असम में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया और फॉर्म-7 को लेकर सियासत गरमा गई है। विपक्षी दल जहाँ इसे अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की कोशिश बता रहे हैं, वहीं मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने साफ शब्दों में कहा है कि यह पूरा मामला वोटर लिस्ट की शुद्धता से जुड़ा है, न कि किसी समुदाय को परेशान करने से। सीएम ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि अवैध रूप से रह रहे लोगों पर कार्रवाई करना राज्य और लोकतंत्र दोनों के हित में है।
SIR पर विपक्ष के आरोप, सीएम का पलटवार
कॉन्ग्रेस और वामपंथी दलों ने आरोप लगाया है कि फॉर्म-7 का दुरुपयोग कर खासतौर पर मुस्लिम वोटरों को परेशान किया जा रहा है। इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने सवाल उठाया कि क्या किसी मूल निवासी हिंदू या असमिया मुस्लिम परिवार को नोटिस मिला है?
उन्होंने स्पष्ट किया कि SIR के तहत नोटिस उन मिया मुस्लिमों को दिए जा रहे हैं, जो बांग्लादेश से आकर अवैध रूप से असम में रह रहे हैं और जिनकी नागरिकता पर सवाल हैं। सीएम के मुताबिक, वोटर लिस्ट की समीक्षा एक सामान्य और कानूनी प्रक्रिया है, जिसे राजनीतिक रंग देना गलत है।
‘स्थानीय समुदाय सुरक्षित, अवैध घुसपैठ पर सख्ती’
दावोस से लौटने के बाद मुख्यमंत्री ने दो टूक कहा कि सरकार गरीबों और दबे-कुचले लोगों के साथ खड़ी है, लेकिन उन तत्वों के साथ नहीं, जो असम की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को खतरे में डालते हैं। उन्होंने कहा कि असम के मूल निवासी चाहे हिंदू हों या मुस्लिम, उन्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है।
नोटिस केवल उन्हीं को दिया जा रहा है, जिनका यहाँ रहना अवैध है। सीएम ने यह भी कहा कि राज्य के लोग लंबे समय से अवैध घुसपैठ का विरोध कर रहे हैं और सरकार उसी भावना के अनुरूप काम कर रही है।
चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण, घबराने की जरूरत नहीं
विवाद बढ़ने के बीच राज्य निर्वाचन विभाग ने भी स्थिति साफ की है। आयोग ने कहा है कि फॉर्म-7 भरने से किसी का नाम अपने आप वोटर लिस्ट से नहीं हटता। हर आपत्ति की जाँच एक तय कानूनी प्रक्रिया के तहत होती है, जिसमें फील्ड वेरिफिकेशन और संबंधित मतदाता को नोटिस देना शामिल है।
आयोग ने मतदाताओं से अपील की है कि वे सही जानकारी दें और सत्यापन प्रक्रिया में सहयोग करें। सभी आपत्तियों का निपटारा तय समयसीमा के भीतर किया जाएगा और अंतिम मतदाता सूची निर्धारित तारीख को प्रकाशित होगी।

