दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन के दौरान 26 दिनों की भूख हड़ताल करके राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरने वाले सोनम वांगचुक ने कहा है कि वे चाहते थे कि विपक्ष के नेता राहुल गाँधी उनकी भूख हड़ताल तुड़वाएँ। वांगचुक ने बताया कि उनकी पत्नी गीतांजलि अंगमो ने राहुल गाँधी से अनशन तुड़वाने को लेकर बातचीत की थी। हालाँकि, कॉन्ग्रेस नेता ने कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी।
‘इंडिया टुडे’ से बात करते हुए सोनम वांगचुक ने कहा, “दरअसल, हम विपक्ष के नेता राहुल गाँधी के माध्यम से अपना अनशन तुड़वाने पर विचार कर रहे थे और गीतांजलि इस पर काम कर रही थीं। वह राहुल गाँधी के खिलाफ नहीं थीं। वह इस पर कड़ी मेहनत कर रही थीं कि क्या राहुल गाँधी मेरा अनशन तुड़वा सकते हैं। हालाँकि, उन्हें सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली।”
BIG REVEAL BY SONAM WANGCHUK
— Megh Updates 🚨™ (@MeghUpdates) August 5, 2026
Sonam Wangchuk says he wanted Rahul Gandhi to personally end his hunger strike. His wife, Gitanjali, also tried to make it happen, but they received no positive response.
According to Wangchuk, that is why Gitanjali later criticized Rahul Gandhi.… pic.twitter.com/OWFbmHLYQh
लद्दाख के एक्टिविस्ट वांगचुक ने कहा कि राहुल गाँधी को अपना अनशन खत्म करने के लिए मनाने की कोशिशों को लेकर उनकी बेरुखी का यह किस्सा बताना जरूरी है। और ऐसा इसलिए क्योंकि बाद में कॉन्ग्रेस नेतृत्व की आलोचना करने पर गीतांजलि आंगमो को कॉन्ग्रेस समर्थकों ने जमकर ट्रोल किया था।
सोनम वांगचुक ने 24 जुलाई 2026 को मेदांता अस्पताल में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह की उपस्थिति में अपनी भूख हड़ताल समाप्त की थी।
क्या वांगचुक चाहते थे कि उनके आंदोलन का सियासी फायदा राहुल गाँधी को मिले?
सोनम वांगचुक लगातार कहते रहे हैं कि उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है और सरकार से जवाबदेही तय करने की माँग को लेकर किया गया उनका अनशन केवल जिम्मेदारी निभाने का एक प्रयास था। हालाँकि, वांगचुक इस बात को लेकर भी चिंतित थे और काफी दिलचस्पी ले रहे थे कि उनका अनशन किस तरह खत्म हो और इसे राजनीतिक तौर पर किस नजरिए से देखा जाए।
वांगचुक ने कहा था कि वह चाहते थे कि उनके अनशन की समाप्ति को सत्ता पक्ष, विपक्ष और छात्र नेताओं से जुड़े लोगों की संयुक्त कोशिश के तौर पर पेश किया जाए।
यह साफ है कि सोनम वांगचुक की उठाई गई माँगों को राहुल गाँधी पूरा नहीं कर सकते थे। तर्क यही कहता है कि वांगचुक का अनशन तभी खत्म हो सकता था जब वह खुद इसे खत्म करने का फैसला लेते, उन्हें जबरन खाना-पानी दिया जाता या सरकार उनकी माँगों पर विचार करने के लिए तैयार होती। न तो कोई छात्र नेता और न ही लोकसभा में विपक्ष के नेता ऐसा कर सकते थे।
सोनम वांगचुक अब जिस ‘संयुक्त प्रयास’ के तौर पर अनशन खत्म होने की बात कर रहे हैं, उससे आगे एक सवाल उठता है कि क्या सोनम वांगचुक CJP-वांगचुक आंदोलन का सियासी फायदा राहुल गाँधी को सौंपना चाहते थे और खुद के लिए एक ऐसी सम्मानजनक विदाई का रास्ता बनाना चाहते थे, जिसमें वह नायक की तरह बाहर निकलते?
सोनम वांगचुक ने एक लद्दाखी परंपरा का भी जिक्र किया था। इसके मुताबिक, जो व्यक्ति किसी को पानी, जूस या सूप देता है या औपचारिक तौर पर अनशन तुड़वाता है, वह उस फैसले की स्वीकृति, नैतिक समर्थन या उसके नतीजे की साझा जिम्मेदारी का संकेत देता है।
सोनम वांगचुक के साथ क्रेडिट बाँटने के बजाय आंदोलन की राजनीतिक बढ़त हथियाने की कोशिश में रहे राहुल
सोनम वांगचुक शायद अपने अनशन को खत्म करने के लिए ऐसा रास्ता चाहते थे, जिसमें सरकार, विपक्ष और दूसरे पक्षों की साझा सहमति दिखे। लेकिन राहुल गाँधी जैसे नेता के लिए यह तस्वीर बहुत फायदेमंद नहीं होती क्योंकि उनकी राजनीतिक पहचान मुख्य विपक्षी चेहरे के तौर पर बनी हुई है।
शायद यही वजह है कि राहुल गाँधी ने गीतांजलि आंगमो की उस कोशिश पर सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी जिसमें वह उनसे सोनम वांगचुक का अनशन खत्म करवाने की अपील कर रही थीं। इसके बजाय राहुल गाँधी ने सही समय देखकर अलग से एक और आंदोलन का रास्ता चुना।
सोनम वांगचुक ने 28 जून 2026 को NEET पेपर लीक के मुद्दे पर भूख हड़ताल शुरू की थी। कई दिन बीत गए लेकिन ऑनलाइन बयानबाजी के अलावा उन्हें किसी बड़े राजनीतिक दल का खास समर्थन नहीं मिला। संसद का मानसून सत्र करीब आने के बाद ही विपक्ष के प्रमुख नेताओं का जंतर-मंतर पहुँचना शुरु हुआ। इनमें सपा की डिंपल यादव, आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आजाद और AAP के अरविंद केजरीवाल शामिल थे।
राहुल गाँधी का चुनावी प्रदर्शन लगातार निराशाजनक रहा है। इसके बावजूद वह और उनकी पार्टी ऐसे मुद्दों की तलाश करते रहते हैं जिनके सहारे कोई चमत्कार हो और राहुल गाँधी केवल सोशल मीडिया के अभियानों में नहीं बल्कि वास्तव में एक ‘जननायक’ के रूप में स्थापित हो सकें।
हालाँकि, राहुल गाँधी पूरे CJP आंदोलन से दूरी बनाए रहे और उनका समर्थन केवल दिखावे तक सीमित रहा। चल रहे CJP आंदोलन में शामिल होने या उसे खुलकर मजबूत करने के बजाय राहुल गाँधी ने जानबूझकर अलग रास्ता अपनाया। कॉन्ग्रेस ने ‘छात्रों की गूंज’ नाम से छात्र संपर्क अभियान शुरू किया और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की वही माँग अपने मंच से उठाई, जो CJP भी कर रहा था।
CJP के आंदोलन में पूरी तरह शामिल होने के बजाय उससे दूरी बनाए रखने के फैसले को लेकर कॉन्ग्रेस को बीजेपी विरोधी खेमे से भी आलोचना झेलनी पड़ी। 20 जुलाई को जब CJP ने संसद की ओर अपना घोषित ‘चलो संसद’ मार्च शुरू किया, उसी दिन राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस नेताओं ने CJP की माँगों को लेकर अलग से प्रदर्शन किया।
राहुल गाँधी के इस प्रदर्शन का समय भी काफी दिलचस्प था। कॉन्ग्रेस समर्थकों का कहना है कि गाँधी ने संसद का सत्र शुरू होने का इंतजार किया ताकि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को और तेज किया जा सके। लेकिन कॉन्ग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के बाहर प्रदर्शन किया।
अगर कॉन्ग्रेस को सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी के घर के बाहर प्रदर्शन करना था, तो वह यह बहुत पहले भी कर सकती थी। लेकिन ऐसा लगता है कि कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी ने पहले CJP के आंदोलन के जोर पकड़ने, मोदी सरकार के खिलाफ उसे व्यापक जनसमर्थन मिलने और फिर 20 जुलाई को आंदोलन के चरम पर पहुँचने का इंतजार किया। इसके बाद राजनीतिक बढ़त अपने हाथ में लेने की कोशिश की गई।
प्रदर्शन की जगह का चुनाव भी सोच-समझकर किया गया था। कॉन्ग्रेस CJP के आंदोलन में सहयोगी की भूमिका नहीं निभाना चाहती थी जिसमें समाजवादी पार्टी और बीजेपी विरोधी दूसरे दलों के कार्यकर्ता भी साफ तौर पर शामिल थे।
सोनम वांगचुक के इस खुलासे के बाद कि वह चाहते थे कि राहुल गाँधी उनका अनशन तुड़वाएँ और कॉन्ग्रेस नेता ने कथित तौर पर ऐसा करने से इनकार कर दिया, कई लोगों ने कहा कि गाँधी ने एक बड़ा मौका गँवा दिया। उनके पास CJP-वांगचुक के नेतृत्व वाले उस आंदोलन का स्वाभाविक राजनीतिक चेहरा बनने का मौका था, जिसे युवाओं के बीच व्यापक ध्यान मिल रहा था।
हालाँकि, राहुल गाँधी इस तरह काम नहीं करते। अपने राजनीतिक करियर में राहुल गाँधी कई बार खुद को नए तरीके से पेश करने की कोशिश कर चुके हैं लेकिन इनमें से किसी भी कोशिश में उन्होंने बाहरी ताकतों के सहारे आगे बढ़ना या किसी और के मोदी सरकार विरोधी आंदोलन में सहयोगी की भूमिका निभाना पसंद नहीं किया।
CJP के आंदोलन की राजनीतिक बढ़त अपने हाथ में लेने की राहुल गाँधी की पूरी कोशिश के पीछे मकसद श्रेय बाँटने से बचना था। ऐसा इसलिए क्योंकि आंदोलन इतना बड़ा हो चुका था कि केंद्र सरकार को रियायतें देनी पड़ सकती थीं, भले ही वह CJP के हिंसक सड़क आंदोलन के दबाव के आगे पूरी तरह न झुके।
कॉन्ग्रेस लंबे समय से भारत में नेपाल जैसी हिंसक सत्ता परिवर्तन की स्थिति की इच्छा रखती रही है। शायद यही वजह थी कि जब उसे लगा कि ऐसा सपना सच होने की संभावना बन सकती है, तब वह इस पूरे घटनाक्रम से पूरी तरह बाहर नहीं रहना चाहती थी।
इसे छोटा राजनीतिक अहंकार कहें या राजनीतिक स्वार्थ, कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी अक्सर किसी सरकार विरोधी आंदोलन के बड़ा होने का इंतजार करना और फिर उसकी राजनीतिक बढ़त अपने हाथ में लेना पसंद करते हैं। कॉन्ग्रेस के लिए CJP जैसे संगठन जिसे आम आदमी पार्टी की ‘B-टीम’ बताया गया है द्वारा खड़े किए गए आंदोलन में सहयोगी की भूमिका निभाने का मतलब यह स्वीकार करना होता कि वह युवाओं से जुड़े इस मुद्दे को खुद प्रभावी तरीके से नहीं उठा पाई और अब केवल राजनीतिक फायदा लेने के लिए उसका समर्थन कर रही है।
कॉन्ग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी है और लगातार तीन लोकसभा चुनावों में झटके लगने के बावजूद खुद को BJP के मुख्य विपक्ष के तौर पर पेश करती रही है। ऐसे में उसके लिए यह ‘मुख्य विपक्ष’ का दर्जा खोना बड़ा नुकसान होगा क्योंकि इसके बाद पार्टी के पूरी तरह राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक होने का खतरा बढ़ जाएगा।


