उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर 13 साल पुराना एक बड़ा विवाद चर्चा में आ गया है। यह वही मामला है, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार ने आतंकवाद के आरोपितों के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की थी। अब योगी सरकार में मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर ने इस पुराने मुद्दे को दोबारा उठाकर समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोला है।
ओमप्रकाश राजभर ने शनिवार (6 जून 2026) को सोशल मीडिया पर 6 जून 2013 की एक पुरानी खबर का स्क्रीनशॉट शेयर किया। यह खबर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच द्वारा आतंकवाद के आरोपितों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने के फैसले को लेकर अखिलेश सरकार से कड़े सवाल पूछे जाने से जुड़ी थी।
राजभर ने मामले का जिक्र करते हुए लिखा, “पढ़ लीजिएगा। कम से कम आपको अपने पाप याद आ जाएँगे। फिर जब आप 2027 में चुनाव हारेंगे तो EVM और SIR को दोष नहीं दे पाएँगे।”
सुप्रभात @yadavakhilesh जी, कैसे हैं?
— Om Prakash Rajbhar (@oprajbhar) June 6, 2026
उम्मीद ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि हमेशा की तरह आप बेखबर, मस्त और बिना काम के व्यस्त होंगे।
खैर कोई बात नहीं। ऐसे ही रहिए।
आज 6 जून है, सोचा आपको याद दिला दूं। आज ही के दिन 2013 में आपकी सरकार को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक प्रश्न… pic.twitter.com/T8gu4GzK7p
क्या था पूरा मामला?
साल 2012 में समाजवादी पार्टी पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता में आई थी और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने थे। विधानसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी ने वादा किया था कि आतंकवाद के मामलों में फँसाए गए मुस्लिम युवकों के मामलों की समीक्षा कराई जाएगी। पार्टी का कहना था कि कई युवकों को गलत तरीके से फँसाया गया है और उनकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।
सरकार बनने के बाद इसी वादे को पूरा करने की दिशा में काम शुरू हुआ। वर्ष 2013 में अखिलेश सरकार ने वर्ष 2007 के लखनऊ, फैजाबाद और वाराणसी सीरियल ब्लास्ट मामलों से जुड़े आरोपितों के खिलाफ चल रहे मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की। इन धमाकों में कई लोगों की जान गई थी जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे। जैसे ही सरकार के इस फैसले की जानकारी सामने आई तो इसे लेकर राजनीतिक और कानूनी विवाद शुरू हो गया।
विपक्षी दलों ने सरकार पर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया। वहीं इस फैसले को अदालत में भी चुनौती दी गई।
हाई कोर्ट ने क्यों उठाए सवाल?
मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच पहुँचा। 6 जून 2013 को सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने अखिलेश सरकार के फैसले पर गंभीर सवाल खड़े किए। अदालत ने पूछा कि आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों में मुकदमे वापस लेने का आधार क्या है? कोर्ट ने सरकार से उन आरोपितों की सूची भी माँगी, जिनके खिलाफ मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की गई थी।
इसके साथ ही हाई कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या इस तरह के मामलों में केंद्र सरकार से जरूरी अनुमति ली गई है। अदालत ने साफ कहा कि आतंकवाद से जुड़े मामलों को सामान्य आपराधिक मामलों की तरह नहीं देखा जा सकता क्योंकि इनका असर केवल किसी एक व्यक्ति पर नहीं बल्कि पूरे समाज और राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है।
बाद में दिसंबर 2013 में हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और देश के खिलाफ युद्ध जैसे गंभीर मामलों में अभियोजन वापस लेने के लिए केंद्र सरकार की सहमति आवश्यक होती है। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में मुकदमे वापस लेने के लिए असाधारण और मजबूत कारण होने चाहिए।
‘कल आतंकियों को पद्म भूषण भी दे देंगे?’
इस मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट की कुछ टिप्पणियाँ काफी चर्चा में रही थीं। अदालत ने सरकार के रुख पर नाराजगी जताते हुए तीखी टिप्पणी की थी कि ‘आज आप आतंकवाद के आरोपितों के मुकदमे वापस ले रहे हैं, कल क्या इन्हें पद्म भूषण भी दे देंगे’?
कोर्ट ने कहा था कि यदि सरकार इस तरह आतंकवाद के आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने लगेगी, तो समाज में गलत संदेश जाएगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कौन दोषी है और कौन निर्दोष, इसका फैसला अदालत करेगी, सरकार नहीं।
संभल दंगों के आरोपितों का मुकदमा भी लिया गया था वापस
यह पहला मौका नहीं था जब समाजवादी पार्टी की सरकार ऐसे फैसलों को लेकर विवादों में आई हो। इससे पहले साल 1993 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की सरकार ने संभल में वर्ष 1978 में हुए दंगों से जुड़े आरोपितों के खिलाफ मुकदमे भी वापस लिए थे।
बताया जाता है कि उस दंगे में सैकड़ों लोगों की हत्या हुई थी और कई हिंदुओं के मकानों व पूजा स्थलों को आग लगा दी गई थी। उस फैसले को लेकर भी उस समय राजनीतिक बहस हुई थी।
अब फिर क्यों उठा यह मुद्दा?
दरअसल, पिछले कुछ महीनों से ओमप्रकाश राजभर लगातार समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर हमलावर नजर आ रहे हैं। खासकर सपा के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को लेकर राजभर लगातार सवाल उठा रहे हैं।
राजभर का आरोप है कि समाजवादी पार्टी केवल वोट बैंक की राजनीति करती है और गैर-यादव पिछड़ी जातियों को सिर्फ चुनावी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करती है। इसी राजनीतिक तनातनी के बीच उन्होंने 2013 के आतंकवाद मामलों का विवाद एक बार फिर सामने ला दिया है।
अपने सोशल मीडिया पोस्ट में राजभर ने कहा कि 6 जून की तारीख इसलिए याद रखनी चाहिए, क्योंकि इसी दिन हाई कोर्ट ने आतंकवाद के आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने के फैसले पर सपा सरकार को कठघरे में खड़ा किया था।


