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₹80 करोड़ की लागत, 10 साल का समय और शिल्पकला का चमत्कार: क्या जानते हैं आप ‘गुरु भैरवैक्य मंदिर’ क्यों है खास, जिसका PM मोदी ने कर्नाटक जाकर किया उद्घाटन

आदिचुंचनगिरि मठ को एक सिद्ध पीठ के रूप में जाना जाता है, जहाँ वर्षों से साधकों ने तप कर आध्यात्मिक सिद्धियाँ प्राप्त की हैं। इस स्थान की पवित्रता और आध्यात्मिक ऊर्जा के कारण देशभर से श्रद्धालु यहाँ दर्शन और साधना के लिए आते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार (15 अप्रैल 2026) को कर्नाटक के मांड्या जिले स्थित आदिचुंचनगिरि में श्री गुरु भैरवैक्य मंदिर का उद्घाटन किया। यह आयोजन केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक ऐसी परंपरा को सम्मान देने का अवसर था, जिसने वर्षों तक समाज सेवा, शिक्षा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का कार्य किया है।

उद्घाटन के दौरान प्रधानमंत्री ने मंदिर में पूजा-अर्चना की और संत परंपरा को भारत की सांस्कृतिक शक्ति बताया। इस मौके पर उन्हें एक विशेष ‘मैसूर पगड़ी’ पहनाई गई, जिसने लोगों का खास ध्यान खींचा।

पगड़ी मैसूर के कलाकार नंदन सिंह ने पाँच दिनों में तैयार की थी, जो नलवाड़ी कृष्णराज वाडियार की पारंपरिक शैली से प्रेरित थी और बनारसी कपड़े से बनी थी। इसमें गंधभेरुंडा का पारंपरिक डिजाइन उकेरा गया था, जो कर्नाटक की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।

मंदिर की भव्यता और स्थापत्य कला की विशेषता

श्री गुरु भैरवैक्य मंदिर लगभग 80 करोड़ रुपए की लागत से तैयार हुआ है और इसे बनने में करीब दस वर्षों का समय लगा। यह मंदिर पारंपरिक द्रविड़ वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसकी भव्यता और बारीक नक्काशी इसे खास बनाती है।

मंदिर की संरचना में होयसला, चालुक्य, चोल और गंगा काल की स्थापत्य शैलियों का सुंदर समावेश किया गया है, जो भारतीय शिल्पकला की विविधता और समृद्धि को दर्शाता है। ऊँचे गोपुरम, विशाल प्रांगण और पत्थरों पर की गई जटिल नक्काशी इसे दक्षिण भारत के प्रमुख आध्यात्मिक स्थलों में शामिल करती है।

यह मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण है, जहाँ कला और आध्यात्मिकता का अद्भुत मेल देखने को मिलता है।

भैरवैक्य का अर्थ और शैव परंपरा से जुड़ाव

‘भैरवैक्य’ शब्द का अर्थ है भगवान भैरव में लीन होना या उनके साथ एकत्व प्राप्त करना। भगवान भैरव को भगवान शिव का गण और उनके उग्र स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। यह मंदिर उसी प्राचीन शैव परंपरा से जुड़ा हुआ है, जिसमें साधना, तपस्या और आत्मिक एकाग्रता के माध्यम से ईश्वर के साथ एकत्व प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है।

आदिचुंचनगिरि मठ को एक सिद्ध पीठ के रूप में जाना जाता है, जहाँ वर्षों से साधकों ने तप कर आध्यात्मिक सिद्धियाँ प्राप्त की हैं। इस स्थान की पवित्रता और आध्यात्मिक ऊर्जा के कारण देशभर से श्रद्धालु यहाँ दर्शन और साधना के लिए आते हैं।

डॉ बालगंगाधरनाथ महास्वामीजी: जीवन, संघर्ष और समाज सेवा

यह मंदिर आदिचुंचनगिरि महासंस्थान मठ के 71वें पीठाधिपति बालगंगाधरनाथ स्वामीजी की स्मृति में बनाया गया है। उनका जन्म 18 जनवरी 1945 को कर्नाटक में गंगाधरैया के रूप में हुआ था और वे कन्नड़ वोक्कालिगा समुदाय से संबंध रखते थे, जो एक कृषि प्रधान समाज माना जाता है।

बचपन से ही उनका झुकाव आध्यात्मिकता और अनुशासन की ओर था। कम उम्र में ही वे मठ से जुड़ गए और नाथ परंपरा में दीक्षित होकर गुरु-शिष्य परंपरा के तहत शिक्षा और साधना प्राप्त की। उन्होंने अपने जीवन में धर्म को केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे समाज सेवा से जोड़ा।

उनके नेतृत्व में मठ ने शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीबों की मदद के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए। उन्होंने कई स्कूल, कॉलेज और अस्पताल स्थापित किए, जिससे लाखों लोगों को लाभ मिला।

उनके कार्यों के लिए उन्हें 2010 में देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। 13 जनवरी 2013 को 64 वर्ष की आयु में किडनी फेलियर के कारण केंगेरी स्थित बीजीएस ग्लोबल अस्पताल में उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद भी उनके विचार और कार्य समाज को प्रेरित करते रहे हैं।

मठ की परंपरा, वर्तमान नेतृत्व और मंदिर का उद्देश्य

आदिचुंचनगिरि महासंस्थान मठ दक्षिण भारत का एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र है, जिसकी परंपरा सदियों पुरानी है। यह मठ नाथ संप्रदाय की गुरु-शिष्य परंपरा को आगे बढ़ाता रहा है और समाज में आध्यात्मिकता के साथ-साथ सेवा कार्यों के लिए भी जाना जाता है।

वर्तमान में इस मठ का नेतृत्व निर्मलानंदनाथ स्वामीजी कर रहे हैं। उनके मार्गदर्शन में इस भव्य मंदिर का निर्माण पूरा हुआ, जिसे उन्होंने अपने गुरु को समर्पित एक श्रद्धांजलि के रूप में विकसित किया। यह मंदिर किसी देवी-देवता को समर्पित नहीं, बल्कि एक महान संत की स्मृति में बनाया गया स्मारक है।

इसका उद्देश्य केवल धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोगों को सेवा, शिक्षा और मानवता के मूल्यों की ओर प्रेरित करना भी है।

आस्था, विरासत और प्रेरणा का केंद्र

श्री गुरु भैरवैक्य मंदिर आज आस्था, संस्कृति और सेवा का संगम बन चुका है। इसकी भव्यता, आध्यात्मिक महत्व और इसके पीछे छिपी सेवा की भावना इसे एक विशेष पहचान देती है। यह मंदिर न केवल श्रद्धालुओं के लिए एक पवित्र स्थल है, बल्कि उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है, जो समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का सपना देखते हैं।

यहाँ आकर केवल दर्शन ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और सेवा के मूल्यों को भी महसूस किया जा सकता है। यही कारण है कि यह मंदिर आने वाले समय में दक्षिण भारत के प्रमुख आध्यात्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों में अपनी खास जगह बनाएगा।

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सौम्या सिंह
सौम्या सिंह
ख़ुद को तराशने में मसरूफ़

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