Tuesday, July 27, 2021
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सीढ़ियों पर चलने से संगीत की ध्वनि… आस्था और रहस्य का अद्भुत मेल: कुंभकोणम का 800 साल पुराना ऐरावतेश्वर मंदिर

800 वर्षों पुराने कुंभकोणम के इस मंदिर के न तो निर्माण को समझा जा सका है और न ही संगीत की ध्वनि उत्पन्न करने वाली उन सीढ़ियों के पीछे के विज्ञान को। ऐरावतेश्वर बस एक ऐसे मंदिर के रूप में जाना जाता है जहाँ अद्भुत शांति की अनुभूति होती है।

द्रविड़ वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना और चोल साम्राज्य के ‘द ग्रेट लिविंग टेंपल्स’ में से एक है ऐरावतेश्वर मंदिर। 12वीं शताब्दी में राजराजा चोल द्वितीय द्वारा बनवाया गया यह मंदिर तमिलनाडु के कुंभकोणम के पास दारासुरम में स्थित है। देवताओं के राजा इन्द्र के सफेद हाथी ऐरावत द्वारा भगवान शिव की पूजा किए जाने के कारण यह मंदिर ऐरावतेश्वर कहलाया। मंदिर का रहस्य और वास्तु आज भी लोगों को आश्चर्यचकित कर देते हैं।

फोटो साभार : दैनिक जागरण

पौराणिक मान्यता

ऐसा माना जाता है कि भगवान इन्द्र का हाथी ऐरावत सफेद रंग का था। किसी कारण वश ऋषि दुर्वासा ने ऐरावत को श्राप दे दिया जिसके कारण ऐरावत का रंग बदल गया। इससे दुखी होकर ऐरावत ने मंदिर के पवित्र जल में स्नान करके भगवान शिव की आराधना की और अपना मूल रंग पुनः प्राप्त किया। जिसके कारण मंदिर को ऐरावतेश्वर के नाम से जाना गया।

ऐरावत के अलावा मृत्यु के राजा यम भी एक ऋषि के श्राप से पीड़ित हुए। इस कारण उनका शरीर भयंकर जलन से ग्रसित हो गया। इस पीड़ा से मुक्ति प्राप्त करने के लिए यम ने भी मंदिर में स्थित सरोवर में स्नान किया और भगवान शिव की पूजा की। इसके बाद उन्हें अपनी पीड़ा से मुक्ति मिली।

मंदिर की वास्तुकला और संरचना

द्रविड़ वास्तुकला में पत्थरों से बनाए गए इस मंदिर में शानदार नक्काशी की गई है। मंदिर का विमानम 80 फुट ऊँचा है। मुख्य मंदिर के सामने स्थित मंडपम का एक भाग पत्थर के विशाल पहियों वाले एक रथ के समान है, जिसे घोड़ों द्वारा खींचा जा रहा है। हालाँकि भगवान शिव को समर्पित यह ऐरावतेश्वर मंदिर चोल साम्राज्य के दूसरे ‘लिविंग टेंपल्स’ बृहदीश्वर और गंगईकोंडचोलीश्वरम से ऊँचाई में छोटा है लेकिन ऐरावतेश्वर का विस्तार पर्याप्त है।

फोटो साभार : पत्रिका

मंदिर के भीतरी आँगन में नक्काशीदार इमारतों का समूह स्थित है। भगवान शिव के अलावा मंदिर में पेरिया नायकी अम्मन, भगवान गणेश के मंदिर भी स्थापित हैं। मंदिर के आँगन के दक्षिण-पश्चिमी कोने में 4 तीर्थ वाला एक मंडपम है, जहाँ यम की प्रतिमा अंकित की गई है। यम ने भी इस मंदिर में भगवान शिव की पूजा की थी इसलिए उनकी भी प्रतिमा मंदिर में अंकित की गई। मंदिर में ही एक विशाल शिला है, जहाँ सप्तमाताओं की प्रतिमा स्थापित है।

कुंभकोणम का ऐरावतेश्वर मंदिर अपने एक रहस्य के लिए जाना जाता है। दरअसल भगवान गणेश के मंदिर के पास चौकोर आधार के पास एक नक्काशीदार सीढ़ियों का एक समूह है जहाँ पैरों को पटकने पर संगीत की ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं। हालाँकि आज तक यह रहस्य ही है कि संगीत ध्वनि क्यों और कैसे उत्पन्न हो रही है।

फोटो साभार : पत्रिका

मंदिर में कई शिलालेख हैं, जिनमें से एक लेख में कुलोतुंगा चोल तृतीय द्वारा मंदिर का नवीकरण कराए जाने का पता चलता है। मंदिर के गोपुरम के पास स्थित एक शिलालेख से यह पता चलता है कि यहाँ स्थित आकृति कल्याणी से लाई गई, जिसे राजाधिराज चोल प्रथम के द्वारा कल्याणपुरा नाम दिया गया। ऐरावतेश्वर मंदिर यूनेस्को की विश्व विरासत स्थलों की सूची में शामिल है।

800 वर्षों पुराने इस मंदिर के न तो निर्माण को समझा जा सका है और न ही संगीत की ध्वनि उत्पन्न करने वाली उन सीढ़ियों के पीछे के विज्ञान को। ऐरावतेश्वर बस एक ऐसे मंदिर के रूप में जाना जाता है, जहाँ भक्तों को एक अद्भुत शांति की अनुभूति होती है।

कैसे पहुँचे?

कुंभकोणम पहुँचने के लिए नजदीकी हवाईअड्डा तिरुचिरापल्ली है, जो यहाँ से लगभग 91 किमी की दूरी पर है। इसके अलावा कुंभकोणम, नागापट्टिनम से 50 किमी की दूरी पर है जो कि एक समुद्री बंदरगाह है। कुंभकोणम दक्षिण भारत के कई शहरों से रेलमार्ग से जुड़ा हुआ है। चेन्नई, मदुरै, तिरुचिरापल्ली और कोयंबटूर जैसे बड़े शहरों से भी कुंभकोणम रेलमार्ग से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा चिदंबरम, तिरुचिरापल्ली और तंजावुर से लोकल पैसेंजर ट्रेनों के माध्यम से भी कुंभकोणम पहुँचा जा सकता है। सड़क मार्ग से भी कुंभकोणम पहुँचना आसान है। तमिलनाडु के कई बड़े शहरों से कुंभकोणम के लिए नियमित तौर पर बस सेवाएँ उपलब्ध हैं और इसके अलावा टैक्सी आदि की सुविधा भी पर्यटकों के लिए उपलब्ध है।

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ओम द्विवेदी
Writer. Part time poet and photographer.

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