लेंसकार्ट के डॉक्यूमेंट में सच में थी बिंदी-कलावा न पहनने की बात, सफाई के नाम पीयूष बंसल ने उलझाया: जानिए माफी माँगने पर भी क्यों नहीं खत्म हुआ विवाद

आईवियर जगत की दिग्गज कंपनी ‘लेंसकार्ट’ के एक डॉक्यूमेंट में कर्मियों को कलावा-बिंदी ना लगाने के निर्देश दिए गए थे जिस पर खूब विवाद हुआ। ऑपइंडिया ने भी इस मामले में कंपनी के एक स्टोर पर जाकर पड़ताल की जिसकी पूरी रिपोर्ट आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

विवाद बढ़ने के बाद कंपनी के संस्थापक पीयूष बंसल ने खुद इस मामले पर माफी माँगते हुए सफाई देने की कोशिश की। हालाँकि, पीयूष की सफाई पर भी विवाद कम नहीं हुआ उल्टा इस कथित सफाई पर भी लोगों ने खूब सवाल उठाए हैं।

उन्होंने कहा कि वायरल हो रही गाइडलाइन्स पुरानी हो चुकी हैं और कंपनी की वर्तमान पॉलिसी को नहीं दर्शातीं। पीयूष बंसल ने भरोसा दिलाया कि लेंसकार्ट अपनी गाइडलाइन्स की लगातार समीक्षा करता है और किसी की धार्मिक आस्था को ठेस पहुँचाना कंपनी का मकसद नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर पॉलिसी की भाषा में कोई कमी रह गई थी, तो उसे तुरंत सुधारा जाएगा।

भारतीय संस्कृति और पहचान पर गर्व

पीयूष बंसल ने जोर देकर कहा कि लेंसकार्ट एक शुद्ध भारतीय कंपनी है, जिसे भारतीयों ने ही बनाया है और यह भारतीयों के लिए ही काम करती है। उन्होंने कहा, “हमारे हजारों कर्मचारी पूरे देश में गर्व के साथ अपनी संस्कृति और धर्म का पालन करते हुए स्टोर्स में काम कर रहे हैं। यही हमारी असली पहचान है।” उन्होंने विश्वास दिलाया कि कंपनी हर सांस्कृतिक पहचान का सम्मान करती है और इसे कभी कम नहीं होने दिया जाएगा।

बंसल ने अपने बयान में स्वीकार किया कि एक कंपनी के तौर पर लेंसकार्ट लगातार सीख रही है। उन्होंने कहा कि जहाँ भी सुधार की गुंजाइश होगी, कंपनी पीछे नहीं हटेगी। इस स्पष्टीकरण के साथ उन्होंने उन सभी लोगों की चिंताओं को दूर करने की कोशिश की है जो सोशल मीडिया पर वायरल डॉक्यूमेंट को लेकर नाराज थे।

क्या था पूरा विवाद?

दरअसल, सोशल मीडिया पर लेंसकार्ट का एक पुराना पॉलिसी डॉक्यूमेंट वायरल हो रहा था। इस डॉक्यूमेंट में कथित तौर पर कर्मचारियों के लिए कार्यस्थल पर धार्मिक प्रतीक (जैसे बिंदी, तिलक या अन्य धार्मिक चिह्न) पहनने पर प्रतिबंध की बात कही गई थी। इस मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए ऑपइंडिया की टीम ने जमीनी स्तर पर जाँच की और स्टोर्स पर जाकर कर्मचारियों से सच्चाई जाननी चाही, जिसके बाद यह मामला चर्चा का विषय बन गया।

इस सफाई के बाद उन्होंने एक और पोस्ट किया, जिसके जवाब में कहानी थोड़ा बदली नज़र आती है। उन्होंने लिखा,”मैंने आपकी चिंताएँ सुनी हैं और मैं इस बारे में आपकी भावना समझता हूँ। मैं अपनी पिछली पोस्ट में और कॉन्टेक्स्ट जोड़ना चाहता हूँ। अभी जो डॉक्यूमेंट सर्कुलेट हो रहा है, वह एक पुराना इंटरनल ट्रेनिंग डॉक्यूमेंट है। यह कोई HR पॉलिसी नहीं है। फिर भी, इसमें बिंदी/तिलक के बारे में एक गलत लाइन थी जो कभी नहीं लिखी जानी चाहिए थी और यह हमारी वैल्यूज़ या असल प्रैक्टिस को नहीं दिखाती है। जब हमें 17 फरवरी को यह पता चला, इससे बहुत पहले कि यह पब्लिक में बात करे, हमने इसे तुरंत हटा दिया।”

उन्होंने आगे लिखा,”लेकिन मुझे यह पहले ही पकड़ लेना चाहिए था। फाउंडर और CEO के तौर पर, ऐसी गलतियों की जिम्मेदारी मेरी है। मैंने अपनी टीम से ऐसे सभी मटीरियल को और सख्ती से रिव्यू करने के लिए कहा है और मैं पर्सनली यह पक्का करूँगा कि आगे से इस पर ध्यान दिया जाए। हम यह भी देख रहे हैं कि यह हमारे ट्रेनिंग कंटेंट में कैसे आया। मैं बिल्कुल साफ कर दूँ। लेंसकार्ट किसी भी तरह के सम्मानजनक धार्मिक एक्सप्रेशन पर रोक नहीं लगाता है और न ही कभी लगाएगा। इसमें बिंदी, तिलक, या आस्था के ऐसे कोई भी सिंबल शामिल हैं। हमारी टीम के मेंबर हमेशा से गर्व के साथ अपनी मान्यताओं को बताने के लिए आजाद रहे हैं, और हमेशा रहेंगे।”

यहीं से मामला उलझता है अगर यह सिर्फ आउटडेटेड और अप्रासंगिक दस्तावेज था, तो फिर उसमें ऐसी लाइन लिखी ही क्यों गई जो कंपनी के मूल्यों के खिलाफ है? और अगर 17 फरवरी को इसे हटा दिया गया था, तो फरवरी 2026 की तारीख वाला वही दस्तावेज अब तक कैसे घूम रहा है?

सबसे बड़ा सवाल पारदर्शिता पर खड़ा होता है। लेंसकार्ट ने अब तक अपनी सही और अपडेटेड पॉलिसी सार्वजनिक क्यों नहीं की? जब विवाद इतना बड़ा हो चुका है, तो एक स्पष्ट दस्तावेज जारी कर देना सबसे आसान तरीका होता भरोसा बहाल करने का लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

जमीनी हकीकत भी बयान से मेल नहीं खाती। दिल्ली के स्टोर पर जब इसकी पुष्टि के लिए ऑपइंडिया पहुँचा तो वह बात चित में पता लगा की वही नियम कर्मचारियों पर लागू हैं। अगर यह सच है, तो यह सीधे-सीधे बंसल के दावे को चुनौती देता है कि बदलाव पहले ही हो चुका है।

सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि कथित पॉलिसी में हिजाब के लिए तो स्पष्ट गाइडलाइन दी गई है, जबकि हिंदू प्रतीकों जैसे कलावा या सिंदूर को या तो छिपाने या सीमित करने की बात कही गई। अगर ऐसा है, तो यह न्यूट्रल पॉलिसी नहीं बल्कि चयनात्मक व्यवहार का संकेत है।