‘लड़की के कपड़ों से बहक गया था साजिद अली’: दिल्ली HC ने यौन उत्पीड़न केस में दलील देने पर वकील को लगाई कड़ी फटकार, कहा- ‘महिलाओं के कपड़े नहीं, लड़कों की सोच सुधारिए’

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 17 साल की पीड़िता के यौन उत्पीड़न मामले में आरोपित साजिद अली को दोषी ठहराया है। निचली अदालत के बरी करने के फैसले पर तीखी टिप्पणी भी की है। कोर्ट ने पीड़िता के जींस पहनने और उसके आचरण पर टिप्पणी करने को लेकर बचाव पक्ष को जमकर फटकारा

कोर्ट का कहना है कि किसी महिला के पहनावे का चुनाव करना उसका निजी मामला है। उस पर न तो समाज और न पड़ोसी, न ही आरोपित और वकील को टीका टिप्पणी करने का हक है। महिला के पहनावे के आधार पर उसके चरित्र को आँकना पूरी तरह निराधार है। यह उसके यौन उत्पीड़न का आधार नहीं बन सकता।

न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा ने इस मामले पर सुनवाई के दौरान इस बात पर हैरानी जताई कि आरोपित को बरी इसलिए निचली अदालत ने कर दिया, क्योंकि पीड़िता और उसकी माँ के खिलाफ शिकायतों की पुलिस ने जाँच नहीं की।

उन्होंने कहा कि यौन उत्पीड़न की शिकार महिला और उसकी माँ का कसूर सिर्फ इतना है कि दोनों माँ बेटी बगैर किसी पुरुष सदस्य के घर पर रहती थी, जींस और पाश्चात्य कपड़े पहनती थी। जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) के दौरान जब बचाव पक्ष ने यह कहा कि पाश्चात्य कपड़े पहन कर लड़कों को भ्रष्ट करना और निर्दोष लड़कों के खिलाफ शिकायत दर्ज करना इनका काम था, तो जस्टिस सुधा दंग रह गईं।

उन्होंने कहा, जींस पहनने वाली महिला लड़कों को बिगाड़ सकती हैं, ये सोच बेहद चिंताजनक है और मानसिकता को दर्शाता है। यह महिलाओं के कपड़े पर कंट्रोल न करें, बल्कि माता-पिता और समाज अपने बच्चों के व्यवहार को नियंत्रित करे, व्यक्तिगत सीमाओं का सम्मान करे और हर इंसान से गरिमापूर्ण व्यवहार करे, इसकी उम्मीद की जाती है।

2014 में साजिद बरी कैसे हुआ?

यहीं मामला दिलचस्प हो जाता है। ट्रायल कोर्ट ने 2014 में साजिद को बरी कर दिया। हाईकोर्ट के सामने अभियोजन की कहानी में कुछ विसंगतियाँ सामने आई थीं और अभियोजन उन कमियों को दूर नहीं कर पाया।

लेकिन हाईकोर्ट ने बाद में पूरे रिकॉर्ड को दोबारा देखने पर पाया कि मामले को देखने का एक दूसरा बेहद गंभीर पहलू भी था- पीड़िता के चरित्र, कपड़ों और उसके सामाजिक व्यवहार को उसके खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश। इसको लेकर हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की।

क्या था मामला

2013 में आरोपित साजिद अली अपने पड़ोस में रहने वाली 17 साल की पीड़िता का पीछा करता था और उसके साथ छेड़छाड़ करता था। उस पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ करता था और उसे गलत तरीके से छूने की कोशिश करता था।

लड़की नाबालिग थी, इसलिए मामले में POCSO Act की धाराएँ भी लगीं। ट्रायल कोर्ट ने साजिद अली के खिलाफ IPC की धारा 354A तथा POCSO Act के तहत आरोप तय किए थे, लेकिन 2014 में अभियोजन पक्ष की कमियों की वजह से आरोपित बरी कर दिया गया।

इसके खिलाफ दिल्ली सरकार ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट में इस बात पर गौर किया कि आरोपित साजिद यह कह रहा है कि चूँकि पीड़िता जींस पहनती है और उसके आचरण ठीक नहीं है इसलिए उस पर दबाव डालने और शारीरिक- मानसिक तौर पर परेशान करने का उसका हक है।

कोर्ट ने इस रवैये की आलोचना करते हुए कहा कि वर्चुअल दुनिया में एंट्री करने वाली महिलाओं को भी अपनी निजता और सुरक्षा का अधिकार होता है।

कोर्ट ने कहा, “यहाँ तक कि एक चरित्रहीन महिला को भी निजता का अधिकार है और कोई भी इसका उल्लंघन नहीं कर सकता। कोई उसका शारीरिक- मानसिक शोषण नहीं कर सकता। यदि उसकी इच्छा के विरुद्ध उसका शारीरिक शोषण किया जाता है तो उसे अपनी रक्षा करने का पूरा अधिकार है। उसे कानूनी सुरक्षा का भी उतना ही अधिकार है।”

महिला के कपड़ों पर बचाव पक्ष के सवाल

दरअसल जिरह के दौरान आरोपित के वकील ने पीड़िता के कपड़ों पर सवाल उठाते हुए उसे चरित्रहीन साबित करने की कोशिश की थी। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ी प्रतिक्रिया दी।

कोर्ट ने कहा कि किसी महिला को यह चुनने का अधिकार है कि वह क्या पहने या न पहने। इससे न तो उसकी गरिमा कम होती है और न ही किसी को अभद्र व्यवहार करने का अधिकार मिल जाता है। महिलाओं के कपड़े पर सवाल कोर्ट में करना ही गलत है। इसके जरिए पीड़िता को दोषी ठहराने की कोशिश ही पूरी तरह निराधार है।

जिरह के दौरान बचाव पक्ष के पीड़िता और आसपास रहने वाले लोगों के धर्म का हवाला देते हुए कपड़ों पर सवाल उठाए थे। इस पर कोर्ट ने जमकर फटकार लगाई और कहा कि यौन उत्पीड़न के मामले में धर्म को घसीटने की कोई जरूरत नहीं है।

कोर्ट ने कहा, ” पीड़िता का धर्म, आसपास रहने वाले लोगों का धर्म और पीड़िता के कपड़ों का इससे कोई मतलब नहीं है। न ही कोई धर्म या रीति रिवाज गैरकानूनी आचरण को उचित ठहरा सकता है और न ही पीड़िता के निजी पसंद पर प्रतिबंध लगा सकता है। इसलिए धर्म और पहनावे को इस मामले में घसीटना पूरी तरह अप्रासंगिक और अनुचित है।”

जिरह का इस्तेमाल महिला को अपमानित करने के लिए नहीं हो सकता

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि कोई वकील अपनी जिरह के दौरान पीड़िता को अपमानित नहीं कर सकता औ न ही गवाहों की गरिमा पर हमला नहीं कर सकता। निचली अदालत पर सवाल खड़े करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे सवाल निचली अदालत को स्वीकार नहीं करना चाहिए था।

कोर्ट ने कहा, “जब भी जिरह अपनी प्रासंगिकता और औचित्य का उल्लंघन करती है और गवाहों, पीड़ित को शर्मिंदा करने के लिए किया जाता है, तो कोर्ट को तुरंत इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए। जिरह की प्रक्रिया को अपमान का हथियार नहीं बनने दिया जा सकता। न ही किसी गवाह की विश्वसनीयता की जाँच के बहाने उसकी गरिमा को कुर्बान किया जा सकता है।”