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कलावा-बिंदी को ‘ना’, हिजाब को ‘हाँ’… लेंसकार्ट के नियमों को लेकर छिड़ा विवाद, जानें- कंपनी के स्टोर पर ऑपइंडिया को क्या पता चला

अगर एक सेल्समैन कलावा पहनकर या माथे पर छोटी बिंदी लगाकर काम कर रहा/रही है और इससे कंपनी के काम या ग्राहक अनुभव पर कोई असर नहीं पड़ रहा तो उसे रोकने का तर्क बेमानी हो जाता है।

महाराष्ट्र के नासिक में TCS कंपनी में हिंदू युवतियों के शोषण और धर्मांतरण की साजिशों के बीच सोशल मीडिया पर बड़ी-बड़ी कंपनियों के वर्क कल्चर को लेकर चर्चा हो रही है। इस बीच आईवियर रिटेल कंपनी लेंसकार्ट (Lenskart) के ‘हिंदू विरोधी नियमों’ को लेकर भी सोशल मीडिया पर विवाद छिड़ गया है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला लेंसकार्ट के कर्मियों को ट्रेनिंग के दौरान दिए जाने वाले परिचयात्मक दस्तावेज (Introductory Document) से जुड़ा हुआ है। इस दस्तावेज में ‘ग्रूमिंग और यूनिफॉर्म से जुड़े नियम’ बताए गए हैं। 23 पन्नों के इस डॉक्यूमेंट में लिखा गया है, “इसमें वे सभी ग्रूमिंग (साफ-सफाई और सलीके से तैयार रहने) से जुड़े नियम शामिल हैं जिन्हें लेंसकार्ट के सभी कर्मचारी फॉलो करते हैं।”

इसी परिचयात्मक दस्तावेज के कुछ पन्ने अब सोशल मीडिया पर वायरल हैं और इन पन्नों में ‘हिंदू विरोधी बातें’ कही गई हैं। डॉक्यूमेंट में 7 नंबर पेज पर लिखा गया है कि लेंसकार्ट के कर्मियों के लिए कलावा और बिंदी पहनाना मना है जबकि कर्मचारी हिजाब पहन सकते हैं।

इसमें लिखा गया है, “अगर आप हिजाब/पगड़ी पहनते हैं, तो उसका रंग काला होना चाहिए। हिजाब ऐसा होना चाहिए जो छाती तक मध्यम रूप से ढका रहे। रंग-बिरंगे पत्थरों वाली अंगूठियाँ (जैसे काला, नीला, हरा, लाल आदि) पहनने की अनुमति नहीं है। बिंदी और क्लचर भी पहनना मना है। साथ ही, धार्मिक धागे या कलाई में पहनने वाले बैंड को भी हटाना जरूरी है।”

लेंसकार्ट के परिचयात्मक दस्तावेज का पेज

इस डॉक्यूमेंट में जूते-कपड़े-घड़ी आदि चीजों को लेकर भी बताया गया है कि किस तरह की चीजें कर्मी पहनते हैं और किस तरह की नहीं। इसी दस्तावेज के एक और हिस्से को लेकर विवाद है। इसके पेज नंबर 10 पर सिंदूर लगाने को लेकर भी टिप्पणी की गई है। इसमें कहा गया है कि अगर कोई सिंदूर लगाता है तो उसे बहुत कम लगाना चाहिए और वह माथे पर फैलना नहीं चाहिए।

लेंसकार्ट के परिचयात्मक दस्तावेज का पेज

इसके अलावा लेंसकार्ट से जुड़े कुछ और डॉक्यूमेंट भी सामने आए हैं जिसमें इसी तरह की बातें कही गई हैं। लेखिका शेफाली वैद्य ने X पर ‘लेंसकार्ट स्टाइल गाइड’ (Lenskart style guide) की एक तस्वीर शेयर की है जिसमें बिंदी ना लगाने और हिजाब पहनने की बातें कही गई हैं।

शेफाली वैद्य ने अपने पोस्ट में लिखा, “पीयूष बंसल (लेंसकार्ट के फाउंडर) अपने कर्मचारियों से कहते हैं कि हिजाब ठीक है लेकिन बिंदी/तिलक/कलावा नहीं। लेंसकार्ट जैसी कंपनी, जो एक हिंदू बहुल भारत में काम करती है, जहाँ ज्यादातर कर्मचारी और ग्राहक हिंदू हैं, इस पर आप क्या कहेंगे?”

सोशल मीडिया पर फूटा लोगों का गुस्सा

जैसे ही सोशल मीडिया पर ये पेज सामने आए लोगों को गुस्सा फूट पड़ा। कई लोगों ने लेंसकार्ट को बॉयकाट करने का अभियान शुरू करने की वकालत की तो कई ने कहा कि वे अब कभी लेंसकार्ट से कोई सामान नहीं खरीदेंगे।

एक यूजर ने लिखा, “पीयूष बंसल ये क्या बेतुका नियम है? बिंदी, कलावा और सिंदूर से काम का माहौल कैसे खराब हो सकता है या यह कैसे भेदभाव पैदा करते हैं? इस तरह की पाबंदियाँ क्यों लगाई जा रही हैं? अब से लेंसकार्ट से कुछ नहीं खरीदेंगे।” एक अन्य ने लिखा, “मैं लेंसकार्ट से कभी चश्मा नहीं खरीदूँगा। अब हिजाब पहनने वाली महिलाएँ ही चश्मे खरीदें। कृपया कर्मचारियों को नमाज पढ़ने और रमजान में रोजा रखने का तरीका भी सिखा दो।”

हमें लेंसकार्ट के स्टोर पर क्या पता चला?

इस मामले पर लेंसकार्ट की प्रतिक्रिया जानने के लिए हमने HR विभाग की एक वरिष्ठ अधिकारी से बातचीत की लेकिन उन्होंने इस मामले पर कोई जवाब देने से इनकार कर दिया। इस मामले में लेंसकार्ट की प्रतिक्रिया के लिए हमने उन्हें ई-मेल भी भेजा है जिसका अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है और जवाब आने पर यह खबर अपडेट कर दी जाएगी।

इस बीच हम दिल्ली में लेंसकार्ट के एक स्टोर में पहुँचे और वहाँ काम करने वाले कर्मियों से इन वायरल खबरों पर उनकी प्रतिक्रिया और इस मामले की सच्चाई जाननी चाही। स्टोर पर काम करने वाले एक कर्मी ने हमें नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि यह डॉक्यूमेंट बिल्कुल सही है और हर कर्मी को इसमें दिए हुए नियमों और शर्तों का पालन करना होता है।

हमें स्टोर में लोगों को चश्मे दिखा रहे उस कर्मी से पूछा कि ‘क्या होगा अगर कोई कर्मी किसी दिन गलती से कलावा या कोई अन्य ऐसी चीज पहनकर आ जाए जिसकी इसमें मनाही हो’। उन्होंने हमें बताया कि ऐसा होने पर उस कर्मी को उस दिन के लिए बाहर जाने के लिए कह दिया जाता है और वो चाहे तो इन नियमों को मानकर काम करते रह सकता है।

कलावा, जिससे लोगों की धार्मिक आस्था जुड़ी है और उसे हटाना या काटना कई लोगों के लिए मुश्किल होता है। इसे लेकर जब हमने पूछा तो कर्मी ने हमें बताया कि अगर किसी को कलावा पहनना भी है तो वो उसे ‘स्लीव्स’ के भीतर छिपाकर पहन सकता है। यानी किसी भी अन्य व्यक्ति या ग्राहक को उसका कलावा नजर नहीं आना चाहिए।

लेंसकार्ट का एक स्टोर

जाहिर तौर पर कलावे-बिंदी जैसी चीजें लैब जैसे किसी महत्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्र में नियमों के चलते प्रतिबंधित हो सकती है लेकिन स्टोर पर काम करने वालों के लिए इससे कोई दिक्कत नहीं नजर आता है। लेंसकार्ट के उन कर्मी ने हमें बताया कि कलावा, बिंदी और सिंदूर को लेकर बनाए नियम तो सभी कर्मियों पर लागू हैं और लैब जैसी सेंसेटिव जगहों पर ये नियम और भी कड़े हैं। हालाँकि, उन्होंने इस बारे में विस्तार से कोई जानकारी हमें नहीं दी।

उनसे जब हमने पूछा कि ‘इस तरह के बाध्यकारी नियमों से काम करना मुश्किल होता है’ तो उन्होंने कहा कि कंपनी हमें इन नियमों के जरिए प्रोफेशनल बनाने की कोशिश कर रही है। हालाँकि, ‘कलावा पहनने से कोई अनप्रोफेशनल कैसे हो जाता है’ पूछे जाने पर उन्होंने चुप्पी साध ली।

स्टोर पर बैठे कर्मचारी के लिए कलावा-बिंदी पर रोक ‘धार्मिक हस्तक्षेप’!

इस पूरे मामले में एक सवाल जो खड़ा होता है वो ये कि अगर किसी लैब या मशीन वाले काम में कलावा, बिंदी या सिंदूर पर रोक लगाई जाती है तो उसे समझा जा सकता है। वहाँ सुरक्षा का सवाल होता है कलावा या उसका धागा मशीन में फँस सकता है, बिंदी या सिंदूर किसी महत्वपूर्ण मशीन या अन्य चीज में गिर सकता है जिससे काम प्रभावित हो सकता है।

लेकिन सवाल तब खड़ा होता है जब यही नियम एक सामान्य स्टोर या शोरूम में काम करने वाले कर्मचारी पर लागू किए जाते हैं। क्योंकि यहाँ उसका काम सिर्फ ग्राहकों से बात करना और सामान बेचना है। ऐसे माहौल में अगर किसी कर्मचारी को कहा जाए कि वह कलावा न पहने, बिंदी न लगाए या सिंदूर न लगाए तो यह सिर्फ ‘प्रोफेशनल लुक’ का मामला नहीं रह जाता बल्कि यह उसकी निजी और धार्मिक पहचान से जुड़ा मुद्दा बन जाता है।

भारत जैसे देश में जहाँ धर्म और संस्कृति रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं, वहाँ ये चीजें सिर्फ ‘सजावट’ नहीं होतीं बल्कि आस्था और पहचान का प्रतीक होती हैं। ऐसे में अगर इन्हें हटाने के लिए कहा जाए तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह नियम वास्तव में तटस्थ (Neutral) हैं या किसी खास पहचान को दबाने की कोशिश है।

अगर कोई नियम काम की जरूरत के कारण है (जैसे सुरक्षा) तो वह उचित माना जा सकता है। लेकिन अगर वही नियम बिना ठोस कारण के केवल ‘दिखावे’ या ‘इमेज’ के नाम पर लागू किया जाए तो मामला भेदभाव तक पहुँच जाता है। अगर एक सेल्समैन कलावा पहनकर या माथे पर छोटी बिंदी लगाकर काम कर रहा/रही है और इससे कंपनी के काम या ग्राहक अनुभव पर कोई असर नहीं पड़ रहा तो उसे रोकने का तर्क बेमानी हो जाता है।

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शिव
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