जिस कन्नौज में विरोधियों को पर्चा नहीं भरने देते थे सपाई, आज वहाँ कुर्सियाँ तक नहीं भर पाए… खीझे हाईकमान ने भंग कर दी कार्यकारिणी

कन्नौज को सपा वाले अपना घर बताते नहीं थकते। अब उसी घर में पार्टी का सम्मेलन हुआ और लोग ही नहीं आए। मंच पर नेता बैठे रहे, सामने कुर्सियाँ मुँह ताकती रहीं। वीडियो वायरल हुआ तो पार्टी ने अगले ही दिन पूरी जिला कार्यकारिणी पर ही झाड़ू फेर दी। कन्नौज से सॉंसद खुद अखिलेश यादव हैं, इसलिए ये मामला और भी चुभने वाला है।

कन्नौज में हुई इस PDA सम्मेलन की फजीहत के बाद जिलाध्यक्ष कलीम खान समेत पूरी इकाई सपा ने बर्खास्त कर दी। इस मौके पर ओम प्रकाश राजभर ने अखिलेश को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि मुलायम-शिवपाल की बनाई विरासत अखिलेश नहीं संभाल पाए।

शनिवार को सम्मेलन, रविवार को फरमान

सपा के जिला कार्यालय में 17 अक्टूबर को पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक यानी PDA सम्मेलन रखा गया था। प्रदेश अध्यक्ष श्याम लाल पाल भी पहुँचे थे। जो तस्वीरें और वीडियो बाहर आए, उनमें मंच पर अच्छी-खासी भीड़ दिखती है, मगर सामने बैठने वाला कोई नहीं। सोशल मीडिया पर ये क्लिप तेजी से घूमी और पार्टी की खूब किरकिरी हुई।

रविवार शाम पाल ने कार्यालय-ज्ञाप जारी कर दिया। इस आदेश में जिलाध्यक्ष समेत पूरी जिला कार्यकारिणी को तत्काल प्रभाव से भंग करने की बात है। फ्रंटल संगठनों के सारे जिलाध्यक्ष और उनकी कार्यकारिणियाँ भी इसी में लपेट ली गईं। कन्नौज से जो नेता सपा की राज्य या राष्ट्रीय कार्यकारिणी में थे, उनकी छुट्टी भी इसी चिट्ठी से हुई।

इसकी कॉपी रामगोपाल यादव, पूर्व जिलाध्यक्ष कलीम खान और राष्ट्रीय अध्यक्ष के निजी सचिव को भेजी गई है। पत्र में वजह कहीं नहीं लिखी और पार्टी ने अलग से भी कोई सफाई नहीं दी है। रिपोर्ट्स में कम भीड़ को ही कारण बताया गया है।

भाजपा ने मौका नहीं छोड़ा

राज्यमंत्री असीम अरुण ने कहा कि ये खाली कुर्सियाँ जनता का मूड बता रही हैं। पूर्व सॉंसद सुब्रत पाठक ने एक कदम आगे जाकर अखिलेश को कन्नौज की किसी भी विधानसभा सीट से लड़कर दिखाने की चुनौती दे डाली।

ओम प्रकाश राजभर ने तो पूरा हिसाब ही खोल दिया। कैबिनेट मंत्री ने सोशल मीडिया पर लिखा कि मुलायम सिंह और शिवपाल यादव ने पसीना बहाकर कन्नौज को सपा का गढ़ बनाया था, लेकिन अखिलेश उसे संभाल नहीं पाए। उनका कहना था कि भीड़ न जुटने की जिम्मेदारी जिले के पदाधिकारियों पर डालकर बच निकलना ठीक नहीं, अखिलेश को अपने गिरेबान में भी झाँकना चाहिए। जाते-जाते राजभर ने सलाह भी दे दी कि 2027 से पहले पूरे प्रदेश की कार्यकारिणी भंग कर दी जाए, और दावा किया कि सत्ताईस में सपा साफ है।

कन्नौज की वो पुरानी कहानियाँ

कार्यकर्ता न जुटने की ये खबर इसलिए भी चर्चा में है कि कन्नौज की सियासत का सपा के साथ इतिहास कुछ और ही रहा है। 2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा कार्यकर्ता नीरज मिश्रा की हत्या हुई थी। सुब्रत पाठक इसे अखिलेश के इशारे पर हुई वारदात बताते रहे हैं।

उनके मुताबिक नीरज की लाश मिली, पर सिर आज तक नहीं मिला। योगी आदित्यनाथ भी विधानसभा में ये मुद्दा उठा चुके हैं और कह चुके हैं कि नीरज का गला काटा गया और जिनके इशारे पर ये हुआ, उन्होंने कभी माफी तक नहीं माँगी। नीरज के भाई मुनीष मिश्रा ने ऑपइंडिया से बात करते हुए सीधे अखिलेश यादव पर आरोप लगाया था।

फिर 2012 का उपचुनाव है। अखिलेश मुख्यमंत्री बने तो कन्नौज सीट खाली हुई और डिंपल यादव निर्विरोध सॉंसद चुन ली गईं। मैदान में बचे दो निर्दलीय, दशरथ शंखवार और संजू कटियार ने नाम वापस ले लिया। उस समय पर्चा भरने निकले लोगों ने जो बताया, वो किसी लोकतॉंत्रिक चुनाव जैसा नहीं लगता।

पीस पार्टी के संभावित उम्मीदवार शफकत तकी ने कहा था कि करीब 40 सपाइयों ने उनके दफ्तर को घेरकर तोड़फोड़ की, सात लोगों को बंदूक की नोक पर उठाया और नामॉंकन के कागज छीन लिए। वोटर्स पार्टी के प्रभात कुमार पॉंडेय का दावा था कि उनका ब्रीफकेस, जिसमें नामॉंकन के कागज और फीस के ₹50 हजार थे, जबरन ले लिया गया और आखिरी तारीख निकलने तक उन्हें एक होटल के कमरे में रोके रखा गया। 2017 में सत्ता बदलने के बाद इस मामले की CB-CID जाँच दोबारा शुरू हुई।

अब किले में ही सेंध

तो जिस कन्नौज में कभी विरोधी का पर्चा दाखिल करवाना हिम्मत का काम माना जाता था, वहाँ अब सपा को अपने ही सम्मेलन में कुर्सियाँ भरवाने के लाले पड़ गए। विधानसभा चुनाव 2027 सामने है और अखिलेश PDA के नाम पर पूरे प्रदेश में माहौल बनाने में लगे हैं। ऐसे में अपने सॉंसदी वाले जिले की ये तस्वीर पार्टी को सबसे ज्यादा खटकेगी।