उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सपा और कॉन्ग्रेस का गठबंधन कागज पर तो बना हुआ है लेकिन सीटों का बँटवारा दोनों के गले में अटक गया है। कॉन्ग्रेस अपनी हिस्सेदारी बड़ी बता रही है। सपा चाहती है कि सीटें उसी हिसाब से बँटें, जिसका जितना चुनावी प्रदर्शन और जमीनी पकड़ है। इसी बीच रविवार को अखिलेश यादव ने एक पोस्ट डाली, जिसे सीधे कॉन्ग्रेस के लिए संदेश माना जा रहा है।
अखिलेश ने एक्स पर लिखा, “मकसद जब साफ हो तो हाथ-में-हाथ होता है, निगाह मंजिल पर हो तो सफर आसान होता है।” आगे उन्होंने कहा कि गठबंधन में किसे कितनी सीटें मिल रही हैं या कौन सी सीट किसके खाते में जा रही है, ये बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात गठबंधन की जीत है। उनके शब्दों में, “बात सीट की नहीं जीत की है।”
पोस्ट ऐसे वक्त आई है, जब दोनों दलों के बीच सीटों पर खींचतान अब पर्दे के पीछे नहीं रही, खुले मंच पर भी दिख रही है। अखिलेश ने कॉन्ग्रेस का नाम नहीं लिया, पर किसे सुनाया गया है, ये समझने के लिए किसी को बहुत दिमाग लगाने की जरूरत नहीं पड़ी।
मक़सद जब साफ़ हो तो हाथ-में-हाथ होता है निगाह मंज़िल पर हो तो सफ़र आसान होता है! बात बड़ी ये नहीं है कि गठबंधन में कितनी सीटें या कौन सी सीट किसके पास जा रही है बात बड़ी ये है कि हम सबको ये सुनिश्चित करना है कि जीत गठबंधन की हो। फिर दोहराते हैं : बात सीट की नहीं जीत की है। ये जीत हमारे गठबंधन के दलों से बढ़कर हम सबकी उस संयुक्त कोशिश की जीत होगी जो इसलिए लगातार संघर्षरत है कि साम्प्रदायिकता फिर कभी सिर न उठा सके और लोकतंत्र-संविधान-आरक्षण पर भाजपाई आंच न आए और देश का सौहार्द फिर से खिलखिलाए, देश की तरक़्क़ी और ख़ुशहाली फिर से मुस्कुराए। जय संविधान-जय हिंदुस्तान!
— Akhilesh Yadav (@yadavakhilesh) October 4, 2026
कॉन्ग्रेस का रुख भी साफ
अखिलेश जहाँ जीत की बात कर रहे हैं, वहीं कॉन्ग्रेस सीटों को लेकर अपने तेवर पहले ही दिखा चुकी है। यूपी कॉन्ग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम कह चुके हैं कि सीटों का बँटवारा बराबरी पर होना चाहिए। उनका कहना है कि पार्टी के पास पूरे प्रदेश की 403 सीटों पर लड़ाने लायक उम्मीदवार हैं और 150 से कम सीटों पर कॉन्ग्रेस मानने वाली नहीं है।
गौतम की माँग 150 पर ही नहीं रुकती। बराबर हिस्सेदारी की बात कॉन्ग्रेस की तरफ से बार-बार आती रही है। रविवार को उन्होंने कहा कि उनको तो 200 सीट चाहिए। जून में भी गौतम ने कहा था कि वे चाहते हैं कि गठबंधन में सपा और कॉन्ग्रेस की हिस्सेदारी बराबर हो। बाद में उन्होंने कॉन्ग्रेस को गठबंधन का ‘बड़ा भाई’ बताते हुए सम्मानजनक सीटें माँगी थीं।
#WATCH | दिल्ली | उत्तर प्रदेश कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 के दौरान सीट शेयरिंग पर कहा, "…आज मैं साफ कर देना चाहता हूं कि कांग्रेस पार्टी देश की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी पार्टी है… कांग्रेस पार्टी ने देश को नई दिशा दी है। आज इस बात से तो कोई इंकार नहीं कर सकता है। सीट शेयरिंग की बात है तो मैं शुरू से कह रहा हूं कि हमें अक्टूबर महीने में ही सीट शेयरिंग का मामला निपटा देना चाहिए ताकि जो भी व्यक्ति चुनाव लड़ रहे हैं उन्हें काम करने का समय मिले… जिन दलों के साथ हमारा INDIA ब्लॉक में गठबंधन है, वे सभी लोग जिम्मेदार हैं। उत्तर प्रदेश में मुख्य तौर पर दो पार्टियां, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी है। दोनों जिम्मेदार हैं, एक-दूसरे का सम्मान भी करते हैं, हमें एक-दूसरे को साथ लेकर भी चलना है… हिस्सेदारी और सम्मान बराबर होना चाहिए। ये मैं शुरू से कह रहा हूं… सीट शेयरिंग की बात आएगी तो हम भारत के संविधान की तरह लचीले हैं। थोड़ा झुकना पड़ा तो झुकेंगे…"
— ANI_HindiNews (@AHindinews) October 4, 2026
सपा का अपना गणित, कॉन्ग्रेस का अपना
झगड़े की जड़ चुनावी गणित में है। रिपोर्टों के मुताबिक सपा 2024 के लोकसभा नतीजों को आधार बनाकर कॉन्ग्रेस को विधानसभा की सीमित सीटें देने का फॉर्मूला सोच रही है। उसका तर्क है कि कॉन्ग्रेस ने 2024 में 17 लोकसभा सीटों पर लड़कर 6 जीती थीं, तो विधानसभा में भी उसी अनुपात से सीटें बननी चाहिए।
कॉन्ग्रेस ने यही गणित सपा की तरफ घुमा दिया है। उसका कहना है कि अगर एक लोकसभा सीट के बदले पाँच विधानसभा सीटें गिनी जाएँ, तो 2024 में सपा की जीती 37 लोकसभा सीटों के हिसाब से उसके हिस्से 185 विधानसभा सीटें आएँगी। सीट बँटवारे को लेकर दोनों पार्टियों के अपने-अपने आँकड़े और माँग ने ही राजनीतिक सिर-फुटव्वल की स्थिति बना दी है।
गठबंधन टिकेगा या सीटों पर बात बिगड़ेगी
अभी दोनों पार्टियाँ खुलकर गठबंधन तोड़ने की बात नहीं कर रहीं। यूपी कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष आराधना मिश्रा ने कहा है कि पार्टी गठबंधन धर्म निभाएगी और 2027 में भाजपा को सत्ता से हटाना उसका लक्ष्य है। अखिलेश यादव की ताजा पोस्ट से भी यही लगता है कि सपा फिलहाल इस पूरी बहस को चुनावी एकता के दायरे में ही रखना चाहती है लेकिन संदेश देते हुए।
अखिलेश के लिए 2027 सिर्फ कॉन्ग्रेस से सीटों का समझौता नहीं है, यूपी की सत्ता में लौटने की लड़ाई है। उधर कॉन्ग्रेस मानती है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद प्रदेश में उसकी हालत पहले से बेहतर हुई है और इसी भरोसे वह ज्यादा सीटें माँग रही है।
इसी वजह से अखिलेश का “बात सीट की नहीं जीत की है” वाला संदेश कॉन्ग्रेस के लिए एक तरह की सियासी नसीहत भी समझा जा रहा है। अब दोनों दल सीटें गिनने में ही उलझे रहते हैं या भाजपा को हराने के लिए कोई ऐसा फॉर्मूला निकालते हैं, जिसमें दोनों की जरूरत पूरी हो जाए, यह आने वाले दिनों में पता चलेगा।

