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मुफ्त इलाज का ढकोसला और महँगे मेडिकल बिल: कहाँ खर्च हो रहा है आम आदमी का पैसा?

भारत सरकार का स्वास्थ्य बजट बढ़कर 3.85 लाख करोड़ रुपये होने के बावजूद, इलाज के कुल खर्च का लगभग आधा हिस्सा आज भी आम जनता को अपनी जेब से ही चुकाना पड़ रहा है।

दिल्ली में बीते 27 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने एक ऐसे मामले पर सुनवाई की जिसने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी। एक दवा डीलर की पत्नी का इलाज एक बड़े प्राइवेट अस्पताल में चल रहा था। जिस कैंसर के इंजेक्शन को डीलर बाजार से खुद 11,000 रुपए में खरीद सकता था, उसे अस्पताल ने बाहर से लाने नहीं दिया और बिल में उसकी कीमत 1.30 लाख रुपए जोड़ दी।

कोर्ट ने सख्त सवाल किया कि इस खुली लूट का क्या औचित्य है और मरीज की जेब से निकला यह पैसा आखिर कहाँ जाता है? सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि जो ग्लूकोज (सेलाइन ड्रिप) रिटेलर को सिर्फ 15 रुपए में मिलती है, उसे अस्पताल के बिल में 250 रुपए का दिखाया जाता है। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि करीब 90 प्रतिशत दवाइयाँ आज भी प्राइस कंट्रोल के दायरे से बाहर हैं और सरकार का हालिया फैसला बहुत छोटे हिस्से को छूता है। प्राइवेट वकीलों ने तर्क दिया कि अस्पताल खुद बुनियादी ढाँचे की कमियों को पूरा करते हैं, जिसे कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि लोगों की जिंदगियाँ कोई कमर्शियल व्यापार नहीं हैं।

केंद्र की तरफ से पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि सरकार नीतियों पर लगातार नजर रखती है। लेकिन कोर्ट ने दो टूक कहा कि 11,000 रुपए के इंजेक्शन का बिल 1.30 लाख रुपए होना कोई आम बात नहीं है, ये लोगों की जिंदगी है कोई व्यापार नहीं। प्राइवेट अस्पतालों की तरफ से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतागी ने तर्क दिया कि देश के सरकारी स्वास्थ्य ढांचे की कमियों को प्राइवेट अस्पताल ही पूरा करते हैं। कोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि अस्पताल दूसरे तरीकों से चल सकते हैं, लेकिन जो संस्थान पहले से बेड, टेस्ट और ऑपरेशन के पैसे ले रहा है, वह दवाइयों पर 100 से 200 गुना मुनाफा नहीं वसूल सकता। लंबी सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया और सभी पक्षों को लिखित दलीलें देने को कहा।

कैंसर की 137 दवाओं पर कीमत तय, फिर भी महँगी दवाएँ बरकरार

कोर्ट में इस बहस से ठीक पहले, 8 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्रालय ने एक बड़ा कदम उठाया। मंत्रालय ने घोषणा की कि सभी गैर-सूचीबद्ध (Non-Scheduled) कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन, रिटेलर प्राइस (PTR) से अधिकतम 30% ज्यादा ही एमआरपी (MRP) तय करने के लिए सीमित किया जाएगा। सरकार का अनुमान है कि इससे कुछ कैंसर दवाओं की कीमतें 70 प्रतिशत तक कम होंगी और देश भर के मरीजों को हर साल करीब 2,500 करोड़ रुपए की सीधी बचत होगी।

यहाँ ‘सूचीबद्ध’ और ‘गैर-सूचीबद्ध’ दवाओं का फर्क समझना जरूरी है। सरकार सूची वाली दवाओं के लिए अधिकतम कीमत (सील प्राइस) तय करती है, लेकिन गैर-सूचीबद्ध दवाओं पर ऐसा कोई नियंत्रण नहीं होता, जिससे कंपनियों और अस्पतालों को मनमाना मुनाफा कमाने का मौका मिलता है। सरकार का यह नया कदम इसी दूसरी श्रेणी के लिए है। फरवरी 2019 में भी एनपीपीए (NPPA) ने ऐसा ही कैप लगाया था। शुरुआती खबरों में 110 दवाओं की बात थी, लेकिन बाद में एनपीपीए की औपचारिक नोटिफिकेशन में कुल 137 गैर-सूचीबद्ध कैंसर दवाओं को शामिल किया गया, जो 9 नवंबर 2026 से पूरे देश में लागू होनी हैं।

एनपीपीए ने 543 कैंसर से जुड़ी दवाओं (अलग-अलग ब्रांड और पैक) के दाम संशोधित किए हैं। कुछ मामलों में कीमतें बहुत ज्यादा कम हुई हैं:-

  • ब्रेस्ट कैंसर की दवा ‘पाल्बोसिक्लिब’ (Palbociclib) के एक पैक की कीमत 40,421 रुपए से घटकर सीधे 2,720 रुपए रह गई।
  • कीमोथैरेपी में इस्तेमाल होने वाली दवा ‘थायोटेडा’ (Thiotepa) के एक वॉयल की कीमत लगभग 80,072 रुपए से घटकर 7,150 रुपए हो गई।
  • दासटिनिब, लेंवाटिनिब और ओलापारिब जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं के दाम भी काफी घटे।

इसके बावजूद कई सबसे महँगी और जीवनरक्षक दवाएँ इस दायरे से बाहर हैं और उनके दाम जस के तस हैं। उदाहरण के लिए, 21 से ज्यादा प्रकार के कैंसर के इलाज में काम आने वाली चर्चित इम्यूनोथेरेपी दवा ‘कीट्रुडा’ (Keytruda) अभी भी 2,16,500 रुपए में बिक रही है। ब्रेस्ट कैंसर की दवा ‘रिबोसिक्लिब’ 24,435 रुपए पर बनी हुई है। टैग्रिसो, टेसेंट्रीक, डारजैलेक्स और इम्फिंज़ी के दाम में भी कोई राहत नहीं मिली है।

मरीजों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन ‘AIDAN’ की कार्यकर्ता मालिनी ऐसोला का कहना है कि एक बड़ा कारण यह है कि सरकार ने उन दवाओं को इस प्राइस कंट्रोल से बाहर रखा है जिन्हें कंपनियाँ ‘पेशेंट असिस्टेंस प्रोग्राम’ (PAPs) के तहत मुफ्त या भारी छूट पर देती हैं। उनका तर्क है कि इससे अस्पतालों और बिचौलियों को बड़ा मुनाफा कमाने का मौका मिल जाता है।

स्वास्थ्य खर्च का सच: एनएसएस (NSS) के 80वें सर्वे की रिपोर्ट

अब तक की बात बड़े प्राइवेट अस्पतालों और कैंसर की महँगी दवाओं की थी, लेकिन देश के ज्यादातर मरीज बुखार, सामान्य संक्रमण, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज जैसी आम समस्याओं से जूझते हैं। उनके लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि ‘मुफ्त इलाज’ का दावा करने वाले सरकारी अस्पतालों में वास्तव में आम आदमी की जेब कितनी हल्की होती है?

इस सवाल का सबसे पुख्ता जवाब नेशनल सैंपल सर्वे (NSS) के 80वें दौर से मिलता है, जिसे MoSPI ने जनवरी से दिसंबर 2025 के बीच 1,39,732 परिवारों पर कराया और जिसके नतीजे 20 अप्रैल 2026 को सार्वजनिक किए गए। यह सर्वे इलाज के कुल खर्चे (OOPME) की सटीक गणना करता है, यानी बीमा या कंपनी से मिलने वाले पैसे को घटाकर मरीज को अपनी जेब से कितना देना पड़ा।

सर्वे के आँकड़े साफ तस्वीर दिखाते हैं:

  • अस्पताल में भर्ती होने का खर्च: प्राइवेट अस्पताल में भर्ती होने पर औसत खर्च सरकारी अस्पताल के मुकाबले करीब साढ़े सात गुना ज्यादा है ( ₹50,508 बनाम ₹6,631)। मीडियन स्तर पर यह अंतर 22 गुना तक है ( ₹24,000 बनाम ₹1,100)।
  • संस्थागत प्रसव (डिलिवरी): सरकारी अस्पतालों में डिलीवरी का औसत खर्च ₹2,299 है, जबकि प्राइवेट में यह औसत उछलकर ₹37,630 हो जाता है। देश में अब लगभग 96.2% डिलीवरी अस्पतालों में होती हैं।
  • ओपीडी (OPD) सेवाएँ: ओपीडी के मामले में सरकारी अस्पतालों में औसत खर्च मात्र ₹289 था और मीडियन शून्य (Zero) था, जिसका मतलब है कि आधे से ज्यादा इलाज सरकारी ओपीडी में पूरी तरह मुफ्त हुआ।

इसके बावजूद सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इतने कम खर्च के बावजूद लोग सरकारी अस्पतालों की तरफ क्यों नहीं जा रहे? रिपोर्ट बताती है कि देश में कुल अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों में से सरकारी अस्पतालों की हिस्सेदारी गिरकर सिर्फ 36.7% रह गई है, जबकि पिछले सर्वे (2017-18) में यह करीब 42% थी। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के विशेषज्ञ ऊम्मेन सी. कुरियन के विश्लेषण के अनुसार, 2025 में गाँवों में 57.9% और शहरों में 64.6% भर्तियां प्राइवेट अस्पतालों में दर्ज की गईं। इसका साफ मतलब है कि आज भी दो में से एक-दो मरीज मजबूरी में प्राइवेट सेक्टर का रुख कर रहे हैं।

सरकारी अस्पतालों की 3 बड़ी कमजोरियाँ: दवा की खिड़की, बंद मशीनें और खाली डॉक्टर कुर्सियाँ

सरकारी अस्पतालों में ‘मुफ्त इलाज’ का वादा तीन मोर्चों पर आकर टूट जाता है-

  1. कागज पर मुफ्त दवा, खिड़की पर खाली हाथ: कायदे से डॉक्टर द्वारा लिखी दवा अस्पताल के स्टोर से मुफ्त मिलनी चाहिए, लेकिन सीएजी (CAG) की ऑडिट रिपोर्ट (उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, राजस्थान) बताती हैं कि सप्लाई चेन टूटने के कारण कई जरूरी दवाएँ महीनों गायब रहती हैं। मजबूरन मरीज को बाहर की दुकान से पूरी एमआरपी पर दवा खरीदनी पड़ती है।
  2. मशीनें हैं पर टेक्नीशियन नहीं: सीटी स्कैन, एमआरआई, एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड जैसी जाँचें मुफ्त होनी थीं, लेकिन ट्रेंड टेक्नीशियन, रेडियोलॉजिस्ट या सही समय पर मेंटेनेंस (AMC) न होने के कारण करोड़ों की मशीनें धूल फाँकती हैं और मरीज को प्राइवेट लैब के चक्कर काटने पड़ते हैं।
  3. खाली पड़ी कुर्सियाँ, स्पेशलिस्ट डॉक्टर कहाँ हैं?: स्वास्थ्य मंत्रालय की ‘हेल्थ डायनामिक्स ऑफ इंडिया’ रिपोर्ट बताती है कि गाँवों के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) में सर्जन, फिजीशियन, स्त्री रोग विशेषज्ञ और बाल रोग विशेषज्ञों की भारी कमी है। मार्च 2023 के आँकड़ों के अनुसार, जितने स्पेशलिस्ट डॉक्टर होने चाहिए थे, उसके मुकाबले करीब 79.9% पद खाली पड़े थे। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान जैसे राज्यों में यह स्थिति और भी खराब है। जब गाँवों में डॉक्टर नहीं होंगे, तो गंभीर मरीजों को जिला मुख्यालय या प्राइवेट नर्सिंग होम भागना ही पड़ेगा।

आयुष्मान भारत (PM-JAY) और छुपे हुए खर्चों का बोझ

आयुष्मान भारत योजना के तहत हर परिवार को साल में 5 लाख तक का कैशलेस इलाज मिलता है और सितंबर 2024 से 70 साल से ऊपर के बुजुर्गों को भी जोड़ा गया है। अगस्त 2026 तक 38,700 से ज्यादा अस्पताल इस योजना से जुड़ चुके हैं।

लेकिन नीति आयोग की एक मूल्यांकन रिपोर्ट (IQVIA कंसल्टिंग द्वारा) के अनुसार, प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराने वाले 65 प्रतिशत लाभार्थियों को भी किसी न किसी रूप में अपनी जेब से पैसे (औसतन ₹53,965) खर्च करने पड़े। पैकेज में एम्बुलेंस का खर्च शामिल नहीं है, और कई बार जरूरी दवाइयाँ व जाँचें अस्पताल में न मिलने के कारण बाहर से करानी पड़ती हैं। इसके अलावा, मरीजों के परिजनों का रहना-खाना, यात्रा और दिहाड़ी का नुकसान भी जेब पर भारी पड़ता है।

स्वास्थ्य का अधिकार पाने का असली रास्ता

नेशनल हेल्थ अकाउंट्स (NHA) के 2022-23 के आँकड़ों के मुताबिक, सरकार का स्वास्थ्य पर खर्च बढ़कर ₹3.85 लाख करोड़ (जीडीपी का 1.43%) हो गया है। इसके चलते इलाज में लोगों की जेब से होने वाला खर्च (OOPME) घटकर 43.4% पर आ गया है। सरकार की हिस्सेदारी भी बढ़कर 43.7% हो गई है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि आज भी इलाज पर होने वाले कुल खर्च में सरकार और जनता (अपनी जेब से) लगभग बराबर यानी 43-43% हिस्सेदार हैं। यानी आधी लागत आज भी परिवार खुद उठा रहे हैं। नेशनल हेल्थ पॉलिसी 2017 का जीडीपी के 2.5% खर्च का लक्ष्य अभी भी दूर है।

जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह इंसानों की जिंदगी है कोई व्यापार नहीं, वैसे ही जब तक जमीनी स्तर पर सरकारी अस्पतालों की कमियों को दूर नहीं किया जाता, डॉक्टरों और दवाओं की पूरी व्यवस्था सुचारू नहीं होती, तब तक ‘मुफ्त इलाज’ का दावा कागजों तक ही सीमित रहेगा।

(यह ओरिजिनल रिपोर्ट Chapter1Mag पर प्रकाशित की गई है। ओरिजिनल स्टोरी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working.

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