मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु में मंदिरों के उत्सवों को लेकर एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाया है। मंगलवार (17 फरवरी 2026) को कोर्ट ने साफ कर दिया कि अब मंदिर के निमंत्रण पत्रों पर किसी भी व्यक्ति या प्रायोजक का जाति सूचक नाम नहीं छापा जाएगा।
जस्टिस भरत चक्रवर्ती ने डीएमके (DMK) सरकार के ‘हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग’ (HR&CE) को सख्त निर्देश दिए हैं कि भविष्य में होने वाले किसी भी आयोजन में जाति को बढ़ावा न दिया जाए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि भारत एक गणराज्य है जहाँ सबको समान अधिकार हैं, ऐसे में सरकारी विभाग जातिवाद को बढ़ावा नहीं दे सकते।
सिर्फ नाम छपेगा, जाति वाला हिस्सा हटेगा
जस्टिस भरत चक्रवर्ती ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अगर कोई ‘उभयधरार’ (दान देने वाला या प्रायोजक) मंदिर उत्सव के लिए अपना नाम देता है और उसके साथ अपनी जाति जोड़ता है, तो मंदिर प्रबंधन और सरकारी विभाग केवल उसका नाम ही छापेंगे।
नाम के पीछे लगे जाति सूचक शब्दों को अनिवार्य रूप से हटा दिया जाएगा। अदालत ने कहा कि मंदिर उत्सवों में किसी भी तरह से जाति पर गर्व दिखाना या उसका प्रचार करना संवैधानिक रूप से गलत है।
मासी ब्रह्मोत्सवम की याचिका पर आया फैसला
यह पूरा मामला एन समरन द्वारा दायर की गई एक याचिका के बाद सामने आया। याचिकाकर्ता ने माँग की थी कि आगामी ‘मासी ब्रह्मोत्सवम’ के निमंत्रण पत्रों में जाति सूचक नामों के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाए।
राज्य सरकार ने दलील दी थी कि विभाग खुद से जाति नहीं जोड़ता, बल्कि दान देने वाले जो नाम लिख कर देते हैं, वही छाप दिया जाता है। इस पर कोर्ट ने साफ कहा कि पुराने फैसलों के आधार पर भी जाति के नाम से बचना जरूरी है, इसलिए अब से सिर्फ व्यक्ति का नाम ही पहचान बनेगा।
इस साल के लिए मिली थोड़ी राहत
चूंकि इस साल के ‘मासी ब्रह्मोत्सवम’ के कार्ड पहले ही छप चुके हैं और उत्सव शुक्रवार (20 फरवरी 2026) से शुरू हो रहा है, इसलिए अदालत ने वर्तमान आयोजन के लिए कार्ड बदलने का निर्देश नहीं दिया है।
हालाँकि, यह आदेश आने वाले सभी उत्सवों के लिए पत्थर की लकीर बन गया है। अब तमिलनाडु के सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में किसी भी वीआईपी या दानदाता की जाति विज्ञापनों या कार्डों पर नजर नहीं आएगी।

