महाराष्ट्र सरकार ने 6 जून 2026 को हिंदू कार्यकर्ताओं, मंदिर संगठनों, ट्रस्टियों और विभिन्न हिंदू समूहों के कड़े विरोध के बाद देवस्थान इनाम भूमि से जुड़े प्रस्तावित कानून को फिलहाल रोक दिया। नागपुर में मीडिया से बातचीत करते हुए राज्य के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने कहा कि मसौदा कानून को अभी के लिए वापस ले लिया गया है।
उन्होंने बताया कि इस पर प्राप्त आपत्तियों व सुझावों की सुनवाई 15 अगस्त तक जारी रहेगी। गौरतलब है कि महाराष्ट्र सरकार ने 7 मई को ‘महाराष्ट्र देवस्थान इनाम उन्मूलन मसौदा विधेयक 2026’ को सार्वजनिक किया था। सरकार ने इस पर 5 जून तक सुझाव और आपत्तियाँ आमंत्रित की थीं।
राज्य सरकार का कहना था कि प्रस्तावित कानून का उद्देश्य देवस्थान भूमि की सुरक्षा करना, अतिक्रमण हटाना और मंदिरों की संपत्तियों को कानूनी संरक्षण प्रदान करना है।
अपने बयान में बावनकुले ने कहा कि इस मसौदा कानून को लेकर कई तरह की गलतफहमियाँ पैदा हो गई थीं और परामर्श की प्रक्रिया से इन भ्रमों को दूर करने में मदद मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि देवस्थान की बड़ी मात्रा में भूमि अतिक्रमण के कारण उपयोग में नहीं लाई जा पा रही है। सरकार ऐसी जमीनों को अतिक्रमण मुक्त बनाना चाहती है।
मंदिर संगठनों ने बताया बड़ी जीत
इस मसौदा कानून का महाराष्ट्र मंदिर महासंघ, अष्टविनायक मंदिर समिति, विश्व हिंदू परिषद और राज्यभर के कई मंदिर ट्रस्टियों सहित अनेक मंदिर संगठनों ने विरोध किया था। इन संगठनों का कहना था कि प्रस्तावित कानून के कुछ प्रावधान मंदिरों की जमीनों के स्वामित्व और नियंत्रण को प्रभावित कर सकते हैं।
उनका आरोप था कि इससे मौजूदा कब्जाधारकों, खेती करने वालों, पुजारियों, प्रबंधकों और ऐसी जमीनों से जुड़े अन्य लोगों को अधिकार मिल सकते हैं। ऑपइंडिया ने महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के राष्ट्रीय संयोजक सुनील घनवट से बात की। उन्होंने सरकार के फैसले का स्वागत करते हुए इसे मंदिर ट्रस्टियों और हिंदू संगठनों के संयुक्त संघर्ष की बड़ी सफलता बताया।
उन्होंने कहा, “यह मंदिर हितैषी फैसला है और हम इसका पूरे दिल से स्वागत करते हैं। यह निर्णय महाराष्ट्र मंदिर महासंघ, अष्टविनायक मंदिर समिति, विश्व हिंदू परिषद और राज्यभर के मंदिर ट्रस्टियों के संगठित प्रयासों की बड़ी सफलता है।”
मंदिरों की जमीन की सुरक्षा की माँग
घनवट ने कहा कि राजस्व मंत्री द्वारा देवस्थान इनाम भूमि मंदिरों को वापस देने, वक्फ बोर्ड की तर्ज पर अतिक्रमण हटाने, कानूनी लड़ाइयों के लिए प्रतिष्ठित वकीलों की सलाह लेने और 100 से 200 साल पुराने कब्जों से जुड़े मामलों में मंदिरों को नुकसान न होने देने की बात स्वागत योग्य है।
उन्होंने यह भी कहा कि 15 अगस्त तक सुनवाई की प्रक्रिया के लिए राजस्व विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव की अध्यक्षता में प्रस्तावित 15 सदस्यीय समिति में मंदिर प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाना चाहिए। घनवट ने कहा कि सरकार ने मंदिरों के हित में कई फैसले लिए हैं, लेकिन नई प्रक्रिया में मंदिर ट्रस्टियों की महत्वपूर्ण माँगों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी माँग की कि मंदिर निधियों के राजनीतिक उपयोग पर रोक लगाई जाए। बड़े मंदिरों के फंड का इस्तेमाल छोटे और उपेक्षित मंदिरों के पुनर्निर्माण में किया जाए। साथ ही गाँवों में सेवा दे रहे पुजारियों, गुरवों, पुरोहितों और अन्य मंदिर सेवकों को हर महीने 10,000 से 15,000 रुपए का मानदेय दिया जाए।

