ऑस्ट्रेलिया ने 8 जनवरी 2026 से भारत, नेपाल, बांग्लादेश और भूटान से आने वाले छात्रों के वीजा आवेदनों की जाँच प्रक्रिया को काफी सख्त कर दिया है। इन चार दक्षिण एशियाई देशों को अब ‘सबसे अधिक जोखिम’ वाली श्रेणी में रखा गया है, जिससे वीजा मिलना पहले से कहीं मुश्किल हो जाएगा।
भारत समेत चार देश ‘एविडेंस लेवल-3’ में शामिल
रिपोर्ट्स के अनुसार, ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने सिम्प्लीफाइड स्टूडेंट वीजा फ्रेमवर्क (SSVF) के तहत इन देशों को Evidence Level-2 से हटाकर Evidence Level-3 में डाल दिया है। इसका मतलब है कि अब छात्रों को ज्यादा दस्तावेज देने होंगे, बैंक स्टेटमेंट की मैनुअल जांच होगी, अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा प्रमाण और शैक्षणिक पृष्ठभूमि के कागजात जमा करने पड़ेंगे। वीजा अधिकारी जरूरत पड़ने पर कॉलेज, संस्थानों और रेफरी से सीधे संपर्क भी कर सकेंगे।
वीजा प्रोसेसिंग का समय अब 3 हफ्ते से बढ़कर 6-8 हफ्ते तक हो सकता है। सरकार ने आधिकारिक तौर पर कोई कारण नहीं बताया, लेकिन माना जा रहा है कि यह फैसला केरल में बड़े फर्जी डिग्री रैकेट के खुलासे के बाद लिया गया है।
ऑस्ट्रेलिया के शिक्षा अधिकारियों का कहना है कि यह अतिरिक्त दिसंबर की शुरुआत में भारत में बड़े पैमाने पर फर्जी डिग्री रैकेट के खुलासे की खबरों की वजह से शुरू हुई होगी, जिसमें अधिकारियों ने 100,000 से ज्यादा फर्जी सर्टिफिकेट जब्त किए थे।
केरल फेक डिग्री रैकेट की वजह से लिया गया फैसला?
इस मामले ने ऑस्ट्रेलिया में राजनीतिक हंगामा खड़ा कर दिया है। ऑस्ट्रेलियाई सीनेटर मैल्कम रॉबर्ट्स ने 6 जनवरी को X पर पोस्ट किया, “भारत में पुलिस ने कथित तौर पर 22 विश्वविद्यालयों से 1 लाख फर्जी सर्टिफिकेट जब्त किए हैं, और 10 लाख से ज्यादा संभवतः विदेशों में नौकरियों के लिए इस्तेमाल हो चुके होंगे। मैंने अगस्त में इस बारे में चेतावनी दी थी (और अक्टूबर के अनुमान सत्र में सवाल भी पूछे थे)—ऑस्ट्रेलिया में 23,000 विदेशी छात्रों को खरीदी हुई डिग्रियों के साथ पाया गया था, जिनमें से कई बुजुर्गों की देखभाल और छोटे बच्चों की शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में काम कर रहे थे।”

रॉबर्ट्स ने आगे लिखा, “मैंने मंत्री वॉट से पूछा था कि क्या वे इस धोखाधड़ी करने वालों को देश से निकालेंगे। बदले में मुझे सिर्फ बहाने और भ्रम पैदा करने वाले जवाब मिले। अल्बनीज सरकार कार्रवाई करने से साफ इनकार कर रही है, जबकि ये स्पष्ट रूप से वीजा नियमों का उल्लंघन हैं।”
हालाँकि सरकार ने भारत को उच्च जोखिम श्रेणी में डालने का कोई आधिकारिक कारण नहीं बताया, लेकिन यह फैसला भारत में सामने आए फर्जी डिग्री मामलों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी चर्चा के बाद लिया गया माना जा रहा है। इस घटना से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा धोखाधड़ी की जाँच और तेज होने की संभावना है।

