Gen Z यानी स्क्रीन की दुनिया में पलती पीढ़ी जिसके लिए वीडियो, फ्रैंड चैटिंग, ओटीटी, कुछ खास तरह के रियलिटी शो, स्टेंडअप कॉमेडी लुभाते हैं। इसका असर यह है कि Gen Z अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल धड़ल्ले से करने लगे हैं। पेपर लीक मुद्दे पर जंतर मंतर पर हुए आंदोलन में भी यह दिखा। ये पीढ़ी आगे चल कर सांसद, विधायक, मंत्री भी बनेगी। क्या ऐसी भाषा ही ‘आम’ बन जाएगी।
पिछले कुछ वर्षों में तकनीक ने इंसानी व्यवहार को जिस तेजी से बदला है, शायद ही इतिहास में ऐसा पहले कभी हुआ हो। आज स्थिति यह है कि बड़ी संख्या में लोग अपने परिवार, दोस्तों या पड़ोसियों की तुलना में मोबाइल, सोशल मीडिया और एआई चैटबॉट्स से अधिक संवाद कर रहे हैं।
यह बदलाव केवल संचार का नहीं, बल्कि समाज में पहचान, लोकप्रियता, आत्मसम्मान और सफलता की परिभाषा का भी है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि यह परिवर्तन विशेष रूप से Gen Z यानी लगभग 1997–2012 के बीच जन्मी पीढ़ी में सबसे अधिक दिखाई देता है।
इंसानों से ज्यादा मशीनों से संवाद
पहले बच्चे स्कूल से लौटकर परिवार, पड़ोस और दोस्तों के साथ समय बिताते थे। आज कई युवाओं के दिन की शुरुआत और अंत स्मार्टफोन से होता है। बातचीत सोशल मीडिया चैट, एआई चैटबॉट और ऑनलाइन गेमिंग पर हो रही है। हर Gen Z के साथ ऐसा नहीं है कि उनके साथ घर पर बात करने वाले परिजन मौजूद नहीं है। बल्कि परिजनों से बात न कर, घर के किसी कोने में अपने स्मार्ट फोन या टैब, लैपटॉप के साथ ये बिजी हैं।
घर में कौन आया, कौन गया या किसी अहम बातों से इन्हें मतलब नहीं। बस दोस्त, चैटिंग और ऑनलाइन गेम ही इनकी दुनिया है। आज के भागदौड़ भरी दुनिया में एकल फेमिली में माता पिता जॉब कर रहे होते हैं तो Gen Z अकेले भी पड़ जाते हैं। अकेलापन होने पर भी इंसान के बजाय मशीन से बात करना आसान लगने लगता है। कोई हो या न हो, एआई हमेशा उपलब्ध है, इसलिए कई युवा उससे भावनात्मक बातचीत भी करने लगे हैं।
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि इससे तत्काल राहत मिल सकती है, लेकिन यदि वास्तविक सामाजिक रिश्ते कमजोर पड़ने लगें तो लंबे समय में भावनात्मक विकास प्रभावित होता है।
क्या एक बार फिर गुरुकुल की जरूरत बच्चों को है
प्राचीन काल में बच्चों को शुरुआती लालन-पालन के बाद शिक्षा-दीक्षा के लिए गुरु के पास भेज दिया जाता था। यहाँ वे नैतिक मूल्यों से लेकर तमाम तरह की शिक्षा ग्रहण करते थे। हमारे रामायण महाभारत काल में भी गुरुकुल की महत्ता बताई गई है।
कौरव और पांडव के गुरु द्रोणाचार्य थे, जिनके सबसे प्रिय शिष्य अर्जुन हुए, क्योंकि उन्होंने गुरु के ज्ञान को सबसे ज्यादा मेहनत कर अमली जामा पहनाया। वे सबसे अच्छे तीरंदाज बने। वैसे ही उनके बेटे अभिमन्यु के गुरु स्वयं श्रीकृष्ण थे। उन्होंने काफी कम उम्र में ही अपनी वीरता का लोहा मनवाया।
आगे के दौर में संयुक्त परिवार में बच्चों को नैतिक मूल्यों की शिक्षा मिलती थी। उस पर न सिर्फ माता-पिता बल्कि पूरे परिवार और समाज की नजर होती थी। धीरे-धीरे ये दौर भी पीछे छूट गया और अब एकल फैमिली में घर की जिम्मेदारियों के साथ-साथ बच्चों को संभालने की जिम्मेदारी भी अहम है। समाज का रोल बदल गया है।
अब कोई किसी बच्चे को प्रोत्साहित नहीं करता और न ही गलत करने पर डाँटता है। हर घर खुद में सिमट कर रह गए हैं। बच्चों में स्मार्ट फोन और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की आदत खुद ब खुद नहीं पड़ी है। बच्चों को पेरेंट्स ने ही दिया है।
कई बार अपने काम में बिजी पेरेंट्स छोटे से बच्चे को मोबाइल में राइम्स सुनने के लिए दे देते हैं। धीरे धीरे बच्चा राइम्स से छोटे मोटे गेम्स खेलने लगता है और फिर मोबाइल को छोड़ना नहीं चाहता। ये लत ऐसी लगती है कि स्कूल कॉलेज तक बच्चा ऑनलाइन और ऑफलाइन वीडियो गेम, चैटिंग, ओटीटी तक पहुँच जाता है।
राजेन्द्र विद्यालय जमशेदपुर के क्लास 10 में पढ़ने वाले बच्चे आयुष की माँ बबीता सिंह का कहना है कि उन्होंने थक हार कर बच्चे को अब बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया है। उनका बच्चा पढ़ने में काफी अच्छा रहा है। वह फुटबॉल भी काफी अच्छा खेलता है, लेकिन जब से वीडियो गेम की आदत लगी, उसका रिजल्ट खराब होने लगा। वह रात-रात भर मोबाइल में लगा रहता था। वह काफी गुस्सैल हो गया था। उसकी भाषा खराब हो गई थी।
अब ऐसे बोर्डिंग स्कूल में डाल दिया है, जहाँ मोबाइल बच्चों के लिए बैन है। उनका मानना है कि बच्चों के लिए फिर से गुरुकुल की आवश्यकता है। आज के दौर में बच्चों को संभालना काफी मुश्किल है क्योंकि इंटरनेट उनकी रेंज में है और मोबाइल का अच्छा और बुरा दोनों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
शिक्षा का बाजारीकरण
स्कूल ही बच्चों की पर्सनालिटी निर्माण का आधार होते हैं। लेकिन आज सरकारी स्कूलों का स्तर निम्नतम हो गया है। प्राइवेट स्कूल पैसे कमाने का धँधा बन गए हैं। स्कूलों की फीस देना निम्न और मध्यम वर्ग की जेब पर भारी है। आँकड़े बताते हैं कि माध्यमिक स्तर (9वीं और 10वीं कक्षा) पर स्कूल छोड़ने की दर करीब 11.5% तक पहुँच जाती है।
शिक्षा मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक, 14 से 18 वर्ष की आयु के 2 करोड़ से अधिक बच्चे स्कूल से बाहर हैं और कक्षा 1 में प्रवेश लेने वाले 100 बच्चों में से केवल 62 बच्चे ही कक्षा 12 तक पहुँच पाते हैं। ऐसे में ये Gen Z कहाँ जाएँगे और क्या करेंगे। जाहिर है इनकी भाषा भी भद्दी होती है और ये भीड़ का हिस्सा बन कर रह जाते हैं।
इनके अलावा जो सरकारी स्कूलों का हाल है, वहाँ पढ़ने वाले बच्चों के स्तर को देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता है। न तो शिक्षक को बच्चों से मतलब है और न ही बच्चों को पढ़ने से। कोई पढ़ाई का माहौल नहीं और न ही खेलकूद की सुविधा। ऐसे में जो यहाँ से निकलते हैं उनमें विरले ही जीवन में सफलता हासिल कर पाते हैं।
प्राइवेट स्कूलों का हाल ये है कि ये मात्र कमाई का अड्डा बन गए हैं। कुछ जाने माने स्कूलों को छोड़ दे तो बाकी स्कूलों में शिक्षकों का स्तर काफी कम है। दरअसल उन्हें वेतन के नाम पर न्यूनतम पैसे दिए जाते हैं। जब टीचर अपने दाल-चावल की हिसाब लगाता रहेगा, तो पढ़ाएगा क्या। उसका ध्यान बच्चों को पढ़ाने पर कैसे टिकी रहेगी। नतीजा स्कूलों का गिरता स्तर। इतना ही नहीं स्कूलों में अब जीवन मूल्यों को पढ़ाया नहीं जाता, सिर्फ ‘रोबॉटिक बच्चे’ बनाए जा रहे हैं। इन्हें सामाजिक मूल्यों की परवाह नहीं।
दिल्ली विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक प्रोफेसर नवीन सिंह का मानना है कि वैल्यू सिस्टम में गिरावट का दौर है ये। पहले विरोध प्रदर्शन के दौरान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सकारात्मक रुख देखने को मिलता था। भूख हड़ताल, अनशन, बैनर और पोस्टर में माँगें होती थी। कोई गाली गलौज नहीं होता था।
पर्सनल अटैक की भी सीमाएँ थी, लेकिन अब वैल्यू सिस्टम दरकता हुआ दिख रहा है। दिल्ली के जंतर मंतर पर हुआ छात्रों के धरना प्रदर्शन में रचनात्मकता के नाम पर भद्दी भद्दी गालियाँ और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल इंटरटेनंमेंट और हताशा दोनों का मिक्चर था। यहाँ तक कि सोशल अवेयनेंस की भी कमी थी।
उनका कहना है कि छात्रों ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को मुख्य मुद्दा बनाया, लेकिन कहीं भी शिक्षा व्यवस्था में सुधार की बात नहीं की। कहीं भी शिक्षा के बाजारीकरण पर कोई वक्तव्य नहीं दिया। शिक्षा के निजीकरण और कोचिंग संस्थानों पर कोई बात नहीं कही। नीट पेपर लीक 2026 में भी आरोपित केमिस्ट्री का टीचर कोचिंग संस्थान ही चला रहा था। अपने कोचिंग के बच्चों को उसने पेपर सॉल्व करवाए थे।
अब सवाल उठता है कि आखिर स्कूलों में पढ़ने के बावजूद बच्चों को कोचिंग क्यों जाना पड़ता है। क्यों परीक्षा पास करने के कोचिंग संस्थानों में सिखाए जा रहे टिप्स बच्चों के लिए जरूरी हैं? स्कूलों की पढ़ाई का स्तर इतना निम्न क्यों है, इस पर छात्र नेताओं का ध्यान क्यों नहीं था। दरअसल ये जमीन की समस्याओं से पैदा हुआ जेन जी आंदोलन नहीं था। अमेरिका में बैठे अभिजीत दिपके कॉकरोच जनता पार्टी बनाते हैं और सोशल मीडिया पर शिक्षा मंत्री के नीट पेपर लीक पर इस्तीफा माँगते हैं। यह आंदोलन बस इतने तक ही सीमित रहा।
मेहनती और फोकस Gen Z की भी कमी नहीं
इसका मतलब ये हरगिज नहीं है कि सभी Gen Z अपना वक्त बर्बाद कर रहे हैं। कम उम्र में बड़ी सफलता पाना भी उनका लक्ष्य है। यही वजह है कि हर परीक्षा में इतनी ज्यादा प्रतियोगिता है। NEET की ही बात कर लें, तो हर साल सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन का कट ऑफ हाई होता जा रहा है। बच्चे जी जान से सालों तैयारी करते हैं। उनका हर मिनट का हिसाब होता है। यानी Gen Z अगर ठान लें, तो आसमान में भी सुराख कर दें।
हाल में जंतर मंतर पर प्रदर्शन के दौरान भी उन्होंने इसे साबित किया है। लेकिन आंदोलन की सफलता के बाद उनकी पार्टी पर भी सवाल उठे हैं। क्या NEET परीक्षा को लेकर आत्महत्या करने वाले परीक्षार्थियों के प्रति ‘प्रेम’ सिर्फ उनकी माँग का एक हिस्सा भर था, जिसे पूरी होते ही ये पार्टियों में बिजी हो गए।
नेपाल में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लड़ते हुए सत्ता को उखाड़ फेंका। हालाँकि इनके तरीके पर सवाल हो सकता है। हिंसा और आगजनी करना और अराजकता फैलाने की इजाजत किसी को भी नहीं दी जा सकती, लेकिन इनकी सामाजिक मर्यादा की परिभाषा ही अलग है। गालियों में बातें करना, मीम्स और दूसरे तरीके इन्हें आते हैं। ये इसे सामान्य मानते हैं।
आज ‘वायरल’ होना कई युवाओं के लिए ‘सफल’ होने का पर्याय बन गया है। इसका प्रभाव यह है कि कई बार वास्तविक उपलब्धियों की तुलना में डिजिटल लोकप्रियता अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देने लगती है। पहले समाज सर्टिफिकेट देता था, अब एल्गोरिद्म। एक समय था जब किसी व्यक्ति की पहचान उसके शिक्षक, पड़ोसी, गाँव या समाज तय करते थे।
आज यह भूमिका काफी हद तक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के एल्गोरिद्म निभा रहे हैं। वीडियो वायरल हुआ या ज्यादा व्यू मिले तो आप सफल, वरना असफल। एक तरह से कहा जाए, तो डिजिटल पहचान और वास्तविक व्यक्तित्व की जंग छिड़ जाती है। वास्तविकता से अलग हट कर डिजिटल व्यक्तित्व उसे दूसरी ही दुनिया में ले जाते हैं। जहाँ खुद को वह जैसा चाहता है, फटाफट बना लेता है।
मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर
यह मानसिकता युवाओं के आत्मविश्वास को भी प्रभावित करती है। सोशल मीडिया और एआई से उनका भावनात्मक जुड़ाव समाज को एक अलग दिशा की ओर ले जा रहा है। स्क्रीन टाइम ज्यादा होने से मानसिक और शारीरिक असर भी पड़ रहा है।
गाजियाबाद के मशहूर ऑर्थोपेडिक डॉक्टर आशुतोष झा के मुताबिक, स्क्रीन टाइम अधिक होने से उनके मानसिक विकास पर असर पडता है। जल्दी थकावट होती है और जिस वजह से स्क्रीन टाइम लंबा चला है उस पर उनका दिमाग सोचता रहता है। इससे बाकी चीजें पीछे छूट जाती हैं। शरीर पर भी स्क्रीम टाइम पर बुरा असर पड़ता है।
आम तौर पर मोबाइल देखते वक्त आप नीचे देखते हैं। आँख के बराबर में मोबाइल नहीं होता। इससे गर्दन को छुकने की आदत पड़ जाती है। धीरे धीरे शरीर का पॉस्चर खराब हो जाता है। रीढ़ की हड्डियाँ टेढ़ी होने लगती है। क्योंकि जेन जी शारीरिक विकास के दौर से गुजर रहे होते हैं। ऐसे में शारीरिक बनावट पर भी ये असर डालता है।
कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि Gen Z भी समाज का हिस्सा हैं। समाज में होने वाली गिरावट का असर उन पर भी पड़ा है। लेकिन ये उम्र कुछ ठानने और करने की है। वह सकारात्मक भी हो सकता है और नकारात्मक भी। Gen Z न तो केवल ‘मोबाइल में खोई हुई पीढ़ी’ है और न ही ‘सबसे प्रतिभाशाली पीढ़ी’। यह ऐसी पीढ़ी है जो अभूतपूर्व डिजिटल अवसरों और नई मनोवैज्ञानिक चुनौतियों—दोनों के बीच बड़ी हुई है।
लोकप्रियता का पैमाना अब समाज से अधिक एल्गोरिद्म तय कर रहे हैं, और वास्तविक पहचान कई बार डिजिटल पहचान से प्रतिस्पर्धा कर रही है, इसलिए भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती तकनीक को छोड़ना नहीं, बल्कि उसके साथ स्वस्थ संतुलन बनाना है। परिवार, स्कूल, समाज, नीति-निर्माता और तकनीकी कंपनियाँ यदि मिलकर डिजिटल साक्षरता, आलोचनात्मक सोच और वास्तविक मानवीय संवाद को बढ़ावा दें, तो यही पीढ़ी भारत के लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था और समाज को नई दिशा देने की क्षमता रखती है।


