प्रधानमंत्री आवास के पास स्थित 7 रेसकोर्स रोड की एक मस्जिद को खाली करने का नोटिस मिलने के बाद यह मामला चर्चा में है। मस्जिद के बाहर मीडिया का जमावड़ा है और सवाल उठ रहे हैं कि क्या प्रशासन की कार्रवाई का निशाना सिर्फ मस्जिद है? लेकिन ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में जब इलाके के लोगों से बात की गई, तो तस्वीर कुछ अलग नजर आई।
मामला क्या है?
7 रेसकोर्स रोड के आसपास प्रधानमंत्री आवास और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) स्थित हैं। इस इलाके में सेना और वायुसेना के कार्यालय भी हैं। प्रधानमंत्री की सुरक्षा से जुड़े इंतजामों के तहत प्रशासन ने आसपास की करीब 100 एकड़ जमीन खाली कराई है
इस कार्रवाई के तहत तीन बस्तियां हटाई गईं, डीआईडी कॉलोनी, मस्जिद कैंप और राम कैंप। इन बस्तियों में रहने वाले ज्यादातर लोग आसपास के घरों और सरकारी दफ्तरों में खाना बनाने, झाड़ू-पोंछा करने और साफ-सफाई जैसे काम करते थे। अब इन बस्तियों की जगह मलबा, टूटी ईंटें और ढही हुई दीवारें नजर आती हैं।
इन्हीं बस्तियों के बीच एक मस्जिद भी है। प्रशासन ने इसे सरकारी जमीन पर अतिक्रमण बताते हुए खाली करने का नोटिस दिया है। मस्जिद की उम्र को लेकर भी अलग-अलग दावे हैं। कुछ जगहों पर इसे 125 से 150 साल पुराना बताया गया है, जबकि मस्जिद कमेटी का दावा है कि यह करीब 300 साल पुरानी है।
हालांकि, मस्जिद के पास स्थित एक क्लब के 1940 के रिकॉर्ड के मुताबिक, मस्जिद का निर्माण क्लब के बाद हुआ था। ऐसे में मस्जिद की वास्तविक उम्र को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते हैं। मस्जिद को खाली करने की समय-सीमा नजदीक आने के साथ ही यहां मीडिया की मौजूदगी बढ़ गई है। अब इस कार्रवाई को लेकर सार्वजनिक चर्चा का बड़ा हिस्सा मस्जिद पर ही केंद्रित है।
सिर्फ मस्जिद की चर्चा क्यों?
ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में एक दूसरा पहलू भी सामने आया। रिपोर्टर संजय राजपूत के मुताबिक, डीआईडी कॉलोनी में स्थित एक मंदिर को लगभग ढहा दिया गया है। फिलहाल वहां सिर्फ शिवलिंग बचा है, जिसे नवरात्रि के कारण अभी नहीं हटाया गया। रिपोर्ट के अनुसार, बाद में नई जगह पर प्राण-प्रतिष्ठा की जाएगी।
मस्जिद के पीछे की तरफ स्थित एक अन्य मंदिर को भी हटाया जाना है। इस कार्रवाई में हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों के घर टूटे हैं।
सवाल उठता है कि जब पूरी बस्तियां हटाई गईं और अलग-अलग समुदायों के लोगों के घरों के साथ उनके घरों में बने छोटे मंदिर भी टूटे, तो इन घटनाओं पर वैसी चर्चा क्यों नहीं हुई जैसी मस्जिद को मिले नोटिस के बाद हो रही है?

लोगों को कहाँ बसाया गया?
तीनों बस्तियों से हटाए गए लोगों को दिल्ली के सावदा घेवरा इलाके में स्थित DDA फ्लैट कॉलोनी में बसाया गया है। नरेश कुमार के मुताबिक, वर्ष 2024 में इन परिवारों का सर्वे किया गया था। इसके बाद उन्हें नोटिस दिए गए और लॉटरी के जरिए फ्लैट आवंटित किए गए। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया में बिना किसी भेदभाव के सभी को हटाया गया।
बस्ती खाली कराने के दौरान लोगों का सामान दूसरी जगह पहुँचाने के लिए सरकार की ओर से ट्रक और बसों की व्यवस्था की गई थी। इसके लिए लोगों से कोई किराया नहीं लिया गया।
आवंटित फ्लैट करीब 35 गज के हैं और इनमें एक कमरा है। इनकी कीमत लगभग डेढ़ लाख रुपये बताई गई है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत इसमें से 1.2 लाख रुपये सरकारी अनुदान के रूप में दिए गए हैं, जबकि शेष करीब 30 हजार रुपये लाभार्थियों को पाँच साल में चुकाने हैं।
हालाँकि, इन फ्लैटों का मालिकाना हक अभी लोगों को नहीं मिला है। फिलहाल उन्हें दो दस्तावेज दिए गए हैं।
लोगों की शिकायतें
- बच्चों के एडमिशन नहीं हो पा रहे और वे पुराने स्कूलों में ही जा रहे हैं।
- कई लोग काम के लिए 40-50 किलोमीटर दूर से रोज आते हैं और किराये में 150 से 200 रुपये तक खर्च हो रहे हैं।
- नए इलाके में रोजगार नहीं है। मोबाइल रिपेयर का काम करने वाले एक निवासी ने कहा कि वहॉं सब जमा-जमाया था, यहॉं कैसे गुजारा होगा।
- ₹30,000 एक साथ देना सबके लिए आसान नहीं है।
- नई कॉलोनी में कोई मस्जिद नहीं है। मुस्लिम निवासी फिलहाल 2-3 किलोमीटर दूर पुरानी जेजे कॉलोनी की मस्जिदों में जाते हैं।
बस्ती के कुछ निवासियों ने सवाल उठाया कि जब उनका परिवार चार पीढ़ियों से वहां रह रहा था, तो उस बस्ती को अवैध कैसे माना जा सकता है? वहीं, नरेश कुमार समेत कई लोगों ने स्वीकार किया कि उन्हें पता था कि जिस जमीन पर वे रह रहे थे, वह अवैध कब्जे वाली जमीन थी। इस बीच, एक महिला ने अपनी स्थिति को दूसरे नजरिए से देखा। उन्होंने कहा कि बुलडोजर के डर में लगातार जीने से बेहतर है कि अब उनके सिर पर छत तो है। इसके लिए उन्होंने सरकार का धन्यवाद भी किया।
अदालत में हारे बस्ती के लोग, मस्जिद के मामले में केंद्रीय मंत्री से लगाई गुहार
बस्ती के निवासियों के मुताबिक, जमीन से जुड़े मामले में मार्च से सितंबर तक अदालत में सुनवाई चली, लेकिन अंततः उन्हें हार का सामना करना पड़ा। एक निवासी ने दावा किया कि राहुल गांधी ने उनकी मदद करने की कोशिश की थी, लेकिन सरकार ने उन्हें मामले में आगे लड़ने का मौका नहीं दिया। मस्जिद से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि उनके पास जमीन पर अपने अधिकार के पर्याप्त दस्तावेज होते, तो वे भी अदालत का रुख करते। फिलहाल, मस्जिद के मामले में उन्होंने केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू से संपर्क किया है।
राजनीति का रंग
जेजे कॉलोनी में रहने वाले कुछ मुस्लिम निवासियों ने कांग्रेस के शासनकाल में मिली सुविधाओं का जिक्र किया। उनके मुताबिक, इंदिरा गांधी और शीला दीक्षित के दौर में कई जगह झुग्गी-बस्तियां बसाई गईं या विस्थापित परिवारों को दोबारा बसाया गया। हालांकि, उस समय लोगों को फ्लैट के बजाय खाली प्लॉट दिए जाते थे। बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलने में भी लंबा इंतजार करना पड़ता था।
एक निवासी ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर भी सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि फाइल पर हस्ताक्षर होने के बावजूद केजरीवाल ने लोगों को स्थिति के बारे में सही जानकारी क्यों नहीं दी।
वहीं, कुछ निवासियों ने आशंका जताई कि 2027 के चुनाव को देखते हुए मस्जिद को हटाने की कार्रवाई शायद टल जाए। एक मुस्लिम निवासी ने यह भी बताया कि वह खुद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को वोट देते हैं।
इस्लाम के नजरिए से भी अवैध जमीन पर मस्जिद ठीक नहीं
जेजे कॉलोनी में कुछ मुस्लिम निवासियों ने खुद माना कि सरकारी जमीन पर बनी मस्जिद कागज के बिना टिक नहीं सकती। एक निवासी ने कहा कि मस्जिद की जमीन अपनी खरीदी हुई होनी चाहिए और इस्लाम के नजरिए से भी अवैध जमीन पर मस्जिद ठीक नहीं है। उसने यह भी माना कि मंदिर के मुकाबले मस्जिद का हल्ला ज्यादा है। एक निवासी ने बताया कि कुछ लोग ग्रुप में संदेश डालकर पुराने इलाके में लौटने और झुग्गियॉं रुकवाने के लिए बुला रहे हैं।
मस्जिद अभी गिराई नहीं गई है, उसे खाली करने का नोटिस ही दिया गया है। रास्ते पर दिल्ली पुलिस, BSF और निजी सुरक्षाकर्मी तैनात हैं और मीडिया को भीतर नहीं जाने दिया जा रहा। लोगों में डर है कि कहीं सहारनपुर की तरह रातों-रात कार्रवाई न हो जाए।
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