धर्मांतरण से 60 दिन पहले सूचित करने को भी अनिवार्य कर दिया गया है। नाबालिग, महिला, एससी-एसटी और मानसिक रूप से अस्वस्थ्य व्यक्ति के केस में सजा का प्रावधान ज्यादा है। बार-बार ऐसा करने पर आरोपितों को 10 साल सजा दी जा सकती है।
विधेयक में बच्चों के धर्म निर्धारण के प्रावधान
धर्म स्वतंत्रता विधेयक 2026 के मुताबिक, अगर किसी महिला की जबरदस्ती या झाँसे में लेकर शादी कर दी जाती है। ऐसी स्थिति में जो बच्चा पैदा होता है, तो उस बच्चे को माँ के मूल धर्म का माना जाएगा, यानी वह धर्म जो धर्मांतरण से पहले वह अपनाती थी। इस केस में बच्चे को माता-पिता की संपत्ति से भरण-पोषण पाने का अधिकार भी मिलेगा।
कानून में ‘ब्रेनवॉशिंग’ को अपराध माना गया है। बिल में ‘शिक्षा के माध्यम से ब्रेनवॉशिंग’ को अवैध धर्मांतरण का जरिया बताया गया है। इसमें एक धर्म को दूसरे से बेहतर बताना भी ‘लालच’ की श्रेणी में आएगा। साथ ही, किसी धर्म के रीति-रिवाजों को नकारात्मक तरीके से पेश करना ‘अवैध प्रभाव’ की श्रेणी में आएगा।
विधेयक में पुलिस को कार्रवाई की विशेष शक्ति दी गई है। पुलिस को अगर लगता है कि जबरन धर्मांतरण हुआ है या कानून का पालन नहीं किया गया है, तो बिना औपचारिक शिकायत के भी स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई करने कर सकती है।
खास बात है कि विधेयक में ‘प्रलोभन’ का दायरा बढ़ा दिया गया है। शिक्षा के अलावा, पैसा देकर या गिफ्ट देकर, रोजगार की सुविधा मुहैया कराकर या फिर धार्मिक संस्थानों द्वारा मुफ्त शिक्षा देकर धर्मांतरण करना ‘लालच’ की श्रेणी में ही आएगा। किसी गरीब को शादी का वादा कर या दैवी उपचार का झाँसा देकर धर्मांतरण करना भी इस कानून के तहत अपराध है।
विधेयक में संस्थाओं पर कार्रवाई का भी प्रावधान है। यदि कोई संस्था या संगठन इसमें शामिल पाया जाता है, तो उसका पंजीकरण रद्द किया जा सकता है और जिम्मेदार लोगों को 7 साल तक की जेल हो सकती है।
धर्म बदलने से 60 दिन पहले जानकारी देना जरूरी
विधेयक में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहता है, तो उसे कम से कम 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट को लिखित सूचना देनी होगी। इसमें व्यक्ति का नाम, उम्र, किस धर्म में है, किसे ज्वाइंन करना है- जैसी जानकारी देनी होगी।
इसके बाद स्थानीय जिला प्रशासन इसकी जाँच करेगा कि वह व्यक्ति किसी दबाव में या लालच में धर्मांतरण तो नहीं कर रहा। सारी जाँच के बाद ही उसे धर्मांतरण की अनुमति दी जाएगी। शादी के 25 दिन के अंदर इसका पंजीकरण करना भी जरूरी होगा, वरना इसे मान्यता नहीं दी जाएगी।
अगर कोई कानून का पालन नहीं करता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। धर्म परिवर्तन के नियमों का पालन अगर नहीं किया जाता है, तो धर्मांतरण को अवैध घोषइक किया जाएगा। उसे जेल और जुर्माना या दोनों सजा का सामना करना पड़ सकता है। उसे 7 साल जेल हो सकती है। एक लाख का जुर्माना लगाया जा सकता है। अगर मामला किसी महिला, नाबालिग,एससी, एसटी से जुड़ा होता है, तो 5 लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
मास कन्वर्जन को लेकर सख्ती
दो या दो से अधिक लोगों के एक साथ धर्म परिवर्तन को मास कन्वर्जन माना जाएगा। ऐसे मामलों में आयोजकों और धर्मांतरण से जुड़े लोगों को सख्त सजा देने का प्रावधान है। दोबारा ऐसा ही होता है तो उस व्यक्ति को 7 लाख रुपए तक जुर्माना देने पड़ सकता है।
धर्म परिवर्तन की शिकायत पीड़ित, उसके भाई-बहन, माता-पिता और दूसरे रिश्तेदार भी कर सकते हैं। पुलिस ऐसे मामलों को दर्ज करने में कोताही नहीं बरत सकती। कई बार जबरन धर्मांतरण के शिकार लोगों के पुनर्वास और रहने-खाने की व्यवस्था भी सरकार कर सकती है।
किन-किन राज्यों में लागू है धर्मांतरण कानून
पिछले 8 सालों में बीजेपी शासित कई सरकारों ने इस तरह के धर्मांतऱण को रोकने के लिए कानून बनाए हैं, ताकि किसी व्यक्ति को, खासकर महिलाओं को आसानी से अवैध तरीके से धर्मांतरण नहीं कराया जा सके। इन कानूनों का मकसद लव जिहाद से हिंदू लड़कियों और महिलाओं को छुटकारा दिलाना है। उन्हें जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन कराने और शादी कराने से रोकना है।
2017 से 9 राज्यों ने अवैध धर्म-परिवर्तन को रोकने काननू बनाए गए। इनमें 2017 में झारखंड, 2018 में उत्तराखंड , 2019 में हिमाचल प्रदेश, 2020 में उत्तर प्रदेश, गुजरात और मध्य प्रदेश में 2021 में कानून बनाया गया। हरियाणा और कर्नाटक में 2022 जबकि राजस्थान में 2025 में कानून बना।
इन सभी कानूनों का घोषित मकसद जोर-जबरदस्ती, धोखाधड़ी और लालच देकर योजनाबद्ध तरीके से धर्म-परिवर्तन कराने पर लगाम लगाना है। इन सभी जगहों पर धर्मांतरण से पहले स्थानीय प्रशासन से इजाजत लेना जरूरी है। गैर-कानूनी धर्म-परिवर्तन के मामले में आपराधिक मुकदमों में सबूत देने की जिम्मेदारी आरोपित पर होती है।
दरअसल ये कानून देश में हो रहे सुनियोजित तरीके से धर्मांतरण, लव जिहाद, लैंड जिहाद से लोगों को बचाने के लिए जरूरी है। लड़कियों को प्रेम जाल में फँसा कर आए दिन धर्म परिवर्तन कराने की घटनाएँ सामने आ रही हैं।
महाराष्ट्र की 35 सिविल सोसाइटी ने किया विरोध
हालाँकि महाराष्ट्र की 35 सिविल सोसाइटी ने महाराष्ट्र सरकार के प्रस्तावित धर्मांतरण विरोधी कानून का विरोध किया और इसे महिलाओं के अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया। इनलोगों ने सरकार से कानून वापस लेने का आग्रह किया है। इसे साधारण भाषा में ‘लव जिहाद’ कानून कहा जा रहा है।
इन संगठनों को खास कर जिन बिन्दुओं पर आपत्ति हैं उनमें धर्मांतरण से पहले स्थानीय प्रशासन से अनुमति लेना, धर्म परिवर्तन से कम से कम 60 दिन पहले सूचना देना और धर्मांतरण के बाद 25 दिनों के भीतर पंजीकरण कराना शामिल है। ऐसा न करने पर धर्मांतरण को अमान्य घोषित किया जा सकता है।
संगठनों को उन प्रावधानों पर भी आपत्ति है, जिसमें रिश्तेदारों को जबरदस्ती का आरोप लगाते हुए आपराधिक शिकायतें दर्ज करने की अनुमति दी गई है।
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की वकील लारा जेसानी का मानना है कि इस कानून को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाएगा और महिलाओं को अपनी पंसद के साथी से शादी करने या अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन करने से रोकने के लिए किया जाएगा। उन्होंने कहा कि मुस्लिम पुरुषों से शादी करने वाली हिंदू महिलाओं को असमान रूप से निशाना बनाया जाएगा।
ऐसे मामले जिसमें लड़कियाँ अपनी मर्जी से धर्म परिवर्तन करती हैं और शादी करती है, उन्हें 60 दिन पहले बताने में क्या दिक्कत है। उन्हें 25 दिन के अंदर पंजीकरण कराने से भी कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।
दिक्कत तो नाम बदल कर लड़की को प्रेम जाल में फँसा कर अवैध संबंध बनाने में है, क्योंकि इसका मकसद सिर्फ लड़की को प्यार से या दबाव डालकर धर्मांतरण के लिए मजबूर करना है। उससे निकाह कर प्रताड़ित करना है।
ऐसे मामलों में धर्मांतरण और निकाह एक हथियार की तरह इस्तेमाल होते हैं, ताकि लड़की को काबू में रखा जा सके। उसका शोषण किया जा सके। अपने परिजनों की इच्छा के विरुद्ध गई लड़की को सामाजिक मदद भी मिलना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में कहाँ गया उसका व्यक्तिगत अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, जो संविधान के मूलभूत अधिकारों में शामिल हैं और उसे भी मिले हुए हैं।


