कोर्ट ने कहा कि जब दो बालिग सहमति से लिव-इन रिश्ते में रहते हैं और बाद में संबंध टूट जाता है, तो केवल इस आधार पर पुरुष को गंभीर आपराधिक मामलों में फँसाना कानून का गलत इस्तेमाल है। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि मौजूदा कानून उस समय बनाए गए थे जब लिव-इन रिलेशनशिप की अवधारणा मौजूद नहीं थी।
क्या है पूरा मामला
यह मामला उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले का है। अगस्त 2021 में एक दलित युवती की माँ ने FIR दर्ज कराई थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि OBC समुदाय के युवक ने फरवरी 2021 में उसकी बेटी को शादी का झाँसा देकर घर से भगा कर ले गया। आरोप था कि युवक ने युवती के साथ शारीरिक संबंध बनाए, उसे गर्भवती किया और बाद में उसे घर से निकाल दिया।
इस मामले में पुलिस ने आरोपित के खिलाफ IPC की धाराएँ 323, 363, 366, 376, पॉक्सो एक्ट की धारा 6 और SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(V) में चार्जशीट दाखिल की। महाराजगंज की विशेष अदालत ने युवक को सभी धाराओं में दोषी ठहराते हुए पॉक्सो में 20 साल की सजा, SC/ST एक्ट में उम्रकैद सहित अलग-अलग सजाएँ सुनाई थीं।
हाईकोर्ट ने क्यों रद्द की सजा
आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस प्रशांत मिश्रा की खंडपीठ ने पाया कि पीड़िता घटना के समय बालिग थी। कोर्ट ने CMO महाराजगंज द्वारा जारी आयु प्रमाण पत्र का हवाला देते हुए कहा कि युवती की उम्र अगस्त 2021 में करीब 20 साल थी।
कोर्ट ने कहा कि युवती अपनी मर्जी से आरोपित के साथ गई थी और दोनों छह महीने तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे। वे सार्वजनिक स्थानों और अन्य लोगों के बीच रहते थे, जिससे जबरन अपहरण या शादी के लिए मजबूरी का आरोप साबित नहीं होता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पीड़िता बालिग हो और संबंध सहमति से बने हों, तो न तो पॉक्सो एक्ट लागू होता है और न ही दुष्कर्म की धारा। कोर्ट ने यह भी कहा कि SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(V) तभी लागू होती है जब IPC के तहत 10 साल या उससे अधिक की सजा हो, जो इस मामले में नहीं था।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि आजकल लिव-इन रिश्तों के टूटने के बाद FIR दर्ज कराने की प्रवृत्ति बढ़ रही है और ऐसे मामलों में पुरुषों को उन कानूनों के तहत दोषी ठहराया जा रहा है, जो लिव-इन की अवधारणा से पहले बने थे। अंत में कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द करते हुए आरोपित को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया।

