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फीफा विश्वकप फाइनल में अर्जेंटीना Vs स्पेन की जंग, जादूगर मेस्सी का हो सकता है आखिरी मुकाबला: पढ़ें फुटबॉल के जादूगरों ने कैसे बिखेरी पूरी दुनिया में मुस्कान

वैश्विक फुटबॉल के अगले बड़े स्टार 19 वर्षीय लामीन यमाल का सामना खुद फुटबॉल के भगवान से होगा। स्पेन का काव्यात्मक शैली का खेल अर्जेंटीना के कठोर दक्षिण अमेरिकी फुटबॉल से टकराएगा। स्पेनिश टुकड़ी अर्जेंटीनी बेड़े को रोकने के लिए पूरी जान लगा देगी।

मेरठ कैंट में अपना बचपन बिताने वाले हमारे एक पाठक ने जो दफ्तर में मेरे सीनियर भी हैं, गुरुवार की सुबह अपने बचपन से जुड़ा एक वाकया साझा किया।

उन्होंने पहले तो साथ बैठ विश्व कप के चल रहे मैचों से जुड़ी चर्चाएँ की। रोनाल्डो बनाम मेस्सी की डिबेट भी हुई। फिर आगे बातें की होसे मोरीनियो व पेप गार्दियोला के दिनों होने वाले ‘एल क्लासिको’ के मैचों की। जैसे क्रिकेट प्रधान इस देश में भारत बनाम पाकिस्तान की एक प्रतिद्वंद्विता है, वैसे ही स्पेनिश लीग के दो सबसे बड़े फुटबॉल क्लबों के मध्य भी एक प्रतिद्वंद्विता है जिसे ‘एल क्लासिको’ कहा जाता है। जब भी इन दोनों क्लबों का मैच होता है, सारी ही दुनिया दो धड़ों में बँट जाती है। बार्सिलोना बनाम रियाल मैड्रिड। इस मैच में फुटबॉल नहीं महासंग्राम होता है मैदान पर।

आगे उन्होंने बताया कि उन्हें काका, ज़िदान व माल्दीनी का खेल कितना ज्यादा पसंद था और अब भी वो अक्सर ही यूट्यूब पर जाकर काका, ज़िदान व माल्दीनी की क्लिप्स देख लेते हैं। क्रिस्टियानो रोनाल्डो व लियोनेल मेस्सी के बीच बँटी दुनिया में जब किसी ने काका, ज़िदान व माल्दीनी का नाम लिया तो मन को बेहद सुकून मिला था। क्रिस्टियानो रोनाल्डो व मेस्सी से आगे भी फुटबॉल है। जिसने काका व ज़िदान को मैदान पर जादू बिखेरते नहीं देखा उसने भला क्या देखा। जिसने नेस्ता व माल्दीनी को मैच के अंतिम क्षणों तक जी जान लगा देते नहीं देखा उसने भला क्या देखा।

हम पेले, माराडोना, रॉबर्टो बाज़ियो, योहान क्रुएफ आदि को खेलते तो न देख सके परन्तु हमारी पीढ़ी को कई बेहतरीन फुटबॉलरों को विश्वभर के हरे मैदानों पर जादूगरी करते देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हमारे लिए अटैक का मतलब होता है ब्राजीली रोनाल्डो व एलेसान्द्रो देल पियरो। फिर बातीस्तुता, ड्रोग्बा, हरनन क्रेस्पो व फर्नान्दो तोरेस आदि हुआ करते थे। मिडफील्ड में हमने केविन डि ब्रुएना, टोनी क्रूस व मोद्रिच आदि से सालों पूर्व उनसे बेहतर कारीगरी पेश करते हुए चावी, इनिएस्ता, ज़िदान, काका, रोनाल्डिन्हो, डेविड बैकहम, फ्रैंक लैंपार्ड, जेरार्ड, चेक फैब्रेगास आदि को देखा था। पिछले ही दशक में डेविड सिल्वा व मोद्रिच जैसे बेहतरीन खिलाड़ी भी हुए। रक्षापंक्ति में हमने नेस्ता व माल्दीनी की जोड़ी देखी। फैबियो कैनावारो रहे। मैदान में किसी शेर की भांति खेलते हुए कार्लेस पुयोल को देखा। नेमांजा विदिच़, जॉन टेरी आदि भी शानदार खिलाड़ी रहे।

गोलकीपरों की भी एक पूरी फ़ौज थी। ओलिवर कॉन, गियानलुइगी बुफॉन, जेंस लेहमन, एडविन वेन डर सर, पीटर क्राउच व दीदा आदि के अपनी टीम के हित हेतु सब कुछ झोंकते दृश्यों को कोई कैसे भुला सकता है भला। फुदबैक्स की बात करूँ तो रॉबर्टो कार्लोस, दानी आल्वेस व काफू जैसा खेल खेलते मैंने तो फिर कभी किसी को भी नहीं देखा। अगर आप फुटबॉल की खुबसूरती देखने की मंशा रखते हैं तो आपको दानी आल्वेस व मेस्सी का तालमेल देखना चाहिए।

उन्होंने आगे बताया कि कैसे वह बचपन के दिनों में मेरठ कैंट के लंबे हरे मैदानों में स्कूल से लौटने पर फुटबॉल खेला करते थे। इस देश में जहाँ हम सभी क्रिकेट को जुनून की हद तक चाहते हैं, फुटबॉल उन्हें सुकून दिया करता था। वह लगातार गेंद के पीछे भागते रहा करते। यह करना उन्हें सुख देता था।

मुझे स्वयँ आज भी जनवरी की वो सर्द सुबहें याद हैं, जब माँ के हाथों से बुना स्वैटर पहन कर हम गेंद-मेले जाया करते थे। माँ की बुनी स्वैटर जैसी गर्माहट ये महँगी जैकेटें नहीं दे पाती।

मेरे बचपन का एक वाकया मुझे अब भी अक्सर रह रह के याद आता है। मुझे फुटबॉल का खेल बेहद प्रिय है और क्लब स्तर पर स्पैनिश लीग का इक बड़ा क्लब ‘ F.C. बार्सिलोना’ मेरा सबसे पसंदीदा क्लब है। बार्सिलोना दरअसल यूरोपीय महाद्वीप में बसे एक देश स्पेन के तटीय क्षेत्र में स्थित एक बेहद ही खूबसूरत प्रान्त है। यहाँ विश्वभर से सैलानी साल भर आते हैं सिर्फ इस शहर की खूबसूरती को देखने।

जानते हो, वूडी एलेन जैसे नामी गिरामी फिल्म-रचियता ने तो इस शहर की खूबसूरती को दरसाती ‘विक्की- क्रिस्टीना बार्सिलोना’ नामक एक पूरी फिल्म ही बना डाली थी। यह शहर न सिर्फ अपनी प्राकृतिक खूबसूरती बल्कि कला और अटूट वास्तुकला के लिए भी जाना जाता है। यहाँ का सबसे बड़ा फुटबॉल क्लब है ‘ फुटबॉल क्लब दे बार्सिलोना’।

तब डेको, थुर्रम, पूयोल, ज़ावी, युवा सनसनी मेस्सी, इनिएस्ता, जैम्ब्रोटा, वाल्देस, राफेल मार्खेज़, सैम्युएल इटो और स्वयं फुटबॉल के जादूगर रोनाल्डिन्हो जैसे एक से एक विश्व-स्तरीय खिलाड़ी बार्सिलोना की टीम में खेला करते थे। ऐसे ही तमाम बड़े बड़े सूरमा बार्सिलोना के प्रतिद्वंद्वी रियाल मैड्रिड के लिए भी खेला करते थे।

मुझे बार्सिलोना की फुटबॉल-जर्सी बेहद पसंद थी। हमारे कस्बे के मुख्य बाजार में जो कि हमारे गाँव से यही कोई 10-12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, खेल के सामान की जो सबसे बड़ी ‘स्टार-स्पोर्टस’ नामक दुकान थी, वहाँ वो जर्सी सजी रहती थी। तब इतनी गाड़ियाँ नहीं होती थीं। लोग बाजार बहुत कम ही जाया करते थे। बाजार जाना भी इक उत्साह समान ही हुआ करता था उन दिनों। यदा कदा जब भी बाजार जाना हो पाता, ‘स्टार-स्पोर्टस’ के बाहर सजी वो जर्सी देख मेरी आँखों में एक अजीब सी चमक आ जाती। लेकिन फिर एकाएक मैं अक्सर मायूस हो जाया करता था। मुझे आज भी याद है, उस वक्त, मेरी जेब में वो जर्सी खरीद पाने लायक पैसे नहीं थे।

मेरे गुल्लक में भी मैं कभी इतने पैसे नहीं जोड़ पाता था कि वो जर्सी खरीद पाऊँ। हर बार गेंद मेले से दो महीने पहले यही सोचकर गुल्लक फोड़ता कि मेले पर माँ/ नानाजी से मिलने वाले पैसों और गुल्लक से निकली रकम मिलाकर जमा किए पैसों से भले मेले में जलेबी और समोसे नहीं खाऊँगा, पर इस बार तो अपनी पसंदीदा जर्सी ले ही लूँगा। परन्तु ‘स्टार-स्पोर्टस’ के बाहर सजी वो प्यारी सी जर्सी लेने का मेरा ख्वाब भी हर बार मेरे गुल्लक की तरह ही चकनाचूर हो जाया करता था।

माँ तो माँ ही होती है ना। माँ यह जानती थी। सो इक रोज़ माँ झटपट गयी बाजार और झंडा- चौक से कुछ ही दूरी पर पुरी-भाई की दुकान से कोई दस कदम आगे हनुमान मंदिर से लग कर जो सरदार जी की ऊन की दुकान है, माँ वहाँ से लाल-नीली फैदर वाली ऊन के दो गोले ले आई। माँ रात-दिन बुनाई में लगी रहती और माँ ने गेंद के मेले से पहले मुझे मेरी वो स्वैटर बुनकर भी दे दी। लाल-नीली पट्टियों वाली मेरी वो स्वैटर। मेरी चमचमाती बार्सीलोना वाली स्वैटर।

उस साल मैं मेले में वही स्वैटर पहन कर गया था। लाल-नीली पट्टियों वाली मेरी वो स्वैटर। मेरी चमचमाती बार्सीलोना वाली स्वैटर। पता है, मेरी सब मौसियों, गाँव की औरतों ने मुझे घेर लिया था मेले में। कोई मुझे इधर खींचता तो कोई उधर। सब बुनाई के फंदे गिनने में लगे पढ़े थे। उस स्वैटर में कुछ तो जादू था। उसको पहनते ही मैं सेलिब्रिटी बन गया था। मेरे दोस्त भी बार बार मुझसे एकबार पहनने को वो स्वैटर माँगते फिरते। ना जाने कब और कैसे, उस स्वैटर के आते ही मैं अचानक ही गाँव का हीरो हो गया था।

जब माँ ने वो स्वैटर बुना था, मैं यही कोई 12-13 साल का था। पर मैंने वो स्वैटर कॉलेज तक पहनना नहीं छोड़ा। पता जब मैं कॉलेज जाने लगा, तो माँ ने उसके कॉलरों को बढ़ाकर इक टोपी की शक्ल दे दी थी। अब मेरी बार्सिलोना वाली वो स्वैटर और भी मस्त हो गई थी।

पर मैं अब वो स्वैटर नहीं पहन पाता। अब मैं बड़ा जो हो गया हूँ। वो बेहद छोटी हो गई है मुझपे अब। पर आज भी वो लाल-नीली स्वैटर माँ ने दीवान में संभाल कर रखी है। वक्त के तूफानों के तीखे थपेड़े छू भी न सके माँ की बुनी स्वैटर को। वो आज भी बेहद मुलायम, बिल्कुल नई सी ही लगती है। मानो उसे आजतक किसी ने कभी पहना ही न हो। उसके बाद मैंने लगभग हर फुटबॉल-सीज़न में अपने पसंदीदा क्लब की जर्सी खरीदी, पर जाने क्यों उन सभी जर्सीयों में वो बात नहीं थी जो माँ के हाथों की बनी उस स्वैटर में थी।

खैर, ये सब तो गुजरे सालों की बातें हैं। काफी वक्त बीत गया। अब काम के सिलसिले में मैं मुंबई आ गया हूँ। अब तो फुटबॉल भी कहीं पीछे ही छूट गया है। मैं यहीं एक छोटे से कमरे में रहता हूँ। यहाँ मेरे पहाड़ नहीं हैं। यहाँ बिल्कुल ठंड नहीं पड़ती। यहाँ कोई माँ के हाथों से बुना स्वैटर भी नहीं पहनता।

पर मैं जानबूझ कर कुछ वर्ष पूर्व बार जब घर गया था तो माँ से इक मफलर की जिद कर बैठा था। फिर क्या था; माँ झटपट बाजार गई और झंडा-चौक से कुछ ही दूरी पर, पुरी-भाई की दुकान से कोई दस कदम आगे हनुमान मंदिर से लग कर जो सरदार जी की ऊन की दुकान है, माँ वहाँ से लाल-नीली ऊन के दो गोले ले आई। अब माँ की आँखों में वो चमक, वो तेजी नहीं रही। फिर भी माँ ने झटपट झटपट मात्र चार दिन में ही मेरा मफलर बुन दिया। लाल-नीली पट्टियों वाला मेरा मफलर। मेरा चमचमाता बार्सीलोना वाला मफ़लर।

दूर हजारों किलोमीटर दूर पहाड़ों के उस पार मेरे गाँव में कड़ाके की ठंड पड़ती है। गाँव के सभी बच्चे-बूढ़े अलाव किनारे साथ बैठकर मूँगफली लिए आग तापते हैं। सूरज अक्सर देर से निकलता है। स्कूलों में छुट्टियाँ पड़ जाती हैं। बच्चे गेंद और बसंत-पंचमी के मेलों को लेकर उत्सुक होते हैं। बच्चे जरुर माँ के हाथों के बने स्वैटर पहन मेले जाते हैं। और मैं? मैं यहाँ मुंबई की तपती दुपहरी में गले में अपना लाल-नीला मफलर डाले बैठा अपने हिस्से की सर्दियाँ जी रहा होता हूँ।

ये लाल-नीला मफलर मुझे याद दिलाता है दूर, हजारों किलोमीटर दूर, पहाड़ों के उस पार बसे मेरे गाँव की, गाँव में पड़ती सर्दियों की और सर्दी के अलसाए दिनों में भी झटपट सारा काम निपटा कर चश्मा लगाए एक स्वैटर बुनती मेरी माँ की।

फीफा विश्व कप अब एक सुखांत की ओर बढ़ चला है। सर्वप्रथम आज देर रात भारतीय समयानुसार ढाई बजे तीसरे स्थान के लिए मियामी में फ्रांस बनाम इंग्लैंड का मुकाबला खेला जाएगा। तत्पश्चात रविवार की देर रात भारतीय समयानुसार साढ़े बारह बजे खेला जाएगा, विश्व कप का फाइनल मुकाबला गत विजेता अर्जेंटीना व यूरोपीयन चैंपियन स्पेन के बीच।

अर्जेंटीना आज से ठीक दो दिन बाद स्पेन के खिलाफ न्यूजर्सी स्टेडियम में विश्व कप का फाइनल मुकाबला खेलने उतरेगी। स्पेन यूरोपीयन चैंपियन है तो अर्जेंटीना विश्व विजेता। यहाँ एक अप्रेंटिस का सामना अपने माएस्ट्रो से होगा। वैश्विक फुटबॉल के अगले बड़े स्टार 19 वर्षीय लामीन यमाल का सामना खुद फुटबॉल के भगवान से होगा। स्पेन का काव्यात्मक शैली का खेल अर्जेंटीना के कठोर दक्षिण अमेरिकी फुटबॉल से टकराएगा। स्पेनिश टुकड़ी अर्जेंटीनी बेड़े को रोकने के लिए पूरी जान लगा देगी। जिस बार्सिलोना की जड़ों को कभी लियोनेल मेस्सी ने अपूर्व प्रेम से अपनी मेहनत से सींचा, उसके आठ खिलाड़ी स्पेन का हिस्सा हैं। यह फाइनल कहीं न कहीं ‘ला मासिया’ में पला पोसा है। विश्व विजेता व यूरोपीयन चैंपियन का यह ‘फिनालिस्मा’ एक जबरदस्त टक्कर होगी। यह टकराव ऐतिहासिक होगा।

मुंबई में तो कई कैफे, पबों आदि के साथ ही साथ लगभग दस-पंद्रह सिनेमा हॉल दो-दो/ चार-चार स्क्रीन पर इस मुकाबले का लाइव प्रसारण करने जा रहे हैं। खेलप्रेमियों में इस मैच को लेकर जबरदस्त माहौल बन चुका है।

इस मैच में हारे जीते कोई भी, जीत अंततः फुटबॉल की होगी।

यह मैच फुटबॉल जगत के सबसे ज्यादा जगमगाते सितारे का आखिरी मैच भी हो सकता है। आज से सालों पहले जब इस सितारे ने बार्सिलोना की तीस नंबरी गहरी मरून व नीली धारियों वाली फुल बाजू की जर्सी पहने खेलना शुरू किया था तो पहली दफा यकीन हुआ था कि हाँ, सचमुच में इस दुनिया में जादू होता है।

जब जब भी वह मैदान में उतरता स्टेडियम में मौजूद दर्शक खुशी से झूमने लगते। विपक्षी भी उसे एकटक निहारते रह जाते। वह खुशियों का पर्यायवाची शब्द हो गया था। वह जब भी खेलने मैदान पर उतरता, सब अपने अपने काम छोड़ बस उसे ही खेलते हुए देखते रहते। जाने वो कैसा जादू था उसके खेल में। जब जब गेंद उसके कदमों को चूमती है, तो मानो कुछ जादुई घटित हो रहा होता है। उसे खेलते हुए देख कर हम, कुछ पलों के लिए ही सही, अपने तमाम दुख-दर्द भूल जाते थे।

उसने हमारी हथेलियों पर खुशियाँ रख दी थीं।

उसने हमें सिखलाया – अंतिम क्षणों तक लड़ना।

वो था तो इस खेल में जादू था। वह चला जाएगा तो शायद उसके साथ ही इस खेल का जादू भी चला जाएगा।

हमने इस विश्व कप में क्रिस्टियानो रोनाल्डो (शायद), नेमार, लुका मॉद्रिच, गुइलेर्मो ओचोआ आदि को एक अंतिम दफा खेलते देखा।

हम खेत खलिहानों में बिना फुटबॉल बूट्स और बिना जर्सी पहने बारिशों में फुटबॉल खेलने वाले लड़कों ने वैश्विक मंच पर जिस जमात के खिलाड़ियों को खेलते देख इस खेल से इश्क किया था, उस जमात के अंतिम खिलाड़ी के संभवतः इस आखिरी मुकाबले को हमें तमाम मनमुटाव मिटा कर देखना चाहिए। हमारी खुशियों का सौदागर हमेशा के लिए शहर छोड़ कर जा रहा है। उसके जाने के साथ ही तमाम रोशनियाँ भी धूमिल हो उठेंगी।

हमें इस मैच को रोसारियो के उस नन्हें लड़के के एक अंतिम जश्न के तौर पर देखना चाहिए जो तमाम दुख दर्द के समंदर के मध्य हमारी खुशियों का लाइट हाउस था।

रोसारियो का वह नन्हा लड़का जिसने दुनिया भर के लाखों नन्हें लड़कों की आँखों को जगमगाते ख्वाब दिए थे।

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गौरव बडोला
गौरव बडोला
दिन में दिहाड़ी करता हूं, रात को कोरे कागज़ पर अपने ख्वाबों की दुनिया बुनता हूं। फुटबॉल और साहित्य को जीता हूं।

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