आंध्र प्रदेश के भोगपुरम एयरपोर्ट पर एक बहुत ही शानदार नजारा देखने को मिला है। यहाँ अल्लूरी सीताराम राजू इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर शुक्रवार (31 जुलाई) को एक बड़ा रिकॉर्ड बना है। ITDA के पाडेरु, सीथम्पेटा, पार्वतीपुरम और रामपाचोदवरम क्षेत्रों की 13,000 जनजातीय बच्चियों ने एक साथ धीमसा डांस किया। ये सभी बच्चियाँ आठवीं, नौवीं और दसवीं कक्षा में पढ़ती हैं।
यह शानदार प्रदर्शन सीधे तौर पर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज हो गया है। इस ऐतिहासिक कार्यक्रम का आयोजन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शनिवार (1 अगस्त) को होने वाले दौरे से ठीक पहले किया गया था। इस कार्यक्रम में शामिल सभी 13,000 बच्चियों ने एक जैसी पारंपरिक गुलाबी साड़ियाँ पहनी थीं। इन साड़ियों पर हरे रंग का बॉर्डर और हरा ब्लाउज था, जिससे यह रूप बेहद सुंदर लग रहा था।
सभी नर्तकियों को 433 गोल घेरों में बाँटा गया था और हर घेरे में 50 बच्चियाँ थीं। इतने बड़े पैमाने पर होने के बाद भी सभी ने बहुत ही शानदार तालमेल के साथ डांस किया। लंदन से विशेष रूप से आए गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के प्रतिनिधियों ने इस लाइव प्रदर्शन को देखा। इसके बाद उन्होंने आधिकारिक तौर पर जनजातीय कल्याण मंत्री गुम्गाडी संध्या रानी को विश्व रिकॉर्ड का प्रमाण पत्र सौंपा।
PM मोदी ने की तारीफ
इस बड़ी सफलता पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी खुशी जाहिर की है। उन्होंने सभी नर्तकियों की जमकर तारीफ की और कहा कि यह धीमसा डांस का प्रदर्शन किसी जादू से कम नहीं है। पीएम मोदी ने भारत की पुरानी संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी बचाने के लिए सभी बच्चियों और अधिकारियों का धन्यवाद किया। जनजातीय कल्याण प्रमुख सचिव एमएम नायक ने भी इसे एक ऐतिहासिक पल बताया।
यह आयोजन केवल एक डांस नहीं था बल्कि आंध्र प्रदेश की संस्कृति का बहुत बड़ा उत्सव था। इसमें जनजातीय जीवन और उनकी ऊर्जावान जीवनशैली की एक बहुत ही सुंदर झलक देखने को मिली।
This Dhimsa Dance performance is pure Magic!
— MyGovIndia (@mygovindia) August 1, 2026
To celebrate the launch of major development projects in Andhra Pradesh, over 13,000 tribal women and young girls gathered to showcase their rich heritage, creating a historic record with a Dhimsa Dance performance. Commending their… pic.twitter.com/8CxqIKJIlZ
क्या है पारंपरिक धीमसा डांस और इसकी खास बातें
धीमसा डांस आंध्र प्रदेश के पूर्वी घाट क्षेत्रों की जनजातियों का एक बहुत ही प्रसिद्ध पारंपरिक नृत्य है। इसे बागाता, वाल्मीकि, पोराजा, कोंड, गदबा, कोंडाडोरा, मुकाडोरा और कोटिया जैसी जातियों के लोग मिलकर करते हैं। इस नृत्य का मूल उद्गम ओडिशा का कोरापुट क्षेत्र है जो गोंड जनजाति का घर माना जाता है। यह डांस मुख्य रूप से त्योहारों, शादियों और अप्रैल के शिकार उत्सव के दौरान किया जाता है जहाँ सब लोग मिलकर नाचते हैं।
इस नृत्य की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें चेहरे के हाव-भाव की जरूरत नहीं होती है। इसमें सारा ध्यान हाथों और पैरों की तेज चाल पर होता है। यह डांस 15 से 20 महिलाओं के समूह द्वारा पारंपरिक साड़ियों में किया जाता है। यह ढोल, मोरी और डप्पू जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप पर होता है और इसके कुल 12 अलग-अलग प्रकार होते हैं।
अल्लूरी सीताराम राजू जिले की अराकू और पाडेरु क्षेत्र अपनी आदिवासी संस्कृति और जल-जंगल-जमीन के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। यहाँ आने वाले पर्यटक इस अनूठे संगम का पूरा आनंद लेते हैं। अराकू ट्राइबल म्यूजियम इस संस्कृति का मुख्य केंद्र है। यहाँ 17 से अधिक जनजातियों के रहन-सहन, पुराने हथियार, बर्तन और कलाकृतियों को बहुत ही सुंदर तरीके से दिखाया गया है।
इस क्षेत्र में हर साल जनवरी-फरवरी में मशहूर ‘अराकू चली उत्सव’ होता है जिसमें लोक कला और फैशन शो होते हैं। अप्रैल में ‘इतीका पोंगल’ और देशी बीज उत्सव मनाए जाते हैं जहाँ किसान बीजों का आदान-प्रदान करते हैं। यहाँ मिलने वाली ‘बांबू चिकन’ और जैविक मिलेट्स (श्रीअन्न) पर्यटकों के बीच बहुत पसंद किए जाते हैं। ये चीजें इस क्षेत्र की लोक संस्कृति को और भी ज्यादा खास बनाती हैं।

