‘छात्रों से कानून के सम्मान की उम्मीद होती है’: कोर्ट ने खारिज की TISS के 2 स्टूडेंट्स की जमानत याचिका, उमर खालिद-शरजील के समर्थन में लगाए थे नारे; 7 को मिली बेल

मुंबई की एक सेशन कोर्ट ने शुक्रवार (7 अगस्त 2026) को टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के दो छात्रों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। दोनों पर अक्टूबर 2025 में दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा की बरसी पर आयोजित सभा में उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई की माँग वाले नारे लगाने का आरोप है।

दोनों छात्र उन 9 लोगों में शामिल हैं, जिनके खिलाफ पुलिस ने मामला दर्ज किया था। अभियोजन ने यह भी आरोप लगाया कि इन दोनों के पास से माओवादी विचारधारा से संबंधित किताबें और अन्य सामग्री बरामद हुई थी। हालाँकि इसी मामले में शामिल सात अन्य छात्रों को अदालत ने अग्रिम जमानत दे दी।

कोर्ट ने कहा कि साईबाबा को श्रद्धांजलि देना अपने आप में गैरकानूनी नहीं था, लेकिन दोनों छात्रों अभिरूप पॉल (32) और कामख्या दास (23) पर लगाए गए अन्य आरोप और उनके पास से मिली सामग्री अग्रिम जमानत देने के खिलाफ जाती है।

क्या है पूरा मामला? साईबाबा की पुण्यतिथि पर TISS में जुटे थे छात्र

मामला 12 अक्टूबर 2025 का है, जब TISS के देओनार कैंपस में शाम करीब 7:30 बजे से 8:30 बजे के बीच लगभग 10-12 छात्रों का एक समूह जुटा था। संस्थान के एसोसिएट डीन की शिकायत के अनुसार, छात्रों ने बिना अनुमति के यह सभा आयोजित की थी।

इस दौरान एक पेड़ पर जीएन साईबाबा की तस्वीरें लगाई गईं और उनकी कविताएँ पढ़ी गईं। यह आयोजन उनकी बरसी पर किया गया था। जीएन साईबाबा दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर थे। उन्हें 2017 में माओवादी संगठन से संबंधों के आरोप में दोषी ठहराया गया था, हालाँकि 2024 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया था।

ट्रॉम्बे पुलिस ने इस मामले में 9 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की थी, जिसे बाद में मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच को ट्रांसफर कर दिया गया। आरोपों के मुताबिक, छात्रों ने सभा के दौरान उमर खालिद और शरजील इमाम को जेल से रिहा करने की माँग वाले नारे भी लगाए।

छात्र होने के नाते कानून का सम्मान करना चाहिए: कोर्ट ने नारे और किताबों पर क्या कहा?

अतिरिक्त सत्र जज वीबी बोहरा ने दोनों छात्रों को अग्रिम जमानत देने से इनकार करते हुए कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि जीएन साईबाबा को लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया गया था और इसलिए उन्हें श्रद्धांजलि देना गैरकानूनी नहीं कहा जा सकता। लेकिन छात्रों की गतिविधियाँ केवल श्रद्धांजलि देने तक सीमित नहीं थीं।

कोर्ट ने कहा कि दोनों पर उमर खालिद और शरजील इमाम की जेल से रिहाई के समर्थन में नारे लगाने का आरोप है, जबकि दोनों पर UAPA के तहत देश के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियों से संबंधित मुकदमा चल रहा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि नारे किसी सार्वजनिक आंदोलन या जुलूस के दौरान नहीं लगाए गए थे।

जज ने कहा कि छात्र होने के नाते आरोपितों से कानून की मर्यादा का सम्मान करने की अपेक्षा की जाती है। इसी आधार पर कोर्ट ने दोनों की अग्रिम जमानत याचिकाएँ खारिज कर दीं।

किताबों और माओवादी सामग्री पर भी कोर्ट ने जताई चिंता

अभियोजन पक्ष की ओर से विशेष लोक अभियोजक शिशिर हिरे ने छात्रों की अग्रिम जमानत का विरोध किया। अभियोजन ने यह भी कहा कि दोनों छात्रों के लैपटॉप और मोबाइल फोन से आपत्तिजनक सामग्री बरामद हुई है। इन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में माओत्से तुंग की Selected Works of Mao Zedong, व्लादिमीर लेनिन की The Right of Nations to Self-Determination, एन रवि की Caste and Revolution, कोबाड घांडी की Fractured Freedom और CPI (Maoist) से जुड़े प्रकाशन डाउनलोड किए गए थे।

अभियोजन ने यह भी दावा किया कि उपकरणों से कुछ जानकारी डिलीट की गई थी। छात्रों के वकील ने तर्क दिया कि केवल किताबें डाउनलोड करना किसी व्यक्ति को माओवादी विचारधारा से जुड़ा साबित नहीं करता, क्योंकि ये किताबें प्रतिबंधित नहीं हैं और खुले तौर पर खरीदी जा सकती हैं।

इस पर कोर्ट ने माना कि केवल माओवादी संगठन द्वारा प्रकाशित किताबों को डाउनलोड करना अपने आप में अपराध नहीं है। हालाँकि कोर्ट ने कहा कि इन किताबों में भारत के विभाजन को उकसाने या उसकी मदद करने वाली विचारधारा का समर्थन करने वाली सामग्री होने की बात सामने आई है।

कोर्ट के अनुसार, इससे प्रथम दृष्टया यह संदेह पैदा होता है कि आरोपित माओवादी सोच या विचारधारा से प्रभावित थे और सभा के जरिए इसे दूसरे छात्रों तक पहुँचाने की कोशिश की गई हो सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपितों के खिलाफ मिले सबूतों को देखने पर उनके आचरण को लेकर संदेह पैदा होता है।

इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने दोनों छात्रों को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। वहीं मामले में शामिल सात अन्य छात्रों को अदालत ने जमानत दे दी। कोर्ट ने पाया कि उनके खिलाफ मुख्य आरोप केवल 12 अक्टूबर 2025 की साईबाबा सभा में शामिल होने का था और उनके पास से कोई आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई थी।