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‘वंदे मातरम’ का अपमान किया तो होगी 3 साल की जेल… मुस्लिमों के दबाव में नेहरू ने जिस राष्ट्रीय गीत का किया ‘अपमान’, उसे मोदी सरकार ने दिया सम्मान: अब नया बिल बदलेगा इतिहास

पूरा विवाद 1937 को लेकर का है। वंदे मातरम गीत के अंतरों (पैराग्राफ) को गाने के लिए मुस्लिम समुदाय के कुछ नेताओं ऐतराज जताया था। उनका कहना था कि 2 के बाद के हिस्सों में हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र आता है, जिससे उनकी मजहबी भावनाओं को आहत होती हैं। तब जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने तय किया था कि किसी भी सरकारी या सार्वजनिक प्रोग्राम में वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाएँगे।

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार हमारे राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर एक बहुत बड़ा कदम उठाने जा रही है। सरकार 20 जुलाई, 2026 से शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र में एक नया और कड़ा कानून पेश करने वाली है। इस कानून का नाम है- ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026’। देश की केंद्रीय कैबिनेट ने इस नए बिल को पहले ही मंजूरी दे दी है।

इस नए बिल को लाने का सीधा मकसद यह है कि जो लोग भी हमारे राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ का अपमान करते हैं, या इसे गाने के दौरान जानबूझकर कोई रुकावट डालते हैं, उन्हें सख्त सजा दी जा सके। ऐसे लोगों को अब सीधे जेल की हवा खानी पड़ेगी।

आसान शब्दों में समझें तो इस कानून के पास होने के बाद ‘वंदे मातरम’ को भी कानूनी तौर पर वही इज्जत और सुरक्षा मिल जाएगी, जो आज हमारे राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ को मिली हुई है। अब तक राष्ट्रीय गीत का अपमान करने पर इस तरह की सीधे जेल भेजने वाली कड़ी कानूनी कार्रवाई का कोई नियम नहीं था।

लेकिन अब मोदी सरकार इस कमी को पूरी तरह दूर करने जा रही है। खास बात यह है कि सरकार यह ऐतिहासिक कदम ऐसे समय पर उठा रही है, जब पूरा देश इस गौरवशाली गीत की 150वीं सालगिरह (वर्षगाँठ) मना रहा है।

वंदे मातरम का अपमान किया तो क्या होगी सजा?

केंद्र सरकार जो नया कानून ला रही है, वह बहुत कड़ा है। इसके तहत अगर कोई भी व्यक्ति सबके सामने या जानबूझकर हमारे राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ का अपमान करता है, तो उसे 3 साल तक की जेल हो सकती है। कोर्ट चाहे तो उस पर भारी जुर्माना भी लगा सकता है।

इसके अलावा, अपराध की गंभीरता को देखते हुए दोषी को जेल और जुर्माना दोनों की सजा एक साथ भी भुगतनी पड़ सकती है। अब सवाल उठता है कि यह कानून किस तरह काम करेगा? इस नए कानून में साफ कहा गया है कि सजा केवल ‘जानबूझकर’ किए गए अपमान या गड़बड़ी पर ही मिलेगी। इसका मतलब है कि अगर किसी व्यक्ति से अनजाने में या गलती से कोई चूक हो जाती है, तो उसे मुजरिम नहीं माना जाएगा।

लेकिन, अगर कोई शख्स बुरी नीयत से ‘वंदे मातरम’ के गायन को बीच में रोकता है, इसे गाने वाली भीड़ या सभा में हंगामा खड़ा करता है, या फिर सबके सामने इसका मजाक उड़ाता है, तो पुलिस उसे बिल्कुल नहीं बख्शेगी। ऐसे लोगों के खिलाफ इस नए कानून के तहत तुरंत और सख्त आपराधिक कार्रवाई की जाएगी।

पुराना नियम: पहले किन चीजों के अपमान पर होती थी जेल?

हमारे देश में राष्ट्रीय प्रतीकों (देश की पहचान से जुड़ी चीजों) की इज्जत के लिए पहले से एक कानून बना हुआ है। इसे ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971‘ कहते हैं। अब तक इस पुराने कानून के तहत केवल तीन ही चीजों को सुरक्षा मिली हुई थी- हमारा तिरंगा झंडा, देश का संविधान और हमारा राष्ट्रगान ‘जन गण मन’।

पुराने नियम के हिसाब से, सिर्फ इन तीनों का अपमान करना ही कानूनी तौर पर अपराध माना जाता था। उदाहरण के लिए, अगर कोई राष्ट्रगान गाने से रोकता था या तिरंगे को फाड़ता-जलाता था, तो उसे 3 साल तक की जेल या जुर्माना होता था। लेकिन, इस 55 साल पुराने कानून में हमारे राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ का कहीं कोई जिक्र नहीं था।

अब मोदी सरकार साल 2026 के इस नए बिल के जरिए पुराना नियम बदलने जा रही है। इस नए बदलाव के बाद ‘वंदे मातरम’ को भी उसी लिस्ट में जोड़ दिया जाएगा जिसमें तिरंगा और राष्ट्रगान शामिल हैं। यानी अब राष्ट्रीय गीत का मजाक उड़ाने या इसे रोकने पर भी वही धाराएँ लगेंगी और सीधे 3 साल की जेल होगी।

इस कानून में एक और बहुत जरूरी और कड़ा नियम है। अगर कोई इंसान एक बार राष्ट्रीय गीत या राष्ट्रगान का अपमान करने का दोषी पाया जाता है, और जेल से छूटने के बाद वही गलती दोबारा दोहराता है, तो कानून उसे बिल्कुल नहीं बख्शेगा। दूसरी बार पकड़े जाने पर उसे कम से कम 1 साल की जेल अनिवार्य रूप से काटनी ही पड़ेगी।

अचानक नहीं आया बिल, गृह मंत्रालय की थी पूरी तैयारी

वंदे मातरम को लेकर आ रहा यह नया बिल अचानक से नहीं टपक पड़ा है। इसके पीछे देश के केंद्रीय गृह मंत्रालय का एक बड़ा और सोचा-समझा प्लान है। असल में, पिछले कुछ महीनों से सरकार देश के राष्ट्रीय प्रतीकों को और ज्यादा सम्मान देने के लिए लगातार नए नियम बना रही थी। इसी सिलसिले में इस साल फरवरी में गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को एक कड़ा आदेश भेजा था।

इस आदेश में साफ-साफ कहा गया था कि देश में जितने भी आधिकारिक या सरकारी प्रोग्राम होते हैं, जहाँ राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ बजाया या गाया जाता है, वहाँ अब से ‘वंदे मातरम’ को भी बजाना और गाना एकदम जरूरी (अनिवार्य) होगा। कोई भी सरकारी कार्यक्रम अब इसके बिना नहीं होगा।

इसके बाद इसी जुलाई के महीने में गृह मंत्रालय ने नियमों को और ज्यादा साफ करते हुए राज्यों के बड़े अफसरों (मुख्य सचिवों) को एक और चिट्ठी भेजी। इस नए नियम के मुताबिक, अगर किसी भी सरकारी कार्यक्रम में राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान दोनों होने हैं, तो सबसे पहले ‘वंदे मातरम’ गाया जाएगा और उसके बाद ही ‘जन गण मन’ की बारी आएगी।

इतना ही नहीं, मंत्रालय ने इस बार यह भी बिल्कुल साफ कर दिया है कि वंदे मातरम के केवल शुरुआती हिस्से नहीं, बल्कि उसके सभी 6 अंतरे (पूरा पैराग्राफ) गाए जाने चाहिए। गृह मंत्रालय के इन्हीं सब नियमों को कानूनी तौर पर और ज्यादा मजबूत और पक्का करने के लिए अब सरकार संसद में यह नया बिल पास कराने जा रही है।

सिर्फ एक गीत नहीं, भारत की आत्मा है ‘वंदे मातरम’

‘वंदे मातरम’ केवल कुछ शब्दों को मिलाकर लिखी गई कविता नहीं है, बल्कि यह हमारे देश की आत्मा, संस्कृति और शान का प्रतीक है। इस शानदार गीत को महान लेखक बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने साल 1870 के आस-पास लिखा था। इसके बाद उन्होंने साल 1882 में आए अपने मशहूर उपन्यास ‘आनंदमठ’ में भी इसे जगह दी थी।

अगर इसका बिल्कुल आसान मतलब समझें तो ‘वंदे मातरम’ का अर्थ होता है- “माँ, मैं तुझे प्रणाम करता हूँ।” इस खूबसूरत गीत में हमारी भारत भूमि (देश) को एक बहुत ही समृद्ध, हरी-भरी और प्यार लुटाने वाली माँ या देवी के रूप में दिखाया गया है, जो अपने बच्चों का पेट पालती है।

जब हमारा देश अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होने के लिए लड़ रहा था, तब यह गीत देशभक्तों के दिलों में जोश भरने का सबसे बड़ा जरिया बना था। साल 1905 में जब अंग्रेजों ने चाल चलते हुए बंगाल को दो टुकड़ों में बांट दिया (बंग-भंग), तो उसके खिलाफ देश में एक बड़ा आंदोलन छिड़ गया। उस दौर में ‘वंदे मातरम’ पूरे देश को एकजुट करने वाला सबसे बड़ा नारा बन गया था।

देश को आजाद कराने का जज्बा ऐसा था कि हमारे वीर क्रांतिकारी हँसते-हँसते फाँसी के फँदे पर झूलते समय भी ‘वंदे मातरम’ का नारा बुलंद करते थे। इस गीत के इसी ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए 24 जनवरी 1950 को हमारी संविधान सभा ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने ‘जन गण मन’ को देश का राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम’ को भारत का ‘राष्ट्रीय गीत’ घोषित किया। तब संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद ने साफ-साफ कहा था कि वंदे मातरम को भी राष्ट्रगान के बराबर ही पूरा सम्मान और दर्जा मिलेगा।

क्या है 2 और 6 अंतरों का चक्कर? मुस्लिमों के दबाव में आकर नेहरू ने देश के गीत को बांटा

इस नए बिल के आने के बाद देश में एक बार फिर पुराना और ऐतिहासिक विवाद गर्मा गया है। पूरा मामला इस गीत के अंतरों (पैराग्राफ) को लेकर है। दरअसल, साल 1937 में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस ने फैसला लिया था। तय हुआ था कि किसी भी सरकारी या सार्वजनिक प्रोग्राम में वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाएँगे

उस दौर में मुस्लिम समुदाय के कुछ नेताओं और संगठनों ने इसके बाद वाले अंतरों पर ऐतराज जताया था। उनका कहना था कि बाद के हिस्सों में हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र आता है, जिससे उनकी मजहबी भावनाओं को ठेस पहुँचती है। बस, तभी से यह गीत आधा गाने की परंपरा चल पड़ी थी, जिसे अब मोदी सरकार बदलने जा रही है।

अब सरकार ने जब से पूरा गीत (सभी 6 अंतरे) गाने का नियम बनाया है, तब से बीजेपी और विपक्ष की पार्टियों के बीच बहस-बाजी चल रही है। बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने सीधा आरोप लगाया है कि कॉन्ग्रेस और उससे जुड़े लोग हमेशा से ही वंदे मातरम से नफरत करते रहे हैं। उनका कहना है कि नेहरू जी ने मुस्लिम लीग को खुश करने के लिए (तुष्टिकरण के दबाव में) हमारे इतने बड़े राष्ट्रीय गीत को दो हिस्सों में काट दिया था।

खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस को घेरा था। PM मोदी ने कहा था कि अपनी वोट बैंक की राजनीति के लिए कॉन्ग्रेस ने वंदे मातरम के गौरव को कम किया। गीत के अंतरों को हटाना देश को बांटने वाली सोच को बढ़ावा देने जैसा था।

वंदे मातरम ही नहीं, मानसून सत्र में आ रहे हैं ये बड़े बिल

20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के इस मानसून सत्र में सरकार सिर्फ वंदे मातरम से जुड़ा बिल ही नहीं ला रही है। लोकसभा सचिवालय की लिस्ट के मुताबिक, इस बार मोदी सरकार कई और बड़े और जरूरी कानून बनाने की तैयारी में है, जो सीधे तौर पर आम जनता और देश की व्यवस्था से जुड़े हैं। आइए जानते हैं कि इस बार संसद की टेबल पर कौन-कौन से बड़े बिल आने वाले हैं।

जन्म-मृत्यु का रजिस्ट्रेशन: सरकार ‘जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026’ लाने जा रही है। इसका सीधा मतलब यह है कि अब जन्म या मौत का सर्टिफिकेट (प्रमाण पत्र) बनवाना पहले से ज्यादा कड़ा हो जाएगा। अगर कोई व्यक्ति बच्चे के जन्म या परिवार में किसी की मृत्यु के 2 साल बाद तक उसका रजिस्ट्रेशन नहीं कराता है, तो उसका सर्टिफिकेट अब आसानी से नहीं बनेगा। इसके लिए अब सीधे प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट (जज) से ऑर्डर लेना जरूरी हो जाएगा। सरकार का मानना है कि इस कड़े नियम से देश में फर्जी कागज (दस्तावेज) बनाने के खेल पर पूरी तरह से ताला लग जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट में बढ़ेंगे जज: अदालतों में सालों-साल लंबित रहने वाले मुकदमों की समस्या को दूर करने के लिए सरकार ‘सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक’ ला रही है। इस नए कानून के पास होने के बाद देश की सबसे बड़ी अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में जजों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी जाएगी। जजों की संख्या बढ़ने से सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि कोर्ट में सालों से लटके पड़े मुकदमों की सुनवाई बहुत तेजी से हो सकेगी और लोगों को समय पर इंसाफ मिल पाएगा।

विदेशी चंदे (NGO) पर कसेगा शिकंजा: सरकार एक और बड़ा बिल ला रही है, जिसका नाम ‘विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026’ (FCRA) है। यह बिल पहले पास नहीं हो पाया था, लेकिन इस बार सरकार इसे हर हाल में पास कराना चाहती है। इसके जरिए देश में काम करने वाले एनजीओ (NGO) को विदेशों से मिलने वाले चंदे (फंड) पर कड़ी नजर रखी जाएगी, ताकि कोई भी पैसे का गलत इस्तेमाल देश के खिलाफ न कर सके।

इसके साथ ही, आम जनता और नौकरीपेशा लोगों के लिए राहत की बात यह है कि सरकार ‘आयकर (संशोधन) विधेयक, 2026’ भी ला रही है। इसका मकसद इनकम टैक्स से जुड़े पेचीदा नियमों को बिल्कुल आसान और साफ-सुथरा बनाना है, ताकि लोगों को टैक्स भरने में कोई परेशानी न हो।

राष्ट्र के सम्मान के लिए जरूरी है यह कदम

इस पूरे मामले पर केंद्र सरकार का स्टैंड बिल्कुल साफ है। सरकार का कहना है कि इस नए बिल का सिर्फ एक ही मकसद है- हमारे राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को वह कानूनी सुरक्षा और हक दिलाना, जिसका वह हकदार है। सरकार का तर्क है कि जिस गीत ने हमें आजादी की लड़ाई में एकजुट किया, उसे भी तिरंगे और राष्ट्रगान की तरह ही पूरा कानूनी कवच मिलना चाहिए। सरकार के मुताबिक, उनका इरादा किसी पुराने विवाद को दोबारा खड़ा करना बिल्कुल नहीं है, बल्कि देश के गौरव और सम्मान को सबसे ऊपर रखना है।

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