इतालवी दार्शनिक एंटोनियो ग्राम्सी ने अपने ‘सांस्कृतिक आधिपत्य’ (Cultural Hegemony) के सिद्धांत में यह समझाया था कि कोई भी वैचारिक व्यवस्था या राजनीतिक सत्ता अपनी असली जीत तब दर्ज करती है, जब वह समाज के भौतिक साधनों की जगह उसकी भाषा, उसके मानस और उसकी बहसों के केंद्र पर नियंत्रण पा लेती है। जब समाज की ‘डिस्कर्सिव बाउंड्री’ (Discourse Boundaries) तय हो जाती हैं, तब विकल्प चाहे जो हों, खेल उसी निर्धारित दायरे के भीतर खेला जाता है।
कुछ ऐसा ही प्रच्छन्न लेकिन गहरा बदलाव आज भारतीय राजनीतिक और सामाजिक मानस में घटित हो रहा है।
आज राजनीतिक गलियारों से लेकर मीडिया स्टूडियो तक एक ही शोर है, ‘मोदी का पतन’ और एनडीए सरकार का कमजोर होना। चुनाव परिणामों, गठबंधन की मजबूरियों और सरकार विरोधी बयानों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं। ठीक इसी बीच, आज पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर आयोजित एक ‘भजन क्लबिंग’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी की सहज उपस्थिति और मंजीरा बजाने जैसी तस्वीरें भी सामने आईं, जिन्हें कुछ लोग क्षणिक पीआर मानकर खारिज कर सकते हैं, किंतु इसके गहरे दार्शनिक और सांस्कृतिक निहितार्थ कहीं अधिक व्यापक हैं।
लेकिन इस सतही शोरगुल के बीच, विश्लेषकों की नज़र से एक ऐसा ऐतिहासिक और जमीन-स्तरीय बदलाव छूट गया है जो भारतीय राजनीति की दिशा हमेशा के लिए बदल रहा है। आज़ाद भारत के इतिहास में यह पहला अवसर है जब राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र पूरी तरह से ‘हिन्दू-केंद्रित’ हो गया है।
आज़ादी के बाद से लेकर अब तक, भारतीय राजनीति का मुख्य खाका ‘धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता’ या ‘तुष्टीकरण बनाम बहुसंख्यकवाद’ के दायरे में घूमता रहा है। चुनावों में राजनीतिक दलों का एजेंडा अल्पसंख्यकों को साधना, सेक्युलरिज्म का चोला पहनना और तथाकथित ‘वोट बैंक’ की राजनीति करना होता था।
लेकिन आज स्थिति बिल्कुल उलट है। आज राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य से पारंपरिक अल्पसंख्यक राजनीति (Minority-Centric Politics) हाशिये पर चली गई है।
कांग्रेस का बदला रुख भी देखिए; जो कांग्रेस पार्टी कभी अल्पसंख्यकों के विशेष संरक्षण को अपनी राजनीति का मुख्य केंद्र मानती थी, वह आज ‘जितनी आबादी, उतना हक’ और जातिगत जनगणना के जरिए सामाजिक न्याय के दायरे में हिन्दू जातियों को ही आपस में साधने की होड़ में है। कांग्रेस अब खुलकर मुस्लिम तुष्टीकरण की पुरानी शैली से बचती नजर आती है।
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का ‘PDA’ (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्य़क) समीकरण भी ज़मीन पर पूरी तरह से पिछड़ों और दलित जातियों के भीतर हिन्दू पहचान और जातियों के समीकरण पर ही टिका है।
पंजाब में सत्ता में बैठी ‘आप’ (AAP) मुस्लिम मुद्दों पर खुलकर बात करने से बचती है। बुजुर्गों को मुफ्त तीर्थ यात्रा कराना और धार्मिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना यह साबित करता है कि राजनीति का स्पेस अब पूरी तरह सांस्कृतिक प्रतीकों से भर चुका है।
यह भारतीय राजनीति के इतिहास में पहली बार हो रहा है कि जब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही पूरी तरह से हिन्दू समाज के भीतर के अंतर्विरोधों, जातियों, उपजातियों और अधिकारों को लेकर आपस में जूझ रहे हैं। मुस्लिम या अल्पसंख्यक कारक अब मुख्य राजनीतिक विमर्श के केंद्र में नहीं, बल्कि परिधि (Periphery) पर चला गया है।
वैचारिक एकाधिकार: अब बहस केवल ‘हिन्दू वर्सेज हिन्दू’ है
आज राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक और सामाजिक बहस इस बात पर नहीं हो रही है कि अल्पसंख्यकों को क्या रियायतें मिलें, बल्कि इस बात पर हो रही है कि ‘बेहतर हिन्दू हितैषी’ या ‘सच्चा हिन्दू’ कौन है।
यह भारतीय राजनीति के इतिहास में पहली बार हो रहा है कि जब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही पूरी तरह से हिन्दू समाज के भीतर के अंतर्विरोधों, जातियों, और अधिकारों को लेकर आपस में लड़ रहे हैं। मुस्लिम या अल्पसंख्यक फैक्टर अब मुख्य राजनीतिक विमर्श के केंद्र में नहीं है।
जब से भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मुख्यधारा की राजनीति बनाया, तब से विपक्ष के लिए भी उस पिच पर खेलना अनिवार्य हो गया है। राहुल गांधी का मंदिर जाना, खुद को जनेऊधारी जताना या शिवभक्त बताना इस बात का प्रमाण है कि विपक्ष ने भी मान लिया है कि बिना हिन्दू पहचान के स्पेस को स्वीकार किए राजनीति संभव नहीं है।
सभ्यतागत पुनर्निर्माण (Civilisational Reconstruction) रातों-रात नहीं होता
राजनीतिक विश्लेषक अक्सर चुनावों के परिणामों से सभ्यतागत बदलाव को मापने की भूल करते हैं। चुनाव 5 साल के चक्र पर चलते हैं, सरकारें आती-जाती हैं, और राजनीतिक दल हारते-जीतते हैं, यह लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया है।
लेकिन सभ्यताएं दशकों और सदियों में बनती हैं। कार्ल पॉपर या अर्नाल्ड टायनबी जैसे इतिहासकारों का मानना रहा है कि सभ्यताएं दशकों, सदियों और सामूहिक चेतना के आंतरिक मंथन से बनती हैं।
भारत अपनी औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलकर अपनी प्राचीन सभ्यतागत जड़ों की ओर लौट रहा है। राम मंदिर का निर्माण, सांस्कृतिक पुनरुत्थान और लोक-संस्कृति से जुड़ाव, ये केवल चुनावी मुद्दे न होकर एक राष्ट्र के रूप में मानसिक उपनिवेशवाद से मुक्ति की प्रक्रिया हैं। इस तरह के गहरे वैचारिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए समय लगता है। इसे किसी एक चुनाव या तात्कालिक राजनीतिक हलचल से नहीं आंका जा सकता।
तो फिर, मोदी का पतन या उभार एक तात्कालिक राजनीतिक घटना हो सकती है, लेकिन असली बदलाव यह है कि भारत का राजनीतिक और सामाजिक मानस हमेशा के लिए बदल चुका है। आज की तारीख में डिबेट का सेंटर पूरी तरह से ‘हिन्दू डिस्कोर्स’ बन चुका है। चुनाव कोई भी जीते, दल कोई भी सत्ता में आए, अब भारत की राजनीति को हिन्दू और उसके सांस्कृतिक-सामाजिक सरोकारों को नजरअंदाज करके आगे बढ़ना असंभव हो गया है।
- क्या भारत की राजनीति पहली बार पूरी तरह ‘हिन्दू-केंद्रित’ हो गई है?
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