अंतरराष्ट्रीय संबंधों और वैश्विक सुरक्षा के इतिहास में आज हम एक बहुत ही निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं। दशकों तक द्वितीय विश्व युद्ध (World War II) के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था का यह अटूट नियम माना जाता था कि जब भी दुनिया के किसी कोने में लड़ाई होगी या दो देशों के बीच भीषण हिंसा भड़केगी या कोई मानवीय संकट पैदा होगा, तो वहाँ कानून-व्यवस्था कायम करने के लिए संयुक्त राष्ट्र (UN) की नीली टोपी वाली सेना (UN Blue Helmets) ही भेजी जाएगी। लेकिन आज 21वीं सदी के तीसरे दशक में यह ढाँचा पूरी तरह से चरमराता हुआ दिखाई दे रहा है।
गाजा पट्टी में महीनों तक चले भीषण संघर्ष के बाद जब युद्ध के अंत और उसके बाद की सुरक्षा व्यवस्था (Post-War Security Setup) को लेकर विचार-विमर्श शुरू हुआ, तो संयुक्त राष्ट्र को लगभग दरकिनार कर दिया गया। गाजा में सुरक्षा व्यवस्था और पुनर्निर्माण की कमान अब अमेरिका की अगुवाई में एक विशेष प्रशासनिक संरचना (Special Administrative Structure) ‘बोर्ड ऑफ पीस‘ (Board of Peace) बनाई गई है, जो ‘अंतरराष्ट्रीय स्टेबलाइजेशन फोर्स’ (ISF – International Stabilization Force) के जरिए ये काम करेगी। हालाँकि UNSC के रिजोल्यूशन 2803 के जरिए इस इंटरनेशनल फोर्स को वैश्विक कानूनी वैधता प्रदान की गई है।
पारंपरिक रूप से ऐसे मामलों में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का रुख किया जाता था और यूएन पीसकीपिंग फोर्स भेजी जाती थी। लेकिन गाजा के मामले में स्थितियाँ बिल्कुल अलग हैं। जैसे-
इजरायल का अविश्वास: इजरायल लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र और उसकी एजेंसियों (जैसे UNRWA) पर पक्षपात का आरोप लगाता रहा है। वह अपनी सीमाओं के पास यूएन सेना की मौजूदगी को पर्याप्त सुरक्षा गारंटी नहीं मानता।
वीटो पावर की रुकावट: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका, रूस और चीन जैसी महाशक्तियों के बीच मतभेद के कारण किसी सर्वसम्मत यूएन मिशन पर सहमति बनना लगभग असंभव हो जाता है।
‘बोर्ड ऑफ पीस’ और बहुराष्ट्रीय बल: इसी गतिरोध के हल के रूप में अमेरिका और उसके सहयोगी अरब देशों के साथ मिलकर एक ऐसी व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं जहाँ एक नागरिक-सुरक्षा बोर्ड बनाया जाए। इसमें अमेरिका, मित्र अरब देश (जैसे मिस्र, यूएई, कतर) और कुछ अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ शामिल हों, जो गाजा में कानून-व्यवस्था, राहत सामग्री के वितरण और सुरक्षा की निगरानी करें।
यह स्पष्ट संकेत है कि जब यूएन किसी स्थिति में सर्वसम्मति नहीं बना पाता, तो क्षेत्रीय व वैश्विक शक्तियाँ अपना खुद का ‘थर्ड पार्टी’ ढाँचा तैयार कर लेती हैं और जरूरत के हिसाब से उसे UN का कानूनी ढाँचा भी पहना दिया जाता है।
बहरहाल, इन सबके बीच ये जानना अहम है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई में ये बोर्ड ऑफ पीस क्यों बनाया गया? इसकी जरूरत क्यों पड़ी? क्यों यहाँ पर सीधे UN ने हस्तक्षेप करने से कदम पीछे खींच लिए? क्या ऐसी व्यवस्थाएँ अतीत में हुई हैं और अगर हुई हैं तो कहाँ-कहाँ हुई हैं, ये भी जानना जरूरी हो जाता है। इस आर्टिकल में हम इस पूरे मुद्दे को विस्तार से समझेंगे।
बोर्ड ऑफ पीस के बारे में जानिए
दरअसल, गाजा पट्टी में इजरायल और हमास के बीच लंबे समय तक चले भीषण संघर्ष के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठकर आया कि युद्ध रुकने के बाद वहाँ सुरक्षा कौन संभालेगा? ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई में बोर्ड ऑफ पीस (Board of Peace – BoP) का गठन किया गया। यह एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जिसका मुख्य उद्देश्य दुनिया भर के संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों और खासकर गाजा पट्टी (Gaza Strip) में शांति बहाल करना, बुनियादी ढाँचे का पुनर्निर्माण करना और स्थिरता लाना है।

सितंबर 2025 में बोर्ड ऑफ पीस नाम के संगठन का प्रस्ताव रखा गया था। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UN Security Council Resolution 2803) ने गाजा शांति योजना की निगरानी और वहाँ सुरक्षा बल तैनात करने के लिए इस बोर्ड को अपनी स्वीकृति दी। और फिर 22 जनवरी 2026 को स्विट्जरलैंड के दावोस में ‘विश्व आर्थिक मंच’ (World Economic Forum) के दौरान 20 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों ने इसके संस्थापक चार्टर (Charter) पर हस्ताक्षर किए। इस समय अमेरिका के अलावा 27 देश इसके चार्टर पर हस्ताक्षर कर चुके हैं।
इसमें कौन-कौन से देश शामिल हैं?
बोर्ड ऑफ पीस में 27 से अधिक देश संस्थापक/पूर्ण सदस्य के रूप में जुड़े हैं, जिनमें शामिल हैं- अमेरिका, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, तुर्की, इजरायल, मिस्र, अर्जेंटीना, इंडोनेशिया, पाकिस्तान और कजाकिस्तान जैसे देश। स्थायी सदस्यता बनाए रखने के लिए सदस्य देशों से 1 अरब अमेरिकी डॉलर का योगदान देने की अपेक्षा रखी गई है, या फिर हर तीन साल में उनकी सदस्यता का रिन्युअल होगा।

इसका नेतृत्व और सांगठनिक ढाँचा कैसा है?
बोर्ड ऑफ पीस के चार्टर के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप को जीवनभर के लिए इसका अध्यक्ष (Chairman for life) नामित किया गया है। नए सदस्यों को आमंत्रित करने या संगठन के नियमों में बदलाव करने का सर्वाधिकार उनके पास है। इसका मुख्यालय वाशिंगटन डी.सी. (अमेरिका) में स्थित है। संगठन में नीतिगत और कूटनीतिक फैसले लेने के लिए एक एग्जीक्यूटिव बोर्ड बनाया गया है। इसमें पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, पूर्व संयुक्त राष्ट्र दूत निकोले म्लादेनोव, जेरेड कुश्नर और स्टीव विटकॉफ जैसे प्रमुख चेहरे शामिल हैं।
इस संगठन के मुख्य कार्य और इसकी जिम्मेदारियाँ क्या हैं?
युद्ध से प्रभावित गाजा इलाके का पुनर्निर्माण करना: इजरायल-हमास युद्ध के बाद गाजा को चलाने और स्थानीय सेवाओं को बहाल करने के लिए नेशनल कमेटी फॉर द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ गाजा (NCAG) का गठन किया गया है। NCAG में गैर-राजनीतिक और तकनीकी विशेषज्ञ (Technocrats) शामिल हैं, जो गाजा में रोजमर्रा के काम संभालते हैं। वहीं, बोर्ड ऑफ पीस NCAG के ऊपर मुख्य सुपरवाइजरी बॉडी (निगरानी संस्था) के रूप में काम करता है। बोर्ड ऑफ पीस के तहत नियुक्त हाई रिप्रेजेंटेटिव (जैसे निकोले म्लादेनोव) इस प्रशासनिक समिति के कामकाज को निर्देशित और नियंत्रित करते हैं। इसी के जरिए गाजा में इमारतों, सड़कों और बुनियादी सुविधाओं के पुनर्निमाण का काम किया जाएगा।
सुरक्षा और शांति स्थापना: गाजा में शांति बनाए रखने के लिए बोर्ड ऑफ पीस के पास सुरक्षा संबंधी कई अधिकार हैं। इसके तहत बोर्ड ऑफ पीस को गाजा में लगभग 20,000 सैनिकों का एक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बल यानी अंतरराष्ट्रीय शांति सेना (ISF) को तैनात करने का जिम्मा मिला है, जिसमें अल्बानिया, इंडोनेशिया, कजाकिस्तान, कोसोवो और मोरक्को जैसे देश सैनिक भेज रहे हैं।

इसके अलावा स्थानीय पुलिस को भी प्रशिक्षित किया जाएगा, जिसमें मिस्र और जोर्डन जैसे देश लगभग 12,000 गाजा पुलिस कर्मियों को प्रशिक्षित करने पर सहमत हुए हैं।
गाजा में हमास और अन्य सशस्त्र गुटों के सैन्य ढाँचे को पूरी तरह से समाप्त करना और हथियार आत्मसमर्पण कराना भी बोर्ड ऑफ पीस के प्रमुख लक्ष्यों में शामिल है। जिसमें अंतरराष्ट्रीय शांति सेना (ISF) मदद करेगी।

मानवीय सहायता पहुँचाने का जिम्मा: युद्ध में तबाह हुए गाजा के भौतिक और आर्थिक पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी भी इसी बोर्ड के पास है। इसके तहत गाजा के पुनर्निर्माण के लिए अरब देशों और अन्य सदस्य देशों से अरबों डॉलर की फंडिंग जुटाने की योजना बनाई गई है।
इस फंडिंग के जरिए बिजली, पानी, अस्पताल, स्कूल, सड़कें और आवासीय भवनों का नए सिरे से निर्माण किया जाएगा। इसके साथ ही गाजा के प्रभावित नागरिकों तक भोजन, दवाइयाँ और जरूरी सामान सुचारू रूप से पहुँचाने के लिए बॉर्डर क्रॉसिंग (जैसे रफाह बॉर्डर) एक्टिविटी को भी नियंत्रित करना इसका लक्ष्य है।
कम शब्दों में कहें तो बोर्ड ऑफ पीस गाजा में ‘निरीक्षक, सुरक्षा प्रदाता और फंड मैनेजर’ तीनों भूमिकाएँ एक साथ निभा रहा है। इसका उद्देश्य गाजा में राजनीतिक शून्यता (Governance Vacuum) को भरना, हमास के नियंत्रण को समाप्त करना और एक अंतरराष्ट्रीय मॉडल के तहत गाजा का पुनर्विकास करना है।
A Roadmap for Completing the Implementation of President Trump’s Comprehensive Peace Plan in Gaza + Explanatory Document: Key Elements of the Arrangement and the Meaning of Its Provisionshttps://t.co/lDdzDKMDFR
— Board of Peace (@BoardOfPeace) August 1, 2026
हालाँकि इससे जुड़े कई सवाल भी हैं, क्योंकि आलोचकों का मानना है कि संगठन की अधिकांश शक्तियाँ सिर्फ अध्यक्ष (डोनाल्ड ट्रंप) के पास केंद्रित हैं। वहीं, इस संगठन पर संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और महत्व को कम करने की कोशिश का भी आरोप है। इसके अलावा इस संगठन के फंड प्रबंधन और पारदर्शिता को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय मीडिया और विशेषज्ञों द्वारा सवाल उठाए गए हैं।
बोर्ड ऑफ पीस ने किया साफ, पीली रेखा से सबसे आखिर में पीछे हटेगा इजरायल
बोर्ड ऑफ पीस (Board of Peace) के ऑफिसियल एक्स हैंडल पर बताया गया है कि इजरायल के प्रधानमंत्री और अन्य अहम लोगों के बीच सोमवार (3 जुलाई 2026) को अहम बैठक हुई। इस बैठक में उच्च प्रतिनिधि निकोले म्लादेनोव और बोर्ड ऑफ पीस की टीम ने इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनकी टीम के साथ गंभीरता से चर्चा की, जिसके बाद उसके (बोर्ड ऑफ पीस) और मध्यस्थ देशों (अमेरिका, मिस्र, कतर और तुर्की) के प्रयासों से हमास और गाजा के सभी सशस्त्र समूहों के पूर्ण निशस्त्रीकरण (हथियार डालने) पर बड़ा समझौता हुई है।
इस बैठक के बाद साफ कर दिया गया है कि गाजा पट्टी में हथियारों को पूरी तरह खत्म करना और बंदूक के साये वाले शासन से हटाकर आम नागरिक प्रशासन की ओर बढ़ना ही इसका लक्ष्य है। इस लक्ष्य तक पहुँचना एक प्रक्रिया होगी और उस प्रक्रिया का पूरा ढाँचा काम के अगले चरण में तय किया जाएगा।
इसके साथ ही ये साफ कर दिया गया कि इजराइली सेना (IDF) की येलो लाइन के पार वापसी केवल तभी होगी जब हथियारों को हटाने की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी, जैसा कि हमास ने मध्यस्थों से वादा किया था। यह नियम छोटे हथियारों, भारी हथियारों और सुरंगों सभी पर समान रूप से लागू होता है।
As part of the process of decommissioning weapons in Gaza and enabling the transition to civilian governance, and creating a safer future in the region for both Israelis and Palestinians in Gaza, a meeting was held earlier today (Monday) between High Representative Nickolay…
— Board of Peace (@BoardOfPeace) August 3, 2026
इस पूरे समझौते को लागू करने की निगरानी ‘अंतरराष्ट्रीय स्टेबलाइजेशन फोर्स’ (ISF) और ‘इम्प्लीमेंटेशन वेरिफिकेशन कमेटी’ द्वारा की जाएगी, जिसमें अमेरिका और बोर्ड ऑफ पीस दोनों शामिल हैं। इसे पूरी तरह से लागू करने की दिशा में आगे की प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष सहमत हुए तंत्र के तहत अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करें।
क्यों पड़ी बोर्ड ऑफ पीस की जरूरत?
गाजा को लेकर चल रहे इस पूरे घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में एक पुरानी लेकिन बेहद गंभीर बहस को फिर से जिंदा कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या संयुक्त राष्ट्र की शांति सेनाओं (UN Peacekeeping Operations) का दौर अब हमेशा के लिए धीमा पड़ चुका है? गाजा से लेकर काकेशस के बर्फीले पहाड़ों तक, कैरिबियाई सागर के द्वीपों से लेकर अफ्रीका के जंगलों और मध्य पूर्व के तपते रेगिस्तानों तक, आज संयुक्त राष्ट्र की औपचारिक शांति सेनाओं के बजाय ‘थर्ड पार्टी Force’ (तीसरे पक्ष के सुरक्षा बल) या शक्तिशाली देशों की अगुवाई वाले बहुराष्ट्रीय गठबंधनों का दबदबा बढ़ता जा रहा है।

यह सिर्फ सैनिकों की अदला-बदली का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया के शक्ति-संतुलन (Power Dynamics), क्षेत्रीय प्रभुत्व, स्वायत्तता (Autonomy) और संप्रभुता के खेल का एक नया अध्याय है।
इसे समझने के लिए हमें उस मूलभूत तंत्र को देखना होगा जिसने लगभग सात दशकों तक दुनिया को संभाला। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत सुरक्षा परिषद (UN Security Council) को यह अधिकार दिया गया था कि वह वैश्विक शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए सदस्य देशों के सैनिकों को मिलाकर एक निष्पक्ष शांति सेना का गठन करे। इन शांति सैनिकों की मुख्य पहचान उनकी नीली टोपियाँ और निष्पक्षता का वादा हुआ करता था। लेकिन आज का कड़वा सच यह है कि संयुक्त राष्ट्र की यह निष्पक्षता और इसकी निर्णय लेने की क्षमता, महाशक्तियों की अपनी आपसी गुटबाजी और वीटो (Veto) पावर के अंधाधुंध इस्तेमाल की बलि चढ़ चुकी है।
दरअसल, जब भी दुनिया में कोई बड़ा संकट खड़ा होता है, तो सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस) आपस में ही उलझ जाते हैं। एक देश प्रस्ताव लाता है और दूसरा उस पर वीटो लगा देता है। इस राजनीतिक गतिरोध (Veto Gridlock) के कारण जब संकटग्रस्त क्षेत्रों में निर्दोष लोग मारे जा रहे होते हैं, तब यूएन का तंत्र कागजी प्रक्रियाओं और अंतहीन बहसों में फंसा रह जाता है। इसी लाचारी ने दुनिया के अलग-अलग देशों और क्षेत्रीय संगठनों को यूएन के बाहर जाकर अपने विकल्प ढूँढने के लिए मजबूर किया है।
गाजा पट्टी में बन रहा नया ढाँचा इस बात का साफ संदेश है कि जब वैश्विक संस्थान काम करने में नाकाम साबित होते हैं, तो क्षेत्रीय शक्तियाँ और वैश्विक महाशक्तियाँ अपना खुद का ‘थर्ड पार्टी’ तंत्र विकसित कर लेती हैं। यह मॉडल त्वरित फैसले लेने और कड़े कदम उठाने में बेहद सक्षम माना जा रहा है, हालाँकि इसके साथ ही इस पर यह आरोप भी लग रहे हैं कि यह अमेरिका और उसके करीबियों के कूटनीतिक और भू-राजनीतिक हितों को साधने का एक जरिया मात्र है। जैसा पहले भी होता रहा है।
रूस का ‘पीसकीपिंग’ मॉडल
गाजा में अमेरिका और उसके सहयोगियों की यह पहल कोई अनोखी या पहली घटना नहीं है। अगर हम वैश्विक नक्शे पर थोड़ा पूर्व की ओर नजर दौड़ाएँ और पूर्वोत्तर यूरोप तथा पूर्व सोवियत संघ (Post-Soviet Space) के देशों को देखें, तो रूस पिछले तीन दशकों से बिना किसी संयुक्त राष्ट्र जनादेश के अपना एक अलग ही ‘पीसकीपिंग’ मॉडल चला रहा है।
रूस का यह मॉडल सुरक्षा देने से ज्यादा उस इलाके पर अपना राजनीतिक और सैन्य दबदबा (Sphere of Influence) बनाए रखने का एक कारगर औजार रहा है। रूस जिन भी क्षेत्रों में अपनी शांति सेनाएँ भेजता है, वहाँ न तो यूएन का कोई नियंत्रण होता है और न ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय की सीधी दखलंदाजी। इन सभी मामलों में एक बात समान है वहाँ या तो दो देशों के बीच जमीन को लेकर पुराना विवाद है, या फिर किसी देश के भीतर का कोई हिस्सा खुद को आजाद घोषित करके स्वायत्तता (Autonomy) की माँग कर रहा है।

1-नागोर्नो-काराबाख (आर्मेनिया और अजरबैजान)
रूस के इस स्वतंत्र पीसकीपिंग मॉडल का सबसे प्रमुख उदाहरण नागोर्नो-काराबाख (Nagorno-Kara-bakh) का इलाका रहा है। यह क्षेत्र दक्षिण काकेशस के पहाड़ों में स्थित है और इसको लेकर दो पड़ोसी देशों आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच दशकों से खूनी जंग चलती आ रही है।
1990 के दशक में सोवियत संघ के पतन के बाद से ही यह क्षेत्र आर्मेनियाई मूल के लोगों के नियंत्रण में था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून के हिसाब से इसे अजरबैजान का हिस्सा माना जाता था। 2020 में जब दोनों देशों के बीच फिर से भीषण युद्ध भड़का, तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सिर्फ बयानबाजी करती रह गई। तब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने व्यक्तिगत रूप से दखल दिया और दोनों पक्षों को मेज पर लाकर एक युद्धविराम समझौते पर दस्तखत करवाए।
इस समझौते के तहत रूस ने बिना किसी यूएन मंजूरी के तुरंत अपने 2,000 से ज्यादा सशस्त्र सैनिकों और बख्तरबंद गाड़ियों को नागोर्नो-काराबाख में ‘शांति सैनिक’ बनाकर तैनात कर दिया। रूस ने आर्मेनिया और नागोर्नो-काराबाख को जोड़ने वाले लाचिन कॉरिडोर (Lachin Corridor) का पूरा नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। यह पूरी तरह से 2022 तक रूस का एकतरफा और क्षेत्रीय अभियान था, जहाँ रूसी सेना ही कानून, सुरक्षा और सीमा की अंतिम फैसलेदार बन गई। हालाँकि साल 2024 में अजरबैजान के इस पूरे इलाके पर कब्जे के बाद रूस ने अपनी सेना पूरी तरह से वापस बुला ली और इस पर पूरी तरह से अजरबैजानी सैनिकों का कब्जा हो गया। ये इलाका आधिकारिक तौर पर अजरबैजान का ही है।
2- ट्रांसनिस्ट्रिया (मॉल्डोवा)
इसी तरह का एक और दिलचस्प और उलझा हुआ मामला पूर्वी यूरोप के छोटे से देश मॉल्डोवा का है, जहाँ ‘ट्रांसनिस्ट्रिया’ (Transnistria) नाम का एक संकरा भूभाग स्थित है। मॉल्डोवा से अलग होकर अपनी आजादी का दावा करने वाला क्षेत्र ‘ट्रांसनिस्ट्रिया’ रूस समर्थक माना जाता है। यहाँ 1990 के दशक से ही रूस ने अपने ‘शांति सैनिक‘ तैनात कर रखे हैं।
दरअसल, 1990 के दशक की शुरुआत में जब मॉल्डोवा सोवियत संघ से अलग हुआ, तो डैन्यूब नदी के किनारे बसे ट्रांसनिस्ट्रिया क्षेत्र ने रूस के समर्थन से खुद को मॉल्डोवा से आजाद घोषित कर दिया। वहाँ एक छोटा सा सशस्त्र संघर्ष हुआ, जिसके बाद रूस ने तुरंत वहाँ अपने ‘शांति सैनिकों’ (Peacekeepers) की तैनाती कर दी। आज तीन दशक बीत जाने के बाद भी लगभग 1,500 रूसी सैनिक शांति बनाए रखने के नाम पर ट्रांसनिस्ट्रिया में डटे हुए हैं।
मॉल्डोवा की चुनी हुई सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे मॉल्डोवा की संप्रभुता (Sovereignty) पर सीधा कब्जा मानते हैं और बार-बार रूसी सैनिकों को हटाने की माँग करते रहे हैं। लेकिन रूस ‘थर्ड पार्टी फोर्स’ की आड़ में इस इलाके का इस्तेमाल मॉल्डोवा को पश्चिमी देशों और यूरोपीय संघ (EU) के करीब जाने से रोकने के लिए एक कूटनीतिक मोहरे के रूप में करता आ रहा है।
3- अबखाजिया और साउथ ओसेशिया (जॉर्जिया)
रूस के इस मॉडल का तीसरा बड़ा उदाहरण जॉर्जिया के दो क्षेत्रों अबखाजिया (Abkhazia) और साउथ ओसेशिया (South Ossetia) में देखने को मिलता है। 1990 के दशक के शुरुआती संघर्षों के बाद रूस ने खुद को इन दोनों अलगाववादी क्षेत्रों में शांति का मुख्य संरक्षक घोषित कर दिया था।
साल 2008 में जब जॉर्जिया की सरकार ने साउथ ओसेशिया पर फिर से अपना नियंत्रण कायम करने की कोशिश की, तो रूस ने अपने ‘शांति सैनिकों पर हमले’ को बहाना बनाकर जॉर्जिया पर हमला कर दिया और सिर्फ पाँच दिनों में जॉर्जियाई सेना को खदेड़ दिया। इसके तुरंत बाद रूस ने इन दोनों क्षेत्रों को स्वतंत्र देशों के रूप में मान्यता दे दी और वहाँ अपने स्थायी सैन्य अड्डे और सुरक्षा बल तैनात कर दिए।
इन तीनों ही मामलों से यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि रूस के लिए ‘शांति सेना’ का मतलब वैश्विक शांति नहीं, बल्कि अपने पड़ोस में अपनी सामरिक मौजूदगी को कानूनी और नैतिक जामा पहनाना है। हम इसमें क्रीमिया और यूक्रेन से जुड़ा मामला जोड़ सकते हैं, लेकिन वो सीधे युद्ध और कब्जे का मामला बन चुका है। हालाँकि क्रीमिया में रूसी हस्तक्षेप शांति स्थापना के नाम पर ही शुरू हुआ था।
दुनिया में अन्य प्रमुख ‘गैर-यूएन’ (Non-UN) सुरक्षा बल
दुनिया भर के नक्शे पर नजर डालें तो हमें यह समझ में आएगा कि संयुक्त राष्ट्र के बाहर सुरक्षा व्यवस्था चलाने का यह चलन सिर्फ अमेरिका या रूस तक ही सीमित नहीं है। दुनिया के हर महाद्वीप में संवेदनशील सुरक्षा क्षेत्रों में क्षेत्रीय संगठनों, विशेष गठबंधनों या बहुराष्ट्रीय टास्क फोर्स ने यूएन की जगह ले ली है।
नीचे दिए गए टेबल के आधार पर यह स्पष्ट समझा जा सकता है कि दुनिया के किन-किन हिस्सों में गैर-यूएन बल अपनी सेवाएँ दे रहे हैं और उनके पीछे कौन से संगठन या देश खड़े हैं-
सिनाई प्रायद्वीप में MFO की तैनाती
इनमें से सबसे पुराने और सफल गैर-यूएन मिशनों में से एक सिनाई प्रायद्वीप में स्थित MFO (Multinational Force and Observers) है। 1979 में जब अमेरिका के राष्ट्रपति जिमी कार्टर की मध्यस्थता में मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात और इजरायल के प्रधानमंत्री मेनाकेम बेगिन ने ऐतिहासिक ‘कैम्प डेविड समझौते’ पर दस्तखत किए, तो शर्त यह थी कि इजरायल सिनाई प्रायद्वीप से अपनी सेना हटा लेगा और वहाँ एक निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय बल तैनात किया जाएगा जो दोनों देशों के बीच सीमा पर नजर रखेगा।
शुरुआती योजना के अनुसार यह काम यूएन शांति सेना को सौंपा जाना था। लेकिन उस दौर में शीत युद्ध (Cold War) चरम पर था और सोवियत संघ ने यह साफ कर दिया कि वह सुरक्षा परिषद में ऐसे किसी भी प्रस्ताव पर वीटो लगा देगा जो अमेरिका की मध्यस्थता से हुए समझौते को मान्यता देता हो।
यूएन के इस राजनीतिक गतिरोध को देखते हुए अमेरिका, मिस्र और इजरायल ने एक अभूतपूर्व रास्ता निकाला। उन्होंने यूएन की लालफीताशाही से हटकर एक स्वतंत्र, गैर-यूएन अंतरराष्ट्रीय बल का गठन किया, जिसे MFO का नाम दिया गया। इसका मुख्यालय रोम में बनाया गया और इसकी कमान अमेरिकी नागरिक और सैन्य अधिकारियों को सौंपी गई।
आज भी चार दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद, सिनाई के रेगिस्तान में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस और न्यूजीलैंड जैसे दर्जनों देशों के सैनिक तैनात हैं। MFO ने बिना किसी यूएन हस्तक्षेप के मिस्र और इजरायल जैसी दो पारंपरिक विरोधी ताकतों के बीच शांति को आज तक सफलतापूर्वक बनाए रखा है, जो यह साबित करता है कि गैर-यूएन मॉडल बेहद प्रभावी हो सकते हैं।
कोसोवा में नाटो की तैनाती
दूसरा बड़ा उदाहरण यूरोप के बालकन क्षेत्र में स्थित कोसोवो का है। 1990 के दशक के अंत में जब सर्बिया की सेना और कोसोवो के अल्बानियाई मूल के अलगाववादियों के बीच भीषण जातीय हिंसा और नरसंहार शुरू हुआ, तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद रूस के रुख के कारण कोई सख्त फैसला नहीं ले सकी।
इसके जवाब में नाटो (NATO) ने यूएन की औपचारिक मंजूरी का इंतजार किए बिना सर्बियाई ठिकानों पर व्यापक हवाई हमले शुरू कर दिए। सर्बियाई सेना को पीछे हटने पर मजबूर करने के बाद नाटो ने जून 1999 में कोसोवो में अपनी शांति सेना तैनात कर दी, जिसे KFOR (Kosovo Force) के नाम से जाना जाता है।

हालाँकि बाद में यूएन ने इसे एक प्रस्ताव के जरिए काम करने की अनुमति दी, लेकिन KFOR की पूरी सैन्य कमान, रणनीति और सैनिकों की तैनाती पूरी तरह से नाटो के जनरलों के हाथ में रही है। KFOR आज भी कोसोवो में शांति बनाए रखने और सर्बिया के साथ उसकी विवादित सीमाओं पर तनाव को नियंत्रित करने का काम कर रही है।
कैरिबियाई देश हैती का अनोखा उदाहरण
कैरिबियाई देश हैती (Haiti) की स्थिति और भी ज्यादा अनोखी है। 2021 में हैती के राष्ट्रपति जोवेनेल मोइस की हत्या के बाद देश में पूरी तरह से अराजकता फैल गई। राजधानी पोर्ट-ओ-प्रिंस के 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से पर हिंसक आपराधिक गिरोहों (Gangs) का कब्जा हो गया और सरकार लगभग ढह गई।
हैती के अंतरिम नेतृत्व ने बार-बार अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद की गुहार लगाई। लेकिन अतीत में हैती में चलाए गए यूएन शांति अभियानों (MINUSTAH) का अनुभव बहुत खराब रहा था, जहाँ यूएन सैनिकों पर हैजा बीमारी फैलाने और मानवाधिकारों के उल्लंघन के गंभीर आरोप लगे थे। इस वजह से न तो यूएन एक और पारंपरिक शांति मिशन भेजना चाहता था और न ही कोई पश्चिमी देश अपने सैनिक भेजने को तैयार था।
ऐसी स्थिति में एक नया प्रयोग किया गया। सुरक्षा परिषद ने एक प्रस्ताव पारित करके एक ‘थर्ड पार्टी’ सुरक्षा मिशन को मंजूरी दी, लेकिन कमान खुद के हाथ में लेने के बजाय इसे केन्या की अगुवाई में एक बहुराष्ट्रीय सुरक्षा सहायता मिशन (MSS – Multinational Security Support Mission) का रूप दे दिया।
केन्या ने इस मिशन का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी उठाई और अपनी सशस्त्र पुलिस टुकड़ियों को हैती भेजा, जिसमें बहामास, जमैका, बारबाडोस और बांग्लादेश जैसे अन्य देशों ने भी अपने सुरक्षाकर्मी जोड़े। यह मॉडल दर्शाता है कि यूएन अब सीधे मोर्चे पर उतरने के बजाय क्षेत्रीय या इच्छुक देशों को ‘आउटसोर्स’ (Outsource) करके सुरक्षा अभियानों की कमान सौंप रहा है।

अफ्रीका में अफ्रीकी यूनियन ने उठाए गंभीर कदम, सोमालिया में कई देशों की फौज रही तैनात
अफ्रीका महाद्वीप में अफ्रीकी संघ (African Union – AU) ने अपनी सुरक्षा चिंताओं को खुद संभालने की दिशा में बड़े कदम उठाए हैं। सोमालिया में कट्टरपंथी इस्लामी आतंकी गुट अल-शबाब (Al-Shabaab) के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए यूएन सेना के बजाय अफ्रीकी संघ का मिशन ATMIS (African Union Transition Mission in Somalia) तैनात किया गया है। इसे UNSC ने रिजोल्यूशन 2767 के जरिए मान्यता दी है।

इस मिशन में युगांडा, केन्या, बुरुंडी, इथियोपिया और जिबूती जैसे अफ्रीकी पड़ोसी देशों के सैनिक शामिल हैं। अफ्रीकी देशों का मानना है कि बाहरी पश्चिमी या यूएन सैनिक स्थानीय भाषा, संस्कृति और भूगोल को नहीं समझते, इसलिए स्थानीय और क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान क्षेत्रीय ताकतों के पास ही होना चाहिए।
दुनिया भर में ‘थर्ड पार्टी Force’ और ‘मिक्स्ड Force’ की उपस्थिति पहले से
जब हम ‘थर्ड पार्टी Force’ की बात करते हैं, तो इसमें सिर्फ बहुराष्ट्रीय संगठन या रूस-अमेरिका जैसी महाशक्तियाँ ही शामिल नहीं हैं। आज दुनिया में ऐसे दर्जनों संवेदनशील इलाके हैं जहां ‘मिक्स्ड फोर्स’ (Mixed Forces) या ‘द्विपक्षीय/त्रिस्तरीय सुरक्षा बल’ (Bilateral & Tripartite Forces) तैनात हैं।
इसका मतलब यह है कि दो या तीन देश आपस में एक विशेष सुरक्षा समझौता करते हैं और किसी तीसरे देश के क्षेत्र में या अपनी साझी विवादित सीमाओं पर संयुक्त रूप से सेनाएँ या पुलिस तैनात कर देते हैं। इसमें यूएन का दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं होता।
दुनिया भर में इस प्रकार की ‘थर्ड पार्टी’ तथा ‘मिक्स्ड/द्विपक्षीय’ सैन्य तैनाती के कुछ मामलों के बारे में हम आपको बता रहे हैं।
सीरिया में ‘थर्ड पार्टी’ ताकत का खेल: US, रूस, तुर्की और ईरान का अखाड़ा
सीरिया का संकट इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि जब किसी देश में गृहयुद्ध भड़कता है और संयुक्त राष्ट्र (UN) मूकदर्शक बन जाता है, तो वहाँ ‘थर्ड पार्टी’ सैन्य शक्तियाँ किस तरह अपना कब्जा और वर्चस्व कायम कर लेती हैं।
दिसंबर 2024 में बशर अल-असद के दशकों पुराने शासन के पतन के बाद सीरिया एक बड़े ऐतिहासिक बदलाव से गुजरा है। असद के जाने के बाद अहमद अल-शरा (पूर्व एचटीएस प्रमुख) के नेतृत्व में एक संक्रमणकालीन सरकार (Transitional Government) का गठन तो हुआ, लेकिन सीरिया में शांति अभी भी बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ी है।
आज सीरिया की स्थिति 3 मुख्य मोर्चों पर बंटी हुई है-
सत्ता और अन्य विरोधी गुटों में टकराव: नए संक्रमणकालीन प्रशासन ने सीरियाई सेना में विद्रोही गुटों को विलय करने का प्रयास किया है, लेकिन कुर्द-नेतृत्व वाली ‘सीरियाई डेमोक्रेटिक फोर्सेस’ (SDF) और दमिश्क सरकार के बीच अक्सर हिंसक झड़पें और स्वायत्तता की लड़ाई जारी है।
- सीरिया में असद शासन के पतन के बाद भी रूस के पास ‘हमीमिम’ एयरबेस और ‘तारतूस’ नौसैनिक अड्डे की रणनीतिक मौजूदगी का आधार है, जिन्हें वह अपने भू-राजनीतिक हितों के लिए खाली नहीं करना चाहता। वहीं सीरिया की असद सरकार के गिरने के बाद से यहाँ ईरान को बहुत बड़ा झटका लगा और उसे लगातार बैकफुट पर आना पड़ा।
- इसी तरह से तुर्की भी है। पूर्वोत्तर सीरिया में अमेरिका और उत्तर में तुर्की की सेनाएँ अपने-अपने ‘थर्ड पार्टी’ सुरक्षा हितों और आतंकवाद-विरोधी अभियानों के नाम पर लगातार सक्रिय हैं। इसमें उत्तर-पश्चिम सीरिया (इदलिब और उत्तरी अलेप्पो) में तुर्की की सेना ने अपने सुरक्षा क्षेत्र (Safe Zone) बनाए हुए हैं। यहाँ तुर्की की सेना ने स्थानीय ‘सीरियन नेशनल आर्मी’ (SNA) के साथ मिलकर एक मिक्स्ड पुलिसिंग और सैन्य ढाँचा तैयार किया है ताकि कुर्द लड़ाकों को अपनी सीमाओं से दूर रखा जा सके और सीरियाई शरणार्थियों को वापस बसाया जा सके।
- वहीं, उत्तर-पूर्वी सीरिया के तेल समृद्ध इलाकों और अल-तन्फ (Al-Tanf) बेस पर लगभग 900 से अधिक अमेरिकी सैनिक तैनात रहे हैं। ये सैनिक सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेस (SDF – जो मुख्य रूप से कुर्द लड़ाके हैं) के साथ मिलकर ‘मिक्स्ड फोर्स‘ के रूप में ISIS के खिलाफ अभियान चलाते रहे हैं और सीरियाई सरकार के प्रभाव को रोकते हैं। हालाँकि अब अमेरिका ने अपनी उपस्थिति सीमित की है, तो कुर्दों को भी तुर्की के हाथों मरने के लिए छोड़ दिया है। यहाँ अमेरिकी ढाँचा विफल नजर आ रहा है, क्योंकि सीरिया में पूर्व आतंकी ही आज राष्ट्रप्रमुख की हैसियत में है।
हालाँकि सीरिया में शासन बदलने के बावजूद अलवी, द्रूज और ईसाई अल्पसंख्यकों के खिलाफ सांप्रदायिक हिंसा घटी नहीं है। वहीं आईएसआईएस (ISIS) के स्लीपर सेल अभी भी छिटपुट हमलों की फिराक में रहते हैं।
सीरिया आज किसी पारंपरिक यूएन मिशन के तहत शांत नहीं हो रहा है, बल्कि यह तुर्की, रूस, अमेरिका और स्थानीय स्वायत्त गुटों की शक्ति-संतुलन (Power Dynamics) पर टिका हुआ है। यह दिखाता है कि एक बार जब यूएन निष्प्रभावी हो जाता है, तो किसी देश की स्वायत्तता और सुरक्षा पर ‘थर्ड पार्टी फोर्स’ ही हावी हो जाती हैं।
कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC): SAMIDRC और EACRF का क्षेत्रीय मिक्स्ड फोर्स मॉडल
पूर्वी कांगो (DR Congo) दशकों से दर्जनों विद्रोही गुटों (जैसे M23) की हिंसा से जूझ रहा है। यहाँ यूएन का सबसे बड़ा और महंगा शांति मिशन MONUSCO दशकों से तैनात था, लेकिन स्थानीय जनता और सरकार यूएन की नाकामी से बेहद नाराज हो गई। इसके परिणामस्वरूप यूएन को हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई और उसकी जगह क्षेत्रीय ‘मिक्स्ड फोर्स’ तैनात की गईं-
- SAMIDRC (SADC Mission in the DRC): दक्षिणी अफ्रीकी विकास समुदाय (SADC) के देशों दक्षिण अफ्रीका, तंजानिया और मलावी ने मिलकर पूर्वी कांगो में अपनी एक सशक्त ‘मिक्स्ड कॉम्बैट फोर्स’ भेजी है, जो सीधे विद्रोहियों के खिलाफ आक्रामक सैन्य कार्रवाई करती है।
- EACRF (East African Community Regional Force): इससे पहले पूर्वी अफ्रीकी समुदाय (केन्या, युगांडा, बुरुंडी, दक्षिण सूडान) के सैनिकों को मिलाकर एक क्षेत्रीय मिक्स्ड बल बनाया गया था जिसने कांगो के हिंसाग्रस्त इलाकों में गश्त और सुरक्षा की कमान संभाली थी।

मोजाम्बिक (काबो डेलगाडो)
- कांगो की तरह ही मोजांबिक में SAMIM और रवांडा की द्विपक्षीय ‘थर्ड पार्टी Force’ की मौजूदगी बनी हुई है दरअसल, मोजाम्बिक के उत्तरी प्रांत काबो डेलगाडो (Cabo Delgado) में जब ISIS से जुड़े आतंकवादी गुटों ने कब्जा कर लिया और प्राकृतिक गैस परियोजनाओं को ठप कर दिया, तो मोजाम्बिक सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के पास जाने के बजाय द्विपक्षीय और क्षेत्रीय मदद माँगी। इसमें-
- रवांडा सुरक्षा बल (RDF – Rwanda Defence Force): मोजाम्बिक और रवांडा की सरकारों के बीच एक सीधा द्विपक्षीय समझौता हुआ। रवांडा ने अपने 2,000 से अधिक उच्च प्रशिक्षित सैनिकों और पुलिसकर्मियों को काबो डेलगाडो भेजा। रवांडा की सेना और मोजाम्बिक की सेना ने एक ‘मिक्स्ड फोर्स’ के रूप में काम करते हुए कुछ ही महीनों में आतंकियों को प्रमुख शहरों से खदेड़ दिया।
- SAMIM (SADC Mission in Mozambique): इसके साथ ही दक्षिणी अफ्रीकी देशों के गठबंधन ने अपनी संयुक्त सेना भी वहाँ भेजी। इस मॉडल को वैश्विक कूटनीति में अत्यंत सफल द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग (Bilateral Security Intervention) माना जाता है।
साहेल क्षेत्र (पश्चिम अफ्रीका): गफाइव साहेल (G5 Sahel) और बहुराष्ट्रीय टास्क फोर्स
पश्चिम अफ्रीका के सहारा मरुस्थल से सटे साहेल क्षेत्र (माली, नाइजर, बुर्किना फासो, चाड) में जिहादी आतंकवाद से निपटने के लिए विभिन्न प्रकार की मिक्स्ड और थर्ड पार्टी फोर्सेज तैनात रही हैं-
MNJTF (Multinational Joint Task Force): नाइजीरिया, चाड, कैमरून, नाइजर और बेनिन देशों ने मिलकर लेक चाड बेसिन (Lake Chad Basin) में ‘बोको हरम’ और ‘ISWAP‘ के खिलाफ एक बहुराष्ट्रीय संयुक्त बल (MNJTF) का गठन किया है। इसमें पाँचों देशों के सैनिक और कमांडर एक ही एकीकृत कमान के तहत काम करते हैं और सीमाओं के पार जाकर आतंकवादियों का पीछा करते हैं।
ऑपरेशन बरखाने और टाकुबा टास्क फोर्स (पूर्व में): फ्रांस ने इस इलाके में अपने हजारों सैनिक तैनात किए थे और यूरोपीय देशों (स्वीडन, एस्टोनिया, चेक गणराज्य) की विशेष सेनाओं के साथ मिलकर एक ‘मिक्स्ड यूरोपियन फोर्स’ (Takuba Task Force) बनाई थी। हालाँकिसैन्य तख्तापलटों के बाद रूस के समर्थन वाली फ्रांस विरोधी तख्तापलट सरकारों ने फ्रांसीसी बलों को निकालकर रूसी वैगनर (अब अफ्रीका कोर) को थर्ड पार्टी फोर्स के रूप में आमंत्रित किया है।
सोलोमन द्वीप और दक्षिण प्रशांत: ऑस्ट्रेलिया और चीन की द्विपक्षीय तैनाती
दक्षिण प्रशांत महासागर के छोटे से द्वीप देश सोलोमन आइलैंड्स (Solomon Islands) में जब 2021 में भीषण दंगे और राजनीतिक अस्थिरता भड़की, तो सुरक्षा के लिए द्विपक्षीय ‘थर्ड पार्टी फोर्स’ की मदद ली गई-
SIAF (Solomon International Assistance Force): ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फिजी और पापुआ न्यू गिनी की पुलिस और सेनाओं ने मिलकर एक त्वरित प्रतिक्रिया बल सोलोमन द्वीप भेजा जिसने वहाँ की सड़कों पर व्यवस्था कायम की।
चीन-सोलोमन द्वीप सुरक्षा समझौता: इसके तुरंत बाद सोलोमन द्वीप की सरकार ने चीन के साथ एक द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते पर दस्तखत किए, जिसके तहत चीनी पुलिस और सुरक्षा बल वहां की पुलिस को प्रशिक्षण देने और आवश्यकता पड़ने पर देश में सुरक्षा व्यवस्था संभालने के लिए तैनात किए गए हैं। यह प्रशांत क्षेत्र में महाशक्ति स्पर्धा का एक नया मिक्स्ड/थर्ड पार्टी मॉडल है। हालाँकि अब सोलोमन के भीतर चीन के साथ हुई इस व्यवस्था का विरोध भी शुरू हो गया है।

जिबूती: दुनिया का सबसे बड़ा ‘मिक्स्ड फॉरेन मिलिट्री हब’
लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के मुहाने पर स्थित अफ्रीका का छोटा सा देश जिबूती (Djibouti) दुनिया का सबसे अनोखा सुरक्षा केंद्र है। जिबूती में कोई संयुक्त राष्ट्र बल नहीं है, लेकिन यहाँ दुनिया की सबसे प्रतिद्वंद्वी महाशक्तियों के सैन्य अड्डे एक-दूसरे से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं-
अमेरिका (Camp Lemonnier): अफ्रीका में अमेरिका का एकमात्र स्थायी सैन्य अड्डा, जहाँ हजारों अमेरिकी सैनिक और ड्रोन तैनात हैं।
चीन (PLA Support Base): चीन का विदेश में पहला और सबसे बड़ा नौसैन्य अड्डा।
इसके अलावा फ्रांस, जापान और इटली जैसे देशों के भी अपने-अपने स्वतंत्र सैन्य अड्डे जिबूती में मौजूद हैं।
यह पूरा देश एक प्रकार से अंतरराष्ट्रीय बहु-पक्षीय ‘थर्ड पार्टी सैन्य केंद्र‘ के रूप में काम करता है, जहाँ से ये सभी देश हिंद महासागर और लाल सागर में समुद्री लुटेरों, आतंकवाद और व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा की निगरानी करते हैं।
संयुक्त राष्ट्र पीसकीपिंग का पतन और ‘थर्ड पार्टी Force’ के उभार की 5 बड़ी वजहें
आखिर ऐसा क्या हुआ कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाया गया संयुक्त राष्ट्र का बहुपक्षीय शांति ढाँचा आज इतना कमजोर पड़ गया है और दुनिया भर के देश गैर-यूएन, क्षेत्रीय या द्विपक्षीय ‘थर्ड पार्टी फोर्सेज’ का रुख करने के लिए मजबूर हो रहे हैं? इसके पीछे 5 कड़वे और व्यावहारिक कारण हैं-
1- सुरक्षा परिषद की राजनीतिक लाचारी (Veto Gridlock & Polarization)
संयुक्त राष्ट्र का पूरा ढाँचा इस बात पर टिका था कि सुरक्षा परिषद के पाँचों स्थायी सदस्य (P5) दुनिया के बड़े संकटों पर एकमत होंगे। लेकिन आज का दौर एक नए शीत युद्ध (New Cold War) का दौर है। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस एक तरफ हैं, जबकि रूस और चीन दूसरी तरफ।
यूक्रेन युद्ध, सीरिया संकट, इजरायल-गाजा संघर्ष या नागोर्नो-काराबाख जैसे मामलों में सुरक्षा परिषद पूरी तरह से लकवाग्रस्त (Paralyzed) हो चुकी है।
जब भी कोई देश शांति सेना भेजने का प्रस्ताव लाता है, दूसरी महाशक्ति तुरंत अपने वीटो का इस्तेमाल कर देती है।
परिणाम स्वरूप पीड़ित देशों या क्षेत्रीय शक्तियों के पास यूएन के बाहर जाकर ‘थर्ड पार्टी गठबंधन’ या द्विपक्षीय मिक्स्ड फोर्स बनाने के अलावा कोई चारा नहीं बचता।
2- ‘पीसकीपिंग’ बनाम ‘पीस एनफोर्समेंट’ की वैधानिक सीमाएँ
संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अध्याय 6 (Chapter VI) के तहत भेजी जाने वाली पारंपरिक यूएन शांति सेनाओं के नियम बहुत सख्त और सीमित होते हैं।
आत्मरक्षा का नियम: यूएन शांति सैनिक केवल तभी गोली चला सकते हैं जब उन पर सीधा हमला हो। वे किसी युद्ध को रोकने, हमलावरों को खत्म करने या जबरन शांति स्थापित करने (Peace Enforcement) के लिए ताकत का इस्तेमाल नहीं कर सकते।
गाजा या हैती जैसे हालात: गाजा या हैती जैसी जगहों पर, जहाँ कोई शांति समझौता लागू ही नहीं है और हथियारबंद आतंकवादी या आपराधिक गिरोह खुलेआम सड़कों पर घूम रहे हैं, वहाँ यूएन के नीली टोपी वाले सैनिक पूरी तरह से अप्रभावी साबित होते हैं।
ऐसी जगहों पर ऐसी ‘थर्ड पार्टी Forces’ की जरूरत होती है जो बिना किसी हिचकिचाहट के आक्रामक सैन्य कार्रवाई कर सकें और कानून तोड़ने वालों का खात्मा कर सकें।
3- यूएन मिशनों की धीमी, नौकरशाही और जटिल प्रक्रिया
संयुक्त राष्ट्र का नौकरशाही ढाँचा दुनिया भर में अपनी सुस्ती के लिए जाना जाता है। जब दुनिया के किसी हिस्से में कोई नया संकट खड़ा होता है, तो यूएन सुरक्षा परिषद में बहस होने, प्रस्ताव पास होने, बजट मंजूर होने और फिर 193 सदस्य देशों से सैनिकों की माँग करके उन्हें तैयार करने और तैनात करने में अक्सर 6 महीने से लेकर 2 साल तक का समय लग जाता है।
इतनी देर में संकटग्रस्त इलाके में हजारों निर्दोष लोग मारे जाते हैं या पूरा देश तबाह हो जाता है।
इसके विपरीत, नाटो, अफ्रीकी संघ, रूस या अमेरिकी अगुवाई वाले क्षेत्रीय बल या द्विपक्षीय मिक्स्ड फोर्सेज महज कुछ दिनों या हफ्तों के भीतर अपनी पूरी सैन्य टुकड़ियों को युद्ध क्षेत्र में उतारने में सक्षम होते हैं।
4- संप्रभुता का हनन, कब्जा और भू-राजनीतिक हित (Sphere of Influence)
कई मामलों में शक्तिशाली देश जानबूझकर संयुक्त राष्ट्र को किसी क्षेत्र से बाहर रखते हैं ताकि वे उस इलाके पर अपना एकतरफा कूटनीतिक, रणनीतिक और सैन्य प्रभाव बनाए रख सकें।
रूस का पूर्व-सोवियत देशों (जैसे मॉल्डोवा, जॉर्जिया, आर्मेनिया) में अपनी शांति सेनाएं तैनात करना इसी रणनीति का हिस्सा है ताकि इन देशों को पश्चिमी सैन्य गठबंधन नाटो या यूरोपीय संघ में शामिल होने से रोका जा सके।
इसी तरह अमेरिका भी मध्य पूर्व के तेल समृद्ध क्षेत्रों और रणनीतिक समुद्री मार्गों पर अपना दबदबा बनाए रखने के लिए यूएन के बजाय अपनी अगुवाई वाले स्वतंत्र गठबंधनों (जैसे MFO या बहुराष्ट्रीय टास्क फोर्स) को प्राथमिकता देता है।
‘थर्ड पार्टी Force’ की तैनाती महाशक्तियों को उस क्षेत्र के राजनीतिक भविष्य को अपने हिसाब से मोड़ने का अधिकार देती है।
मेजबान देशों का यूएन पर से टूटता भरोसा और बदनामी
अतीत के कई यूएन शांति मिशनों के खराब रिकॉर्ड ने भी उनकी साख को भारी नुकसान पहुँचाया है।
रवांडा नरसंहार (1994): यूएन शांति सैनिक वहाँ मौजूद थे, फिर भी उनकी आँखों के सामने 8 लाख से ज्यादा लोग मार दिए गए क्योंकि उनके पास हथियार चलाने का आदेश नहीं था।
स्रेब्रेनित्सा नरसंहार (1995): बोस्निया में यूएन द्वारा घोषित ‘सुरक्षित क्षेत्र’ में डच यूएन सैनिकों के सामने हजारों बोस्नियाई मुस्लिमों का कत्लेआम कर दिया गया।
हैती में हैजा महामारी: यूएन शांति सैनिकों की लापरवाही के कारण हैती में हैजा फैल गया जिससे 10,000 से ज्यादा स्थानीय लोग मारे गए।
इन्हीं खराब अनुभवों के कारण आज कांगो, माली, सूडान और हैती जैसे देशों की सरकारें और जनता यूएन मिशनों को अपने देश से बाहर निकाल रही हैं और उनकी जगह रवांडा, केन्या या अन्य क्षेत्रीय देशों की मिक्स्ड सुरक्षा ताकतों पर भरोसा जता रही हैं।
क्या बदल रहा है दुनिया का सुरक्षा ढाँचा?
गाजा में अमेरिका की ‘बोर्ड ऑफ पीस’ पहल हो, काकेशस और पूर्वी यूरोप में रूस की एकतरफा सैन्य उपस्थिति हो, या अफ्रीका और प्रशांत महासागर के द्वीपों में क्षेत्रीय मिक्स्ड बलों का उभार हो यह सब इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि वैश्विक सुरक्षा का ताना-बाना अब पूरी तरह से ‘बहुध्रुवीय’ (Multipolar) और व्यावहारिक (Pragmatic) होता जा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र अब दुनिया का एकमात्र ‘ग्लोबल दरोगा’ नहीं रहा। बल्कि क्षेत्रीय ताकतों का उभार हुआ है। ऐसे में क्षेत्रीय संगठन (जैसे नाटो, अफ्रीकी संघ, CSTO) और शक्तिशाली देश अपने-अपने क्षेत्रों में ‘थर्ड पार्टी फोर्स’ के जरिए नियंत्रण स्थापित कर रहे हैं।
ये तरह की चुनौती भी और समाधान भी। क्योंकि जहाँ एक तरफ थर्ड पार्टी फोर्स त्वरित कार्रवाई करने में सक्षम होती हैं, वहीं दूसरी तरफ इनमें निष्पक्षता की कमी हो सकती है, क्योंकि इन बलों के पीछे अक्सर नेतृत्व करने वाले देश के अपने राजनीतिक व कूटनीतिक हित छुपे होते हैं।
गाजा की स्थिति आज पूरी दुनिया के सामने एक नया नजीर पेश कर रही है। अगर ‘बोर्ड ऑफ पीस’ या अमेरिका के नेतृत्व वाली बहुराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था गाजा में सफल होती है, तो यह भविष्य के अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने के लिए यूएन के बजाय ‘थर्ड पार्टी कोऑलिशन’ के मॉडल को और अधिक मजबूती देगा।
UNSC में बदलाव की बेहद जरूरत, सदस्यों की संख्या बढ़े और वीटो सिस्टम हटे
बहरहाल, इन घटनाक्रमों के बीच सबसे ज्यादा जरूरत फिलहाल संयुक्त राष्ट्र के ढाँचे खासकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बदलाव लाने की है। आज UNSC की स्थाई सीटों में बढ़ोतरी कर भारत, अफ्रीकन यूनियन और लातिन अमेरिकी देशों को भी जगह मिलनी चाहिए, जिसके लिए भारत लगातार कोशिश भी कर रहा है। भारत की दावेदारी को भारी बहुमत से समर्थन भी मिल रहा है, लेकिन वीटो पॉवर के दम पर इसमें लगातार अडंगा लगाया जा रहा है। ऐसे में UNSC के वीटो पॉवर वाले हिस्से पर भी फिर से बहस की जरूरत है।
इन सबसे एक अच्छा तरीका तो यही लगता है कि वीटो पॉवर वाले सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए और किसी भी प्रस्ताव के पास होने के लिए 2 तिहाई या 3 चौथाई जैसे कड़े बहुमत की व्यवस्था की जाए। वर्ना धीरे-धीरे UNSC सिर्फ थर्ड पार्टी फोर्स के लिए कानूनी रास्ते बनाने तक ही जाएगा, जिसकी दुनिया में वैसे भी कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि ये काम सिर्फ रबर स्टैंप के तौर पर हो रहा है। वैसे भी ताकतवर देश अपने फायदे लिए संयुक्त राष्ट्र की अनदेखी कर ही रहे हैं।


