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महाराष्ट्र के प्रस्तावित देवस्थान इनाम निरसन अधिनियम का विरोध, CM फडणवीस से हस्तक्षेप की माँग: जानिए वक्फ छूट से क्यों खफा हुए हिंदू

महाराष्ट्र में देवस्थान इनाम भूमि कानून 2026 को लेकर विवाद बढ़ गया है। मंदिर संगठनों ने विरोध जताते हुए आंदोलन की चेतावनी दी है और सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

महाराष्ट्र सरकार के राजस्व विभाग द्वारा प्रस्तावित ‘देवस्थान इनाम निरसन अधिनियम, 2026’ के मसौदे को लेकर राज्य में विवाद गहरा गया है। महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात कर इस विधेयक के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया और एक ज्ञापन सौंपा। हिंदू संगठनों का आरोप है कि इस कानून के जरिए मंदिरों की ऐतिहासिक जमीनों पर अवैध कब्जों को वैध करने और उन्हें निजी हाथों में सौंपने की साजिश रची जा रही है। इस विवाद का सबसे बड़ा कारण वक्फ संपत्तियों को इस अधिनियम से बाहर रखना है।

प्रस्तावित मसौदे के तहत वर्ष 2011 से पहले के अवैध कब्जों को वैध बनाने और कब्जाधारियों को मालिकाना हक देने का प्रावधान है, जिसे महासंघ ने भू-माफिया को फायदा पहुँचाने वाला बताया है। महाराष्ट्र मंदिर महासंघ ने चेतावनी दी है कि अगर इसे इसी रूप में लागू किया गया तो पूरे राज्य में आंदोलन किया जाएगा।

यह ड्राफ्ट महाराष्ट्र सरकार के राजस्व विभाग द्वारा तैयार किया गया है, जिसमें देवस्थान इनाम यानी मंदिरों और धार्मिक संस्थानों को ऐतिहासिक रूप से दी गई जमीनों को खत्म करने और उनके स्वामित्व, कब्जा अधिकार, हस्तांतरण, अतिक्रमण और किरायेदारी से जुड़े मामलों के लिए नया कानूनी ढाँचा बनाने की बात कही गई है।

देवस्थान इनाम जमीन क्या हैं?

देवस्थान इनाम जमीनें वे भूमि हैं जो पहले के समय में राजाओं द्वारा मंदिरों, धार्मिक संस्थानों और चैरिटेबल संस्थाओं को दी गई थीं। इन पर अक्सर लगान में छूट भी मिलती थी। मसौदे में इन्हें ऐसी भूमि बताया गया है जो गाँव या गाँव का कोई हिस्सा, भूमि राजस्व या टैक्स छूट के रूप में धार्मिक संस्थानों को दी गई हो।

इस विधेयक में साफ तौर पर 1954 के हैदराबाद इनाम निरसन अधिनियम, 1952 के आतियत कानून और 1995 के वक्फ अधिनियम के तहत आने वाली जमीनों को बाहर रखा गया है। इसी वक्फ छूट को लेकर विवाद सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है।

विधेयक का विरोध क्यों हो रहा है?

महाराष्ट्र मंदिर महासंघ का आरोप है कि यह कानून मंदिरों की जमीनों को किरायेदारों, कब्जाधारियों और निजी लोगों को ट्रांसफर कराने का रास्ता खोल देगा। संगठन का कहना है कि मंदिर की संपत्ति देवता की होती है और उसे न तो ट्रस्टी बेच सकते हैं और न ही सरकार ट्रांसफर कर सकती है।

महासंघ के राष्ट्रीय संगठन मंत्री सुनील घनवट ने तीन मुख्य आपत्तियाँ बताई हैं। पहली यह कि सरकार के पास देवस्थान जमीनों का स्वामित्व ही नहीं है, इसलिए वह इनके हस्तांतरण का कानून नहीं बना सकती। उनका कहना है कि पहले के कानून सिर्फ जमीन को सुरक्षित रखने के लिए थे, न कि उसे निजी हाथों में देने के लिए।

दूसरी आपत्ति यह है कि ये जमीनें ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं और कई जमीनें छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे मराठा शासकों या पुराने राजवंशों द्वारा दी गई थीं। ऐसे में इन्हें निजी हाथों में जाने देना मंदिर व्यवस्था को कमजोर करेगा।

तीसरी आपत्ति वक्फ जमीनों को छूट देने को लेकर है। संगठन का कहना है कि कानून में वक्फ संपत्तियों को बचाया गया है लेकिन हिंदू मंदिरों की जमीनों पर ही नियम लागू किए जा रहे हैं, जो असमान व्यवहार है।

संगठन का आरोप है कि यह कानून मंदिरों के स्वामित्व को कमजोर करेगा, अतिक्रमण को वैध बनाएगा, बिल्डरों और जमीन माफिया को फायदा देगा और मंदिरों की आर्थिक स्वतंत्रता को नुकसान पहुँचाएगा।

ड्राफ्ट कानून के मुख्य प्रावधान

देवस्थान इनाम समाप्त करना
धारा 3 के तहत सभी देवस्थान इनाम समाप्त कर दिए जाएँगे, केवल नकद अनुदान को छोड़कर। इससे मंदिरों की जमीनों पर पुराने कानूनी अधिकार खत्म हो जाएँगे।

कब्जाधारियों को अधिकार देना

धारा 4 के तहत खेती करने वाले किरायेदारों, मिरासदारों और अन्य धारकों को कब्जे के अधिकार दिए जाएँगे और उन्हें ऑक्यूपेंट क्लास-1 का दर्जा मिलेगा। इससे मंदिरों की जमीनों पर मजबूत मालिकाना अधिकार जैसा प्रभाव पड़ेगा।

2011 से पहले के कब्जे को वैध करना

मसौदे में कहा गया है कि 1 जनवरी 2011 से पहले जो लोग जमीन पर कब्जे में हैं, अगर कुछ शर्तें पूरी करते हैं तो उन्हें जमीन का अधिकार दिया जा सकता है। इसमें बाजार मूल्य का भुगतान और आर्थिक सीमा की शर्त भी शामिल हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में 2011 से पहले रहने वालों को बिना शुल्क के भी अधिकार दिए जा सकते हैं। आलोचकों का कहना है कि यह अतिक्रमण को वैध बनाने जैसा है।

अवैध कब्जे पर सख्त कार्रवाई

इसी कानून में अवैध कब्जे पर 2 से 5 साल की सजा, भारी जुर्माना और तत्काल बेदखली का प्रावधान भी है। सरकार पुराने कब्जों को वैध और नए कब्जों पर सख्ती दोनों कर रही है, लेकिन संगठन का कहना है कि इससे गलत संदेश जाएगा।

वक्फ छूट विवाद क्यों बढ़ा?

महासंघ ने वक्फ संपत्तियों को कानून से बाहर रखने पर कड़ा विरोध जताया है। उनका कहना है कि अगर वक्फ जमीनों को सुरक्षा दी जा सकती है तो मंदिरों की जमीनों को क्यों नहीं। इस मुद्दे ने अब जमीन सुधार से आगे बढ़कर धार्मिक संस्थानों के साथ असमान व्यवहार और मंदिर स्वायत्तता की बहस का रूप ले लिया है।

संवैधानिक चिंताएँ

महासंघ का कहना है कि यह कानून अनुच्छेद 25, 26 और 300A का उल्लंघन करता है। उनका तर्क है कि मंदिरों की जमीनें पूजा-पाठ, प्रशासन, दान कार्य, पुजारियों के वेतन और धार्मिक गतिविधियों के लिए जरूरी हैं।

महाराष्ट्र मंदिर महासंघ की माँगें

संगठन ने एक मेमोरेंडम दिया जिसमें ड्राफ्ट एक्ट को तुरंत वापस लेने, लैंड रिकॉर्ड में देवस्थान की ज़मीन को साफ़ तौर पर नॉन-ट्रांसफरेबल स्टेटस देने, मंदिर की जमीन के लिए एक सख़्त एंटी-लैंड ग्रैबिंग कानून बनाने, पिछले कब्जों और जाली रिकॉर्ड की SIT जाँच कराने और मंदिर की जमीन के झगड़ों को छह महीने के अंदर सुलझाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने की मांग की गई।

महासंघ ने चेतावनी दी कि अगर सरकार इस कानून पर आगे बढ़ती है, तो वह मंदिर ट्रस्ट, भक्तों और हिंदू संगठनों को शामिल करके पूरे राज्य में आंदोलन शुरू कर सकता है।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात

महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के नेशनल ऑर्गेनाइजर सुनील घनवत की लीडरशिप में एक डेलीगेशन ने MLA प्रताप अडसद और प्रताप पचपुते के साथ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मिलकर प्रपोज़्ड कानून के खिलाफ एक मेमोरेंडम दिया।

घनवत ने बाद में कहा कि मुख्यमंत्री ने मामले की गंभीरता को माना और अधिकारियों को संबंधित विभाग और मंत्रियों के साथ बैठक करने का निर्देश दिया।

आगे क्या होगा?

यह मसौदा अभी जनता के सुझाव और आपत्तियों के लिए रखा गया है। 5 जून 2026 तक लोग अपनी राय दे सकते हैं। सरकार अब इसमें संशोधन, बदलाव या इसे विधानसभा में पेश करने का फैसला ले सकती है।

लेकिन मंदिर संगठनों के विरोध और वक्फ तुलना के कारण यह मामला आने वाले समय में महाराष्ट्र की बड़ी राजनीतिक और धार्मिक बहस बन सकता है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

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Jinit Jain
Jinit Jain
Writer. Learner. Cricket Enthusiast.

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