कनाडा में पढ़ने जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या 2023 के मुकाबले करीब 67 प्रतिशत तक घट गई है। इसकी बड़ी वजह सख्त वीजा नियम और भारत-कनाडा के बीच पिछले कुछ समय से चले आ रहे कूटनीतिक तनाव माने जा रहे हैं। अब इसी गिरावट को रोकने और रिश्तों को फिर से मजबूत करने के लिए कनाडा के 21 विश्वविद्यालयों के कुलपति भारत आने वाले हैं।
यह उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल 02 से 06 फरवरी 2026 के बीच भारत दौरे पर रहेगा। इस दौरे का आयोजन यूनिवर्सिटी ऑफ कनाडा कर रही है। प्रतिनिधिमंडल गोवा, नई दिल्ली और गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी (GIFT City) का दौरा करेगा। इस ग्रुप का उद्देश्य भारत और कनाडा के बीच रिसर्च सहयोग बढ़ाना और इंडस्ट्री के साथ नए तरह के शैक्षणिक साझे तलाशना है। दोनों देश चाहते हैं कि शिक्षा को आपसी रिश्तों की मजबूत नींव बनाया जाए।
यह दौरा अक्टूबर 2025 में जारी भारत-कनाडा रोडमैप के बाद हो रहा है, जिसमें शिक्षा, डिजिटल टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन को लेकर सहयोग पर जोर दिया गया था। इसी के साथ दोनों देशों ने व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) पर बातचीत भी शुरू की है, जिसका लक्ष्य 2030 तक आपसी व्यापार को ₹4.58 लाख करोड़ तक पहुँचाना है।
भारत में कनाडा के उच्चायुक्त क्रिस्टोफर कूटर ने इस दौरे को दोनों देशों के रिश्तों को आगे बढ़ाने की दिशा में एक ‘बड़ा कदम’ बताया। उन्होंने कहा कि सतत विकास और AI जैसे क्षेत्रों में मिलकर नए इनोवेशन के कई मौके हैं। वहीं कनाडा में भारत के उच्चायुक्त दिनेश पटनायक ने भी इस पहल का स्वागत किया।
उन्होंने कहा कि यह प्रतिनिधिमंडल लंबे समय के शैक्षणिक सहयोग को मजबूत करने में मदद करेगा। खासकर ऐसे समय में जब कनाडाई सरकार रिसर्च और टैलेंट के लिए ₹11.3 हजार करोड़ का निवेश कर रही है।
यह पहल ऐसे समय में शुरू हुई है, जब कनाडा का शिक्षा क्षेत्र गंभीर मुश्किलों से गुजर रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह भारतीय छात्रों की संख्या में तेज गिरावट है। एक समय ऐसा था जब कनाडा में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों में करीब 40 प्रतिशत हिस्सेदारी भारतीय छात्रों की हुआ करती थी।
लेकिन 2025 के पहले 7 महीनों में नए स्टडी परमिट की मंजूरी घटकर सिर्फ 52,765 रह गई। यह संख्या 2024 के मुकाबले 50 प्रतिशत कम है और 2023 के उच्च स्तर (करीब 2,78,000) से लगभग 67 प्रतिशत गिरावट दिखाती है।
कुल मिलाकर साल 2025 में कनाडा आने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या लगभग 60 प्रतिशत तक घट गई। भारतीय छात्रों के आवेदन तो कुछ महीनों में 80 प्रतिशत तक गिर गए। हालात इतने सख्त हो गए कि वीजा रिजेक्शन रेट बढ़कर 74 प्रतिशत तक पहुँच गया, जबकि 2023 में यह सिर्फ 32 प्रतिशत था।
इस गिरावाट के पीछे कई कारण हैं। इनमें 2024-25 के लिए नए स्टडी परमिट पर तय सीमा (3,16,276) शमिल है, जिसमें से भी सिर्फ 20-30 प्रतिशत लक्ष्य पूरा होने की उम्मीद है। इसके अलावा सख्त जाँच के दौरान 14000 से ज्यादा फर्जी दस्तावेज पकड़े गए, वित्तीय सबूतों के नियम और कड़े किए गए और पढ़ाई के बाद काम करने के विकल्पों पर भी पाबंदियाँ लगाई गईं। इन सभी वजहों ने मिलकर कनाडा में भारतीय छात्रों की आमद को तेजी से कम कर दिया है।
भारत और कनाडा के बीच कूटनीतिक रिश्तों में आई खटास ने भी हालात को और बिगाड़ दिया है। यह तनाव खासतौर पर तब बढ़ा जब कनाडा के पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन टूडो ने साल 2023 में खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत की भूमिका को लेकर आरोप लगाए थे। इसके बाद भारतीय परिवारों में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी और कनाडा में पढ़ाई को लेकर रुचि कम होती चली गई।
इसका असर कनाडा के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों पर साफ दिख रहा है, खासकर उन संस्थानों पर जो विदेशी छात्रों की फीस पर काफी हद तक निर्भर हैं। उदाहरण के तौर पर, यूनिवर्सिटी ऑफ वॉटरलू ने बताया है कि पिछले तीन सालों में भारतीय छात्रों की संख्या करीब दो-तिहाई तक घट गई है। इससे पूरे कनाडा की अर्थव्यवस्था को मिलाकर करीब …. का नुकसान होने का अनुमान है।
छोटे कॉलेजों की हालत और भी खराब है। खासकर ओंटारियो जैसे प्रांतो में, जहाँ अंतरराष्ट्रीय छात्रों में 60 प्रतिशत से ज्यादा भारतीय होते हैं। नुकसान को कम करने के लिए इन कॉलेजों ने आपात कदम उठाने शुरू कर दिए हैं, जैसे स्कॉलरशिप देना और ऑनालइन कोर्स शुरू करना।
इन समस्याओं से निपटने के लिए कनाडा का यह प्रतिनिधिमंडल अब सतत ट्रांसनेशनल एजुकेशन मॉडल पर जोर देगा। इसमें ‘स्टडी इन इंडिया’ जैसे विकल्प शामिल हैं, जहाँ भारतीय छात्र भारत में रहकर ही कनाडाई डिग्री हासिल कर सकें। इससे यात्रा और वीजा जैसी दिक्कतों से बचा जा सकेगा और पढ़ाई की गुणवत्ता भी बनी रहेगी। यूनिवर्सिटी ऑफ कनाडा की अध्यक्ष जॉय जॉनसन ने कहा, “यह मिशन चुनौतियों को मौके में बदलने की कोशिश है। भारतीय संस्थानों के साथ मिलकर हम ऐसे समाधान तैयार कर सकते हैं, जिनसे दोनों देशों की ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था को फायदा हो।”
वहीं दूसरी ओर भारतीय छात्र अब दूसरे विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। जैसे ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी या फिर भारत में रहकर की पढ़ाई। इसी वजह से साल 2025 में भारत से बाहर पढ़ने जाने वाले छात्रों की कुल संख्या में 5.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

