नवंबर 1095। फ्रांस के दिल में, क्लेरमों की सभा। पोप अर्बन द्वितीय एक भारी भीड़ के सामने खड़े हुए। पादरी, सामंत, आम लोग, सब साँस रोककर सुन रहे थे। उन्होंने एक वाक्य कहा, और इतिहास की धारा ही मुड़ गई।
यह कोई आम भाषण नहीं था, इसने लोगों की सोच बदल दी। यह एक ऐसी जागृति थी, जिसने लोगों को यह महसूस कराया कि उनकी ज़िंदगी का मतलब ही बदल गया है। यूरोप तब टुकड़ों में बँटा था। सामंत और शूरवीर आपस में ही खून बहा रहे थे। पोप ने उन बेचैन शूरवीरों से एक सौदा किया; अपने छोटे-छोटे भाईचारे के युद्ध बंद करो, और अपनी पूरी ताकत एक पवित्र मकसद पर लगा दो। यरूशलम आज़ाद करो। मसीह की कब्र मुस्लिम शासन से वापस लो। और यही तुम्हारे पापों का सबसे बड़ा प्रायश्चित होगा।
भीड़ गूँज उठी, ‘देउस वुल्ट’ (Deus vult) । यानी, ईश्वर की यही इच्छा है। पहले धर्मयुद्ध (Crusades) की शुरुआत यहीं हुई। तलवार और मोक्ष को एक कर दिया गया। सभ्यताओं की टक्कर का वह साँचा बना, जो आज भी हमारी कल्पना में घूमता है।
अब लगभग एक हज़ार साल आगे बढ़िए। वही पुराना लैटिन वाक्य मध्ययुगीन कागज़ों से निकलकर आज की राजनीति और संस्कृति के बीच आ गया है। अमेरिकी लेखक, पूर्व सैनिक और रक्षा अधिकारी पीट हेगसेथ के विचारों और उनके शरीर के टैटू में भी यही बात साफ़ दिखती है। अपनी किताब अमेरिकन क्रूसेड में वे सीधे मध्ययुग के शूरवीरों की तरफ हाथ बढ़ाते हैं। उनका तर्क है कि पश्चिमी सभ्यता अंदर और बाहर से इतनी टूट रही है कि अब उसी तरह की बिना समझौते वाली आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जागृति चाहिए।
एक मध्ययुगीन पोप और एक आज के अमेरिकी राष्ट्रवादी को साथ रखिए। दोनों के बीच एक सीधी वैचारिक डोर दिखती है। बीच में ज्ञानोदय (Enlightenment) आया, धर्म और राजनीति अलग हुए, विज्ञान की क्रांति हुई, लोकतंत्र आया, फिर भी दोनों की बुनियाद एक है। उनके लिए राजनीति, संस्कृति और अपनी पहचान बचाना सिर्फ़ सरकार या देश का मामला नहीं है। वे इसे अच्छाई और बुराई के बीच एक बहुत बड़ी, पवित्र जंग मानते हैं।
संकट का गणित: धर्मयुद्ध की माँग कहाँ से पैदा होती है?
दोनों की सोच समझने के लिए पहले यह देखना होगा कि वे समाज की खराबी या गिरावट की वजह क्या बताते हैं। न तो अर्बन द्वितीय ने और न ही हेगसेथ ने अपनी बात बिना किसी आधार के कही। दोनों ने समाज में पहले से मौजूद निराशा और बिखराव को पहचाना और उसी को आधार बनाया।
ग्यारहवीं सदी के आखिर में यूरोप अंदरूनी अव्यवस्था से जूझ रहा था। ज़मींदार और योद्धा आपस में ही लड़कर ईसाई समाज को तोड़ रहे थे। उनके आपसी ख़ूनी झगड़ों ने आम लोगों और चर्च दोनों की नाक में दम कर रखा था।
पोप को इस अंदरूनी तनाव को बाहर निकालने का एक रास्ता चाहिए था। अर्बन की असली समझदारी इसी बात में थी कि उन्होंने लोगों की सोच को एक नया मोड़ दिया। उन्होंने यूरोपीय उच्च वर्ग की आपसी हिंसा को एक सामाजिक बुराई से बदलकर एक पवित्र धर्म-कर्म बना दिया। उनका तर्क था कि बाहर ईसा मसीह के लिए लड़ना, असल में घर की समस्याओं को खत्म करने का तरीका है। उन्होंने इस धर्मयुद्ध को हमला नहीं, बल्कि अपनी रक्षा बताया, एक ऐसा कदम, जो नैतिक और धार्मिक रूप से टूट रही ईसाई दुनिया को बचाने के लिए बेहद ज़रूरी था।
हेगसेथ बिल्कुल अलग दौर में लिखते हैं, पर उनका सोचना भी काफी हद तक ऐसा ही है। उनके लिए लड़ाई का मैदान आज का अमेरिका है। यहाँ ख़तरा किसी ऐसे साम्राज्य से नहीं है जो किसी पवित्र जगह पर कब्ज़ा किए बैठा हो। ख़तरा कई मोर्चों से है: धर्मनिरपेक्षता, प्रगतिशील सोच, संस्थाओं में फैला भ्रष्टाचार और पश्चिमी संस्कृति को जान-बूझकर ख़त्म करने की कोशिश।
अपनी किताब ‘अमेरिकन क्रूसेड’ (American Crusade) में वे लिखते हैं कि धर्म, परिवार और आज़ादी की बुनियाद को देश का ही उच्च वर्ग (एलीट क्लास) तोड़ रहा है, जिसे पारंपरिक अमेरिकी जीवन-शैली से नफ़रत है।
क्लेरमों में इकट्ठा हुए योद्धाओं की तरह, हेगसेथ भी आज के आम नागरिकों से कहते हैं कि अब शांत या बेअसर रहने का रास्ता बचा ही नहीं है। उनका मानना है कि पश्चिमी दुनिया के लोग लड़ना तो नहीं चाहते, लेकिन एक हज़ार साल पहले के अपने ईसाई पूर्वजों की तरह वे आज भी ऐसी ताकतों से घिरे हैं जो उन्हें ख़त्म करना चाहती हैं। दोनों की सोच में एक ही बात साफ़ है, समझौता करने का मतलब हार है, और बिना जीते शांति की बात करना नैतिक रूप से पूरी तरह गलत है।
निशाने पर कौन: सरहद पार का दुश्मन या घर के अंदर का विरोधी?
ग्यारहवीं सदी की धर्मयुद्ध वाली सोच और आज के राष्ट्रवाद की लहर की असली चाल यह है कि वे ‘विरोधी’ को कैसे देखते हैं। हालाँकि दोनों ज़मानों में दुश्मन की परिभाषा बदल चुकी है।
पोप अर्बन द्वितीय के लिए दुश्मन साफ़ तौर पर बाहर का था, जो दूसरे देश और दूसरी सभ्यता से जुड़ा था। लेवंत (मध्य पूर्व) पर कब्ज़ा जमाए बैठी मुस्लिम ताक़तें, बंद होते तीर्थयात्रा के रास्ते और बाइज़ेंटाइन साम्राज्य की सीमाओं पर बढ़ता दबाव, भूमध्य सागर के पार एक साफ़ दिखने वाला निशाना था। नक़्शे पर यह बिल्कुल आमने-सामने की टक्कर थी, ‘ईसाई दुनिया बनाम काफ़िर’।
हेगसेथ इस पुरानी सभ्यता वाली दुश्मनी का एक रूप आज भी बनाए रखते हैं। कट्टर इस्लामवाद, दुनिया भर में बदलती आबादी और सीमाओं के कमज़ोर होने पर उनकी चेतावनियाँ इसी ओर इशारा करती हैं। यरूशलम क्रॉस और ‘काफ़िर’ (जिसका अरबी में मतलब गैर-मुस्लिम या अधर्मी होता है) जैसे शब्दों का खुलकर इस्तेमाल करना, जान-बूझकर मध्ययुगीन दौर की याद दिलाता है। यह इस बात का संकेत है कि पश्चिमी और इस्लामी दुनिया के बीच की खींचतान आज भी जारी है, और इसमें कोई ढील नहीं आने वाली।
यहाँ हेगसेथ की विचारधारा अर्बन के तरीके से एक कदम आगे निकल जाती है, क्योंकि अब लड़ाई का मैदान बदल चुका है। मध्ययुगीन पोप पूरे यूरोप को ईसाई समाज का ही एक हिस्सा मानते थे, भले ही उसमें कमियाँ थीं। उनका मकसद यूरोपीय राजाओं को एक बाहरी दुश्मन के खिलाफ एकजुट करना था। इसके उलट, हेगसेथ आज के विविधता भरे और आपस में बँटे हुए अमेरिकी समाज में रहकर बात कर रहे हैं। इसलिए वे इस धर्मयुद्ध वाली नज़र को बाहर के बजाए तेज़ी से देश के अंदर की तरफ मोड़ते हैं।
‘अमेरिकन क्रूसेड’ की असली लड़ाई किसी विदेशी ज़मीन पर नहीं, बल्कि देश के अंदर की संस्थाओं में चल रही है। यहाँ दुश्मन यूनिवर्सिटी के कमरों में है, बड़े मीडिया घरानों में है, प्रगतिशील राजनीतिक आंदोलनों में है और सरकारी तंत्र के ‘डीप स्टेट’ में छुपा बैठा है।
घर के अंदर के ही राजनीतिक और सांस्कृतिक विरोधियों को देश की नींव हिलाने वाला बताकर, हेगसेथ पुरानी धर्मयुद्ध वाली सोच को आज के ‘कल्चर वॉर’ के हिसाब से नया रूप दे देते हैं।
अब विरोधी या काफ़िर समंदर पार नहीं बैठा है, वह स्कूल बोर्ड की बैठकों में बैठा है, कंपनियों की नीतियाँ तय कर रहा है और अदालतों में फैसले गढ़ रहा है। भाषा का यह बदलाव आम लोकतांत्रिक असहमति को भी अस्तित्व बचाने की आर-पार की जंग बना देता है।
वफ़ादारी का सवाल: ईश्वर/चर्च की दुनिया या ‘फ़र्स्ट अमेरिका’?
पवित्र युद्ध की एक जैसी भाषा के पीछे एक गहरा फ़र्क भी छुपा है। असली फ़र्क इस बात का है कि इंसान की आख़िरी वफ़ादारी किसके प्रति है।
पोप अर्बन द्वितीय पूरी दुनिया के ईसाई समाज (सार्वभौमिक चर्च) के मुखिया थे। उनकी नज़र में ईसाई दुनिया भाषा, नस्ल और शुरुआती देशों की सीमाओं से बहुत ऊपर थी। फ्रांसीसी, जर्मन, नॉर्मन और इतालवी, काग़ज़ पर ये सभी रोम के एक ही धार्मिक प्रमुख के नीचे आते थे।
उस ज़माने में आज की तरह बने-बनाए देश नहीं हुआ करते थे। लोगों की वफ़ादारी सिर्फ़ ईश्वर, चर्च और अपने ज़मींदार से होती थी। पहला धर्मयुद्ध पूरे यूरोप का एक साझा मिशन इसलिए बन पाया क्योंकि उसे मंज़ूरी देने वाली ताक़त किसी राजा या उसके ताज से बहुत बड़ी और पवित्र थी।
हेगसेथ इसके उलट बेझिझक खुद को अमेरिकी राष्ट्रवादी मानते हैं। उनका यह धर्मयुद्ध अमेरिका की अपनी खास किस्मत और पहचान से जुड़ा है, एक ऐसे देश के रूप में, जिसे वे पश्चिमी आज़ादी का आखिरी सबसे बड़ा ठिकाना मानते हैं।
उनके लिए धर्म और झंडा आपस में पूरी तरह घुले-मिले हैं। ईसाई धर्म समाज को नैतिक ताकत और ऐतिहासिक पहचान देता है, लेकिन इस पहचान को बचाए रखने का इकलौता जरिया एक ताकतवर, संप्रभु और अपनी संस्कृति पर भरोसा रखने वाला अमेरिका ही है।
जहाँ अर्बन द्वितीय ने पृथ्वी के राज्यों को स्वर्गीय क्रम के नीचे रखा, वहाँ हेगसेथ अमेरिकी देशभक्ति को लगभग पवित्र दर्जा देते हैं। राष्ट्र को बचाने के लिए वही कट्टर, न झुकने वाली तपस्या चाहिए जो कभी मठवासी सैन्य आदेशों के लिए रखी जाती थी। मध्ययुगीन पोप के लिए राष्ट्र विश्वास के बाद आता था। आधुनिक राष्ट्रवादी के लिए राष्ट्र की तकदीर ही विश्वास की आखिरी कसौटी है।
किताबों की बयानबाज़ी से पेंटागन के कॉरिडोर्स तक
हेगसेथ के ये विचार केवल किताबों या भाषणों तक सीमित नहीं रहे। उनकी किताब ‘द वॉर ऑन वारियर्स’ (The War on Warriors – 2024) ने इस पूरी बहस को एक नया मोड़ दिया। इस किताब में हेगसेथ ने सीधे अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठान पर हमला बोलते हुए तर्क दिया कि “अमरीकी सेना को सामाजिक प्रयोगों और ‘वोक’ नीतियों ने अंदर से कमजोर कर दिया है, और अब इसे वापस अपने असली योद्धा-रूप (Warrior Ethos) में लौटाना होगा।”
यह वैचारिक बहस तब सीधे भू-राजनीतिक वास्तविकता बन गई जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पीट हेगसेथ को अमरीकी रक्षा मंत्री (Secretary of Defense) के पद के लिए चुना। हेगसेथ के शरीर पर उकेरे गए ‘यरूशलम क्रॉस’ और ‘देउस वुल्ट’ के टैटू, उनकी क्रूसेडर-भाषा और उनके विचार अचानक दुनिया की सबसे ताकतवर सेना के शीर्ष नेतृत्व से जुड़ गए। यही कारण है कि 1095 के क्लेरमों के भाषण और आज के अमेरिकी रक्षा तंत्र के शीर्ष तक पहुँची इस भाषा की तुलना अब केवल इतिहास का कोई दिलचस्प तथ्य नहीं रही, यह आज की वैश्विक राजनीति और आधुनिक लोकतंत्रों के भविष्य से जुड़ा एक ज्वलंत सवाल बन चुकी है।
ब्लैक-एंड-व्हाइट सोच का सम्मोहन
आज इक्कीसवीं सदी के लोग ग्यारहवीं सदी की उस कड़क और बेबाक भाषा को क्यों पकड़ रहे हैं? आख़िर धर्मयुद्ध का यह विचार शांत क्यों नहीं बैठता?
पोप अर्बन द्वितीय की सोच और हेगसेथ के राष्ट्रवाद, दोनों की असली ताक़त इंसान की एक गहरी थकान से निकलती है: सही-गलत की धुंध से ऊब जाने की थकान। आज की ज़िंदगी बहुत उलझी हुई है, बहुत तेज़ है और पैर तले ज़मीन लगातार खिसकती रहती है। विविधता भरे समाज में समझौता करना पड़ता है, हर पहलू को बारीकी से समझना पड़ता है और इस थकाऊ बात को स्वीकार करना पड़ता है कि मतभेद हमेशा रहेंगे।
धर्मयुद्ध वाली यह सोच इसी दिमागी थकान की एक लुभाने वाली दवा देती है, पूरी और साफ़ नैतिक स्पष्टता।
जब इतिहास और राजनीति को धर्मयुद्ध के चश्मे से देखा जाता है, तो सारी उलझनें और जटिलताएँ एक झटके में ग़ायब हो जाती हैं। सामने वाले अब अलग सोच रखने वाले आम नागरिक नहीं रहते, बल्कि वे सिर्फ़ बुराई के पुतले नज़र आने लगते हैं। अपने साथी अब कमियों वाले राजनीतिक सहयोगी नहीं रहते, बल्कि एक पवित्र सेना के वीर योद्धा बन जाते हैं।
फिर हर चुनाव, हर सांस्कृतिक बहस और क़ानून की हर लड़ाई सिर्फ़ सरकार चलाने का साधारण काम नहीं रहती, वह अच्छाई और बुराई, यानी रोशनी और अँधेरे के बीच आर-पार की जंग बन जाती है।
अर्बन द्वितीय ने इस मिथक के ज़रिए हिंसा और ख़ून-ख़राबे का एक लंबा दौर शुरू कर दिया, जिसने ईसाई और मुस्लिम दुनिया के रिश्तों को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया और भूमध्य सागर के पूरे इलाक़े पर गहरे निशान छोड़े।
हेगसेथ उसी धर्मयुद्ध के दौर की एक सुंदर और निखरी हुई याद का सहारा लेते हैं। उनका मक़्सद एक ऐसे राजनीतिक जनाधार को एकजुट करना है, जो ख़ुद को अकेला महसूस करता है, जो बचाव की मुद्रा में है और इस तेज़ी से बदलती दुनिया को लेकर बेहद बेचैन है।
दोनो के पीछे काम करने वाली दिमाग़ी तरक़ीब एक ही है, इतिहास को हथियार की तरह इस्तेमाल करना, ताकि कथित सभ्यतागत विनाश के डर के आगे एक अटूट एकजुटता पैदा की जा सके।
पोप अर्बन द्वितीय और पीट हेगसेथ की तुलना सिर्फ़ इतिहास का कोई दिलचस्प तथ्य (Trivia) या दो अलग-अलग दौरों को आमने-सामने रखने (Juxtaposition) तक सीमित नहीं है। यह इस बात को समझने की एक गहरी कोशिश है कि पुराने धार्मिक और युद्ध से जुड़े विचार (Archetypes) आज भी हमारी आधुनिक राजनीतिक सोच में किस तरह ज़िंदा हैं और काम कर रहे हैं।
अर्बन द्वितीय ने मध्ययुगीन योद्धाओं से कहा कि वे तलवार उठाएँ और समंदर पार जाकर एक पवित्र शहर को दोबारा हासिल करें। वहीं, पीट हेगसेथ आज के नागरिकों और सैनिकों से कहते हैं कि वे सांस्कृतिक और राजनीतिक ढाल अपनाएँ और देश के अंदर फैली बुराइयों से अपनी सोच और पहचान वाले राष्ट्र को वापस छीने।
दोनों ही मामलों में, एक हज़ार साल के अंतर के बावजूद, क्लेरमों की वही पुरानी याद एक ख़तरनाक और लुभावना वादा दोहराती है: जो टूटा है उसे जोड़ा जा सकता है, जो खोया है उसे वापस जीता जा सकता है, और जो विरोधी रास्ते में खड़े हैं उन्हें हराया जा सकता है, बस शर्त यह है कि मानने वाले एक अटूट, न झुकने वाला हौसला जुटाएँ और ऐलान कर दें कि ‘ईश्वर की यही मर्ज़ी है’ (Deus vult)
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