हो गया है। इस आदेश ने कुकी-जो पहाड़ी इलाकों तक पहुँचने वाली आखिरी सुरक्षित कनेक्टिविटी को प्रभावी रूप से काट दिया है, जब नेशनल हाइवे जातीय दुश्मनी, कानून-व्यवस्था की विफलता और राज्य की नाकामी के कारण दुर्गम हो चुके हैं।”

पत्र में आगे लिखा है, “पहाड़ी सड़कें यहाँ विकास की सुविधा नहीं, बल्कि मानवीय जीवनरेखाएँ हैं। इसे पर्यावरण संरक्षण के नाम पर सही नहीं ठहराया जा सकता। यह घातक उदासीनता से शासन है। जब संस्थाएँ जानबूझकर किसी टारगेट बने अल्पसंख्यक वर्ग के निकासी मार्ग, सप्लाई लाइन और नागरिक आवागमन को बाधित करती हैं, तो वे लापरवाही की सीमा पार करके नैतिक अपराध की श्रेणी में आ जाती हैं, चाहे कार्रवाई को जस्टिफाई करने के लिए कोई भी भाषा इस्तेमाल की जाए।”

पत्र में आगे कहा गया, “कानाम अमेरिकी सरकार से आग्रह करता है कि वह इस स्थिति पर करीब से नजर रखे और यह मान्यता दे कि भारत में न्यायिक और प्रशासनिक संस्थाओं का इस्तेमाल पर्यावरण नियमन के आवरण में सामूहिक सजा देने के लिए किया जा रहा है। इसका पूर्वानुमानित परिणाम नागरिक पीड़ा और जान का नुकसान होगा। अलगाव, देर से निकासी या पहुंच से इनकार के कारण होने वाली किसी भी आगे की कुकी-जो मौत की जिम्मेदारी भारतीय राज्य और उसके लागू करने वाली संस्थाओं पर होगी। यह संवाद रिकॉर्ड, जवाबदेही और आगे नुकसान रोकने के हित में किया जा रहा है।”

भारत के घरेलू मामले पर अमेरिका से ‘निगरानी’ की माँग करना भारतीय उपायों को दरकिनार करके विदेशी दखलंदाजी माँगने जैसा है।

अवैध सड़क, वन कटाई और छुपाए गए तथ्य

जिस सड़क को KANAM ‘मानवीय जीवनरेखा’ बता रहा है, वह कोई आधिकारिक सरकारी परियोजना नहीं है। यह सड़क चुराचांदपुर, कांगपोकपी, नोनी और उखरूल जैसे जिलों के संवेदनशील वन और पहाड़ी इलाकों से होकर गुजरती है, जहाँ बिना किसी वन स्वीकृति, पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) या वैधानिक अनुमति के निर्माण और कटाई की गई।

NGT के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों में सैटेलाइट इमेजरी और फरवरी 2025 में वर्ल्ड कुकी-जो इंटेलेक्चुअल काउंसिल का एक ज्ञापन भी शामिल था, जिसमें इस अवैध निर्माण का उल्लेख है। इसके बावजूद KANAM ने अपने अंतरराष्ट्रीय पत्रों में इन तथ्यों को नजरअंदाज करते हुए पूरे मामले को जातीय और धार्मिक उत्पीड़न के रूप में पेश किया।

फंडिंग, विदेशी हस्तक्षेप और संप्रभुता पर सवाल

KANAM की ओर से अमेरिकी राजदूत और संयुक्त राष्ट्र संस्थाओं से निगरानी की अपील करना कई सवाल खड़े करता है। भारत की एक वैधानिक न्यायिक संस्था के अंतरिम आदेश को लेकर विदेशी हस्तक्षेप की माँग क्यों की गई?

संगठन की ओर से जिस तरह की कानूनी भाषा, विस्तृत दस्तावेज और अंतरराष्ट्रीय समन्वय दिखता है, उससे यह संदेह भी गहराता है कि क्या इसके पीछे केवल एक ‘ग्रासरूट आंदोलन’ है या फिर प्रवासी नेटवर्क, विदेशी एनजीओ, चर्च-संबंधित संगठन या अलगाववादी सोच से जुड़े तत्व।

विशेषज्ञों का कहना है कि NGT का आदेश न तो अंतिम है और न ही एकतरफा, 2 फरवरी 2026 को इस पर सुनवाई तय है। इसके बावजूद इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उत्पीड़न बताना भारत की न्यायिक प्रक्रिया और संप्रभुता पर सवाल उठाने जैसा है।