Homeरिपोर्टमीडियापहले रघुराम राजम की 'पेचकसबाजी', अब Bloomberg ने iPhone पर फैलाया झूठ: जानें भारत...

पहले रघुराम राजम की ‘पेचकसबाजी’, अब Bloomberg ने iPhone पर फैलाया झूठ: जानें भारत की मैन्युफैक्चरिंग पर कैसे फैलाया जा रहा चीनी प्रोपेगेंडा?

Bloomberg ने अब भारत में iPhone मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को टारगेट करते हुए इस सिस्टम को सिर्फ असेंबली घोषित करने का प्रयास किया है और साथ ही इसे टैक्सपेयर के पैसे का waste बताया है। जानिए क्यों जरूरी है ऐसी स्कीमों में पैसा डालना।

आपने मारुति सुजुकी की 800 (Maruti Suzuki 800) कार तो जरूर देखी होगी। भारत में लाखों फैमिलीज की पहली कार। साल 1983 में लाँच हुई थी। लेकिन आप सोच रहे होंगे ब्लूमबर्ग (Bloomberg) के भारत पर प्रोपेगेंडा की हेडलाइन के साथ आख़िर यहाँ 45 साल पहले की मारुति की बात क्यों हो रही है।

ये इसीलिए हो रही है ताकि इससे समझ आए कि मैन्यूफेक्चरिंग (उत्पादन) कोई एक दिन का खेल नहीं है। जब मारुति की ये गाड़ी भारत में बनना शुरू हुई थी तो क्या आपको पता है कि इसमें सिर्फ़ 3% के आसपास लोकल कंटेंट था। यानी 97% पार्ट्स बाहर से आते थे। भारत से सिर्फ MRF के टायर्स और क्लोराइड इंडिया की बैटरी ली गई थी जो इस कार में लगी थी।

इंजन और ट्रांसमिशन तो काम्प्लेक्स पार्ट्स हैं, शीशे, स्टीयरिंग, सीट्स और लगभग 97% पार्ट्स जापान से ही आए थे और भारत में उन्हें एक साथ जोड़ दिया गया था। अब अगर आज के ब्लूमबर्ग, एंडी मुखर्जी और रघुराम राजन की लैंग्वेज में कहें तो ये ‘पेचकसबाजी‘ होगी।

लेकिन इसके आगे की कहानी आपको जानना जरूरी है। साल 1984 तक भी इस गाड़ी में भारतीय सामान 10% तक नहीं पहुँचा। क्योंकि पार्ट्स भारत में बन ही नहीं पा रहे थे। इसके लिए मारुति को पूरा पार्ट सप्लायर्स का एक इकोसिस्टम बनाना पड़ा। साल 1986 में एक और जापानी कंपनी ने भारत के साथ मिलकर मारुति के लिए अल्टरनेटर बनाना शुरू किए।

अम्बुज सागर और पंकज चंद्रा का साल 2004 का एक पेपर बताता है साल 1988-89 तक मारुति में लोकल कंटेंट 86.2% हो गया। यानी मारुति के आने के 5 सालों में मेजॉरिटी कॉम्पोनेंट भारत में बनने लगे। इसके बाद मार्च 1992 तक Maruti 800 में 94.1% पार्ट्स भारत में बनने लगे। यानी मारुति सूजिकी के भारत आने के बाद मेजॉरिटी पार्ट्स को भारत में बनाने में और मैन्यूफैक्चरिंग को लोकलाइज करने में लगभग 10 साल लगे, वो भी तब जब मारुति 800 कोई बहुत कॉम्पलेक्स मशीन नहीं थी और भारत में गाड़ियाँ बनाने का ठीकठाक इस्कॉसिटम, सरकारी कंपनियों का और इनकंपीटेंट ही सही, लेकिन एक्सिस्ट करता था।

आईफोन बनाने में चीन का शेयर

अब साल 2009 में आइए, इस बार बात भारत की नहीं चीन की। दुनिया के पहले आईफोन चाइना में बने थे। लेकिन साल 2009 में चीन में बनने वाले आइफ़ोन (iPhone) में चीन का लोकल कंटेंट या लोकल वैल्यू एडिशन सिर्फ और सिर्फ 3.6% था।

ADBI की स्टडी बताती है कि तब iPhone की manufacturing cost करीब 179 डॉलर थी। उसमें चीन का assembly वाला हिस्सा सिर्फ 6.50 डॉलर। लेकिन इसके 8 साल बाद यानी साल 2017 में, जब iPhone 10 लान्च हुआ तो उसकी मैन्यूफैक्चरिंग में चीन का शेयर 25% से ज्यादा था।

(फोटो साभार: XING Yuqing Research)

जिंग यूकिंग का पेपर बताता है कि iPhone 10 की मैन्यूफैक्चरिंग कॉस्ट 409 डॉलर थी, जिसमें से लगभग $104 की VLU लोकली चीन से आ रही थी। यानी iPhone 10 तक आते-आते चीन के लोकल सप्लायर बैटरी पैक्स, ग्लास कवर, फोन का फ्रेम, स्पीकर और सर्किट बोर्ड बना रहे थे।

10 वर्षों के इन अंतराल में चीन ने जो बहुत ज्यादा काम्प्लेक्स पार्ट नहीं हैं, वो बनाना सीख लिया था, उसका एक इकोसिस्टम क्रिएट कर लिया था। आज चीन का आईफ़ोन की मैन्युफ़ैक्चरिंग में लोकल शेयर लगभग 30% से ऊपर था। लक्सशेयर (Luxshare), डोंगशन प्रिसिजन (Dongshan Precision) और सनवोडा (Sunwoda) जैसी कंपनियों का एक इकोसिस्टम बन गया था।

आपको ये दोनों कहानियाँ जानकर समझ में आया होगा कि जैसे रोम (ROM) एक दिन में नहीं बना था वैसे ही किसी देश में मैन्यूफैक्चिरंग बेस एक दिन में नहीं बनता। पहले लोग पुर्जे जोड़ना सीखते हैं, फिर बेसिक पुर्जे बनाना सीखते हैं, फिर थोड़े से कॉम्पलेक्स पार्ट्स का इकोसिस्टम डेवल्प होता है, लोग इन्हें प्रिसिजन से बनाना सीखते हैं।

ब्लूमबर्ग ने इंडिया के आईफोन पर फैलाया झूठ

इसके बाद शेयर और ऊपर जाता है। लेकिन आज के समय में दुनिया में ऑलमोस्ट कॉम्पलेक्स मशीनों में 100% लोकलाइजेशन नहीं होता। आज भी चीन में बनने वाले आइफोन का कैमरा सेंसर जापान का सोनी तो उसका प्रोसेसर ताइवान की TSMC बनाती है, डिस्प्ले कोरिया में LG और सैमसंग बनाती है। ऐसी कॉम्पलेक्स ग्लोबल सप्लाई चेन में लोकलाइजेशन काफ़ी टफ होता है।

अब हम ब्लूमबर्ग के लेटेस्ट हिट जॉब पर वापस लौटते है। ब्लूमबर्ग में जो एंडी मुखर्जी ने लिखा है, उसमें तीन-चार मुख्य समस्याएँ बताई गई हैं। पहली समस्या बताई गई है कि भारत में आईफ़ोन की काम्प्लेक्स पार्ट नहीं बनते और यहाँ एसेंबलिंग ही हो रही है।

(फोटो साभार: Bloomberg)

दूसरी समस्या है कि भारत इन आईफोन को बनाने के लिए सब्सिडी दे रहा है जो ठीक नहीं है क्योंकि सब्सिडी के मुक़ाबले रिटर्न नहीं मिल रहे और इस सब्सिडी को देने के लिए टैक्सपेयर का पैसा यूज हो रहा है। तीसरी समस्या आईफोन नहीं बल्कि सेमीकंडक्टर्स का उदाहरण देते हुए बताई गई है और कहा गया है कि यहाँ भी सरकार सब्सिडी दे रही है लेकिन भारत अभी सेमीकंडक्टर बना नहीं रहा बल्कि सिर्फ़ पैकेजिंग और टेस्टिंग ही कर रहा है।

आपको पहली समस्या का आधा पार्ट बताया कि कैसे किसी भी देश में एसेंबलिंग और लो वैल्यू पार्ट्स ही बनते हैं। समस्या के साथ आईफ़ोन जैसी काम्प्लेक्स मशीन में लोकल कंटेंट बढ़ता है। मैंने आपको चीन का उदाहरण दिया कि साल 2009 में जो चीन सिर्फ़ 3% वैल्यू पर था वो कैसे 2017 तक 25% पर पहुँच गया।

अब आते हैं भारत में आईफ़ोन मैन्यूफैक्चरिंग पर। भारत में आइफ़ोन बनना साल 2017 से शुरू हुए थे। तब एप्पल ने यहाँ IPhone SE बनाना शुरू किया था। इसके बाद भारत में ऐपल को लेकर कुछ रूल्स में चेंज हुए, कुछ रियायतें दी गईं, सप्लायर्स Foxconn और pegatron जैसी कम्पनियों को फैसिलिटेट किया गया। साल 2020 में भारत सरकार ने बूस्टर डोज दिया PLI के तौर पर। PLI के अंतर्गत जिन कंपनीज ने भारत में मैन्यूफ़ैचरिंग स्टार्ट की, उन्हें सरकार ने बिलिंग वैल्यू का 4% से 6% की सब्सिडी देने का ऐलान किया। इसका असर हुआ कि साल 2021 में भारत का ग्लोबल आईफ़ोन मैन्यूफैक्चरिंग में शेयर लगभग 2% था वो अब 25% से ऊपर पहुँच रहा है।

अब आते हैं कि इस मैन्युफैक्चरिंग में आखिर लोकल कंटेंट कितना है। ब्लूमबर्ग के पीस में ख़ुद माना गया है कि भारत अब इन फ़ोन्स के केस बनाने से लेकर PCB तक बना रहा है। बैटरी के लिए भी TDK जैसी कंपनियांँ आगे आई हैं। जून 2026 में आई बिजनेस स्टैण्डर्ड की एक रिपोर्ट ने बताया था कि साल 2026 में iPhone का local value addition 12 से 17 प्रतिशत, औसतन 14.5 प्रतिशत था। यानी हम मैसिव मैन्युफैक्चरिंग के चौथे पाँचवे साल में 15% से ऊपर पहुँच रहे हैं। आने वाले सालों में हम चाइना को मैच करने लगेंगे।

स्टिल एंडी मुखर्जी, रघुराम राजन या कोई एक्सपर्ट आपको भारत की आईफ़ोन मैन्युफैक्चरिंग को पेचकसबाजी बताता है तो उसे थोड़ा जमीनी सच्चाई देखने की जरूरत है। अब आते हैं दूसरे पार्ट यानी सब्सिडी पर। देश के रेलवे और आईटी मामलों के मंत्री अश्विनी वैष्णव ने अपने एक ट्वीट में बताया कि भारत ने फ़ोन मैन्यूफैक्चरिंग पर ₹19000 करोड़ की सब्सिडी दी है।

अब ये सब्सिडी पूरी एप्पल को नहीं गई है। अगर हम मान ले कि इसमें से ₹10,000 करोड़ की सब्सिडी भी एप्पल को मिली तो इसमें आख़िर एंडी मुखर्जी और ब्लूमबर्ग को समस्या क्या है? इस ₹10,000 करोड़ ने देश में वो एप्पल इकोसिटम बनाया है, जिसमें 3.5 लाख लोगों को रोजगार मिला है। इसके बदले में हमें वो इकोसिस्टम मिला है, जिससे हम काम्प्लेक्स मैन्युफैक्चरिंग की तरफ़ बढ़ रहे हैं, हमें स्किल्ड लेबरफ़ोर्स मिल रही है।

वैसे यहाँ पर मुझे याद आया कि देश में MGNREGA पर साल 2006 से लेकर 2026 तक 11 लाख करोड़ से ज्यादा खर्च हुए, और इससे हमें कौन सा इकोसिस्टम मिला? कोई नहीं, बल्कि इससे हमें गड्ढे खोदने वाले लोग मिले। लेकिन MGNREGA को ऐसे दिखाया जाता है कि ज्याँ द्रेज ने कुछ क्रांतिकारी ही कर दिया हो।

देश के टैक्सपेयर का पैसा, देश के टैक्सपेयर के अनुसार लगेगा। किसी एंडी मुखर्जी या ब्लूमबर्ग के कहने पर नहीं। और ये पैसा अब देश में मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम डेवल्प करने में लग रहा है। एंडी मुखर्जी ने अपने हिटज़ॉब ओपिनियन में एक और बात कही है जो सेमीकंडक्टर्स को लेकर है। सेमीकंडक्टर्स के मामले में भी यही नीति है कि पहले कोई देश बेसिक प्रोसेस नोड्स सीखता है, पैकिंग और टेस्टिंग सीखता है और धीमे धीम अपनी कटिंग एज टेक की तरफ़ बढ़ता है। भारत इसके लिए इंसेंटिव्स दे रहा है और अब हम 28 नैनोमीटर के चिप्स बनाने वाले हैं।

असल बात ये है कि अब भारत अब फ़ोन और बाक़ी इलेक्ट्रॉनिक्स के मैन्युफैक्चरिंग में सीरियस कंटेंडर बन चुका है। यहाँ तक कि चाइनीज सोशल मीडिया में भी भारत के इस अचीवमेंट की चर्चा होती है। एंडी मुखर्जी जैसे लोग अपने फर्जी ओपिनियन देते रहेंगे , रघुराम राजन जैसे लोग इसे पेचकसबाजी बताते रहेंगे औ भारत मैन्युफैक्चरिंग में आगे बढ़ता जाएगा। ऐसे हिटजॉब्स एक्चुअली इस बात का प्रमाण हैं कि हमारी बढ़त से लोगों को समस्या हो रही है और उसके ख़िलाफ़ प्रोपेगेंडा चलाने के लिए एंडी मुखर्जी जैसे भूरे सिपाही लगाए जा रहे हैं।

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अर्पित त्रिपाठी
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