भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाला सिलीगुड़ी कॉरिडोर लंबे समय तक भारत की सबसे संवेदनशील रणनीतिक जगह माना जाता रहा है। पश्चिम बंगाल में मौजूद यह संकरा भू-भाग सबसे कम चौड़ाई पर सिर्फ 17 से 22 किलोमीटर का है।
इसी रास्ते से सड़क, रेल, ईंधन की सप्लाई और सेना की आवाजाही उत्तर-पूर्व तक पहुँचती है। इसलिए इसे वर्षों से चिकन नेककहा जाता था, क्योंकि किसी बड़े युद्ध की स्थिति में इस रास्ते को निशाना बनाकर उत्तर-पूर्व से संपर्क प्रभावित किया जा सकता था।
न्यूज 18 के अनुसार, लेकिन अब भारतीय सेना का कहना है कि यह सोच बदल चुकी है। सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, अब यह इलाका ‘चिकन नेक’ नहीं बल्कि ‘एलिफेंट्स ट्रंक’ यानी हाथी की सूंड बन चुका है, जो मजबूती, लचीलापन और जवाबी कार्रवाई की क्षमता का प्रतीक है।
2014 के बाद तेजी से बदली तस्वीर
सेना के अनुसार, साल 2014 के बाद केंद्र सरकार ने भारत की पूर्वी सीमा पर रणनीतिक तैयारियों को काफी मजबूत किया है। सीमा क्षेत्रों में सैन्य ढाँचे का विस्तार, नई सड़कें, बेहतर रेलवे नेटवर्क, आधुनिक निगरानी प्रणाली, सैन्य लॉजिस्टिक्स और कनेक्टिविटी पर बड़े पैमाने पर निवेश किया गया।
इसका उद्देश्य सिर्फ इस संकरे रास्ते की रक्षा करना नहीं, बल्कि इसे एक मजबूत सैन्य गलियारे में बदलना था, जहाँ से जरूरत पड़ने पर सेना तेजी से कार्रवाई कर सके।
भारतीय सेना की ईस्टर्न कमांड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि पहले जिस जगह को भारत की कमजोरी माना जाता था, अब वही इलाका देश की ताकत बन चुका है। उनका कहना है कि लगातार सैन्य ढाँचे के विस्तार और स्थायी तैनाती ने इस पूरे क्षेत्र की रणनीतिक स्थिति बदल दी है।
आखिर क्यों दिया गया ‘हाथी की सूंड’ का नाम?
सेना का कहना है कि हाथी की सूंड सिर्फ मजबूत ही नहीं होती, बल्कि बेहद लचीली और फुर्तीली भी होती है। वह जरूरत पड़ने पर बहुत सटीक तरीके से काम कर सकती है और पूरी ताकत भी दिखा सकती है।
इसी सोच के आधार पर अब सिलीगुड़ी कॉरिडोर को देखा जा रहा है। यह सिर्फ एक संकरा रास्ता नहीं रह गया है, बल्कि अब यहाँ स्थायी सैन्य ठिकाने, आधुनिक निगरानी प्रणाली, रणनीतिक मिसाइलें, वायुसेना की मजबूत मौजूदगी, बेहतर सड़क और रेल नेटवर्क तथा कई वैकल्पिक लॉजिस्टिक व्यवस्थाएँ तैयार की गई हैं। सेना किसी भी चुनौती का तेजी से जवाब देने में सक्षम मानी जा रही है।
तीन बड़े सैन्य ठिकानों से बनी मजबूत सुरक्षा
सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए भारतीय सेना ने तीन अहम सैन्य ठिकानों को विकसित किया है।
लचित बरफुकन मिलिट्री स्टेशन (असम): धुबरी के बामुनी इलाके में बना यह स्टेशन पूर्वी क्षेत्र में सेना की लॉजिस्टिक जरूरतों का बड़ा केंद्र है। यहाँ से सैनिकों की आवाजाही, हथियारों और गोला-बारूद का भंडारण, उपकरणों की देखरेख और सैन्य आपूर्ति का काम होता है।
किशनगंज फॉरवर्ड बेस (बिहार): यह बेस कॉरिडोर के पश्चिमी हिस्से की सुरक्षा करता है और जरूरत पड़ने पर उत्तर-पूर्व की ओर जाने वाली सेना को तेजी से सहायता पहुँचाने में मदद करता है।
चोपड़ा फॉरवर्ड बेस (पश्चिम बंगाल): अंतरराष्ट्रीय सीमा के करीब स्थित यह बेस सिलीगुड़ी कॉरिडोर के सबसे संकरे हिस्से पर नजर रखता है। इससे किसी भी आपात स्थिति में सेना की प्रतिक्रिया का समय काफी कम हो जाता है।
ये तीनों सैन्य ठिकाने सीमा सुरक्षा बल (BSF) के साथ मिलकर निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने, लॉजिस्टिक सपोर्ट और सैनिकों की तेज तैनाती का मजबूत नेटवर्क तैयार करते हैं।
बांग्लादेश सीमा पर भी बढ़ाई गई चौकसी
सेना का कहना है कि बांग्लादेश में हुए राजनीतिक बदलाव और क्षेत्रीय सुरक्षा हालात को देखते हुए भारत ने अपनी पूर्वी सीमा पर भी निगरानी बढ़ाई है। भारत-बांग्लादेश सीमा पर आधुनिक सर्विलांस सिस्टम लगाए गए हैं और जरूरत पड़ने पर सेना की तेजी से तैनाती की व्यवस्था की गई है।
इसमें चोपड़ा फॉरवर्ड बेस की भूमिका काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यह किसी भी संभावित खतरे का पहले से पता लगाने और तत्काल जवाबी कार्रवाई करने में मदद करता है।
चीन पर भी बनी हुई है नजर
भारत की रणनीतिक तैयारी सिर्फ बांग्लादेश सीमा तक सीमित नहीं है। सेना की सबसे बड़ी नजर अब भी चीन के चुंबी वैली क्षेत्र पर बनी हुई है। यह इलाका भूटान और सिक्किम के बीच स्थित है और सिलीगुड़ी कॉरिडोर के काफी करीब होने के कारण हमेशा से रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जाता है।
इस क्षेत्र में भारत की त्रिशक्ति कोर को आधुनिक हथियारों से मजबूत किया गया है। इसमें S-400 एयर डिफेंस सिस्टम, ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल रेजिमेंट और हासीमारा एयरफोर्स स्टेशन से उड़ान भरने वाले राफेल लड़ाकू विमान शामिल हैं। सेना का मानना है कि इन क्षमताओं से पूर्वी मोर्चे पर भारत की जवाबी कार्रवाई और भी मजबूत हुई है।
सड़क, रेल और वैकल्पिक रास्तों पर भी बड़ा निवेश
भारतीय सेना का मानना है कि आज के समय में सिर्फ हथियार ही नहीं, बल्कि मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर भी राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम हिस्सा है। इसी वजह से सरकार ने इस पूरे क्षेत्र में कई बड़े प्रोजेक्ट शुरू किए हैं।
इनमें तीन नए सैन्य ठिकानों का विकास, सीमा तक जाने वाले रणनीतिक हाईवे का विस्तार, रेलवे नेटवर्क का आधुनिकीकरण, युद्ध के समय उपयोगी बनने वाली प्रस्तावित भूमिगत रेल परियोजनाएँ, सड़क चौड़ीकरण के लिए भूमि अधिग्रहण और सीमा क्षेत्र में नई कनेक्टिविटी शामिल है।
इसके अलावा म्यांमार के रास्ते कलादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट पर भी काम किया जा रहा है, ताकि उत्तर-पूर्व तक पहुँचने के लिए सिर्फ सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर निर्भरता कम हो सके।
अब कमजोरी नहीं, भारत की रणनीतिक ताकत
सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि अब सिलीगुड़ी कॉरिडोर को केवल भारत की कमजोरी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। पिछले कुछ वर्षों में स्थायी सैन्य तैनाती, आधुनिक हथियार, मजबूत निगरानी प्रणाली, बेहतर सड़क और रेल नेटवर्क तथा वैकल्पिक सप्लाई रूट्स ने इस पूरे इलाके की तस्वीर बदल दी है।
इसी बदलाव को देखते हुए भारतीय सेना अब इसे ‘चिकन नेक’ नहीं बल्कि ‘एलिफेंट्स ट्रंक’ यानी हाथी की सूंड कह रही है। सेना के मुताबिक यह नया नाम इस बात का प्रतीक है कि यह कॉरिडोर अब सिर्फ बचाव का रास्ता नहीं, बल्कि भारत की मजबूत रणनीतिक क्षमता और दुश्मन को प्रभावी जवाब देने की ताकत का भी प्रतीक बन चुका है।

